टपक सिंचाई (ड्रिप सिंचाई) प्रणाली क्या है?

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टपक सिंचाई पद्धति वह विधि है जिसमें जल को मंद गति से बूँद-बूँद के रूप में फसलों के जड़ क्षेत्र में एक छोटी व्यास की प्लास्टिक पाइप से प्रदान किया जाता है। इस सिंचाई विधि का आविष्कार सर्वप्रथम इसराइल में हुआ था जिसका प्रयोग आज दुनिया के अनेक देशों में हो रहा है। इस विधि में जल का उपयोग अल्पव्ययी तरीके से होता है जिससे सतह वाष्पन एवं भूमि रिसाव से जल की हानि कम से कम होती है।

सिंचाई की यह विधि शुष्क  एवं अर्ध-शुष्क  क्षेत्रों के लिए अत्यन्त ही उपयुक्त होती है जहाँ इसका उपयोग फल बगीचों की सिंचाई हेतु किया जाता है। टपक सिंचाई ने लवणीय भूमि पर फल बगीचों को सफलतापूर्वक उगाने को संभव कर दिखाया है। इस सिंचाई विधि में उर्वरकों को घोल के रूप में भी प्रदान किया जाता है। टपक सिंचाई उन क्षेत्रों के लिए अत्यन्त ही उपयुक्त है जहाँ जल की कमी होती है, खेती की जमीन असमतल होती है और सिंचाई प्रक्रिया खर्चीली होती है।

टपक सिंचाई से क्या लाभ होते हें 

पारम्परिक सिंचाई की तुलना में टपक सिंचाई के अनेकों लाभ हैं जो निम्नलिखित हैं:

  1. जल उपयोग दक्षता 95 प्रतिशत तक होती है जबकि पारम्परिक सिंचाई प्रणाली में जल उपयोग दक्षता लगभग 50 प्रतिशत तक ही होती है।
  2. इस सिंचाई विधि में जल के साथ-साथ उर्वरकों को अनावश्यक बर्बादी से रोका जा सकता है।
  3. विधि से सिंचित फसल की तीव्र वृद्धि होती है फलस्वरूप फसल शीघ्र परिपक्व होती है।
  4. खर-पतवार नियंत्रण में अत्यन्त ही सहायक होती है क्योंकि सीमित सतह नमी के कारण खर-पतवार कम उगते हैं।
  5. टपक सिंचाई विधि अच्छी फसल विकास हेतु आदर्श मृदा नमी स्तर प्रदान करती है।
  6. इस सिंचाई विधि में कीटनाशकों  एवं कवकनाशकों के धुलने की संभावना कम होती है।
  7. लवणीय जल को इस सिंचाई विधि से सिंचाई हेतु उपयोग में लाया जा सकता है।
  8. इस सिंचाई विधि में फसलों की पैदावार 150 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।
  9. पारम्परिक सिंचाई की तुलना में टपक सिंचाई में 70 प्रतिशत तक जल की बचत की जा सकती है।
  10. इस सिंचाई विधि के माध्यम से लवणीय, बलुई एवं पहाड़ी भूमियों को भी सफलतापूर्वक खेती के काम में लाया जा सकता है।
  11. टपक सिंचाई में मृदा अपरदन की संभावना नहीं के बराबर होती है, जिससे मृदा संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।
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भारत में टपक सिंचाई

पिछले 15 से 20 वर्षों में टपक सिंचाई विधि की भारत के विभिन्न राज्यों में लोकप्रियता बढ़ी है। आज देश में 3.51 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल टपक सिंचाई के अन्तर्गत आता है जो कि 1960 में मात्र 40 हेक्टेयर था। भारत में टपक सिंचाई के अन्तर्गत सर्वाधिक क्षेत्रफल वाले मुख्य राज्य महाराष्ट्र (94 हजार हेक्टेयर), कर्नाटक (66 हजार हेक्टेयर) और तमिलनाडु (55 हजार हेक्टेयर) हैं।

टपक सिंचाई प्रणाली

एक आदर्श टपक सिंचाई प्रणाली, पम्प ईकाई , नियन्त्रण प्रधान, प्रधान एवं उप-प्रधान नली , पार्श्विक  एवं निकास से बनी होती है।पम्प ईकाई जल स्रोत से जल को लेकर के पाइप प्रणाली में जल के रिहाई हेतु उचित दबाव बनाती है। नियन्त्रण प्रधान में कपाट  होता है जो पाइप प्रणाली में जल की मुक्ति एवं दबाव को नियन्त्रित करता है। इसमें जल की सफाई हेतु छननी भी होती है। कुछ नियन्त्रण प्रधान में उर्वरक अथवा पोषक जलकुंड भी होता है। यह सिंचाई के दौरान नपी मात्रा में उर्वरक को जल में छोड़ता है। अन्य सिंचाई विधियों की तुलना में टपक सिंचाई का यह एक प्रमुख लाभ है।

प्रधान नली, उप-प्रधान नली एवं पार्श्विक, नियन्त्रण प्रधान से जल की पूर्ति खेत में करते हैं। प्रधान नली, उप-प्रधान नली एवं पार्श्विक आमतौर से पालिथीन की बनी होती हैं अतः इन्हें प्रत्यक्ष सौर ऊर्जा से नष्ट होने से बचाने हेतु जमीन में दबाया जाता है। आमतौर से पार्श्विक नलीयों का व्यास 13-32 मीलीमीटर होता है।निकास वह युक्ति होती है जिसका उपयोग पार्श्विक से पौधों को जल की पूर्ति हेतु नियन्त्रण में किया जाता है।

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टपक सिंचाई हेतु उपयुक्त फसलें:

कतार वाली फसलों (फल एवं सब्जी), वृक्ष एवं लता फसलों हेतु टपक सिंचाई अत्यन्त ही उपयुक्त होती है जहाँ एक या उससे अधिक निकास को प्रत्येक पौधे तक पहुँचाया जाता है। टपक सिंचाई को आमतौर से अधिक मूल्य वाली फसलों के लिए अपनाया जाता है क्योंकि इस सिंचाई विधि की संस्थापन कीमत अधिक होती है। टपक सिंचाई का प्रयोग आमतौर से फार्म, व्यवसायिक हरित गृहों तथा आवासीय बगीचों में होता है।

यह लम्बी दूरी वाली फसलों के लिए उपयुक्त होती है। सेब, अंगूर, संतरा, नीम्बू, केला, अमरूद, शहतूत, खजूर, अनार, नारियल, बेर, आम आदि जैसी फल वाली फसलों की सिंचाई टपक सिंचाई विधि द्वारा की जा सकती है। इनके अतिरिक्त टमाटर, बैंगन, खीरा, लौकी, कद्दू, फूलगोभी, बन्दगोभी, भिण्डी, आलू, प्याज आदि जैसी सब्जी फसलों की सिंचाई भी टपक सिंचाई विधि से की जा सकती है। अन्य फसलों जैसे कपास, गन्ना, मक्का, मूंगफली, गुलाब एवं रजनीगंधा आदि को भी इस सिंचाई विधि द्वारा सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है।

अन्ततः इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि टपक सिंचाई तकनीक में जल का उपयोग अल्पव्ययी तरीके से पौधों की सिंचाई हेतु होता है। सिंचाई की यह तकनीक न सिर्फ जल एवं मृदा संरक्षण को सुनिश्चित करती है अपितु इससे फसल पैदावार भी अधिक होती है। अतः संपोषित विकास के लक्ष्य प्राप्ति हेतु टपक सिंचाई आज समय की आवश्यकता है।

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