वैज्ञानिकों ने विकसित की पशुओं के चारे हेतु ज्वार की नई उन्नत किस्म ‘सीएसवी 44 एफ’

0
11696
jowar ki new kism csv 44

ज्वार की नई विकसित किस्म सीएसवी 44 एफ

पशुपालन से अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक पशु से अधिक दूध प्राप्त किया जाए | पशु आहार पशु में दूध उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है | हरा चारा एवं संतुलित आहार खिलाने से पशुओं में न केवल दूध उत्पदान बढ़ता है बल्कि पशुओं की सेहत भी अच्छी रहती है | कई पशुपालक किसान पशुओं को खिलाने के लिए हरे चारे की खेती भी करते हैं | ऐसे किसानों के लिए वैज्ञानिकों ने ज्वार की नई किस्म विकसित की है, जो न केवल पशुओं में दूध उत्पादन को बढ़ाती है बल्कि पशुओं के लिए सेहतमंद भी है |

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय,हिसार के कृषि वैज्ञानिकों ने पशुओं के चारे की फसल ज्वार की नई व उन्नत किस्म ‘सीएसवी 44 एफ’ विकसित कर विश्वविद्यालय के नाम एक और उपलब्धि दर्ज करवा दी है। ज्वार की इस किस्म को विश्वविद्यालय के अनुवांशिकी एवं पौध प्रजनन विभाग के चारा अनुभाग द्वारा विकसित किया गया है। इस किस्म को भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के कृषि एवं सहयोग विभाग की ‘फसल मानक, अधिसूचना एवं अनुमोदन केंद्रीय उप-समिति’ द्वारा नई दिल्ली में आयोजित 84वीं बैठक में अधिसूचित व जारी कर दिया गया है।

यह भी पढ़ें   मादा पशुओं के प्रजनन से संबंधित मुख्य बातें

ज्वार की नई विकसित किस्म ‘सीएसवी 44 एफ’ की विशेषताएं

‘सीएसवी 44 एफ’ किस्म में अन्य किस्मों की तुलना में प्रोटीन व पाचनशीलता अधिक है, जिसकी वजह से यह पशु के दुग्ध उत्पादन में बढ़ोतरी करती है। इस किस्म में मिठास 10 प्रतिशत से भी अधिक व स्वादिष्ट होने के कारण पशु इसे खाना काफी पसंद करते हैं। इस किस्म में हरे चारे के लिए प्रसिद्ध किस्म ‘सीएसवी 21 एफ’ से 7.5 प्रतिशत व ‘सीएसवी 30 एफ’ से 5.8 प्रतिशत अधिक हरे चारे की पैदावार होने के कारण किसानों को अधिक मुनाफा भी होगा। सिफारिश किए गए उचित खाद व सिचाई प्रबंधन के अनुसार यह किस्म अधिक पैदावार देने में सक्षम है और इसे लवणीय भूमि में भी उगाया जा सकता है। अधिक बारिश व तेज हवा चलने पर भी यह किस्म गिरती नहीं है।

ज्वार में प्राकृतिक तौर पर पाया जाने वाला विषैला तत्व धूरिन इस किस्म में बहुत ही कम है। ‘सीएसवी 44 एफ’ किस्म तनाछेदक कीट की प्रतिरोधी है व इसमें पत्तों पर लगने वाले रोग भी नहीं लगते। ज्वार की यह किस्म दक्षिणी राज्यों मुख्यत: कर्नाटक, महाराष्ट्र और तमिलनाडु के लिए सिफारिश की गई है। हालांकि इस किस्म को विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एचएयू में ही विकसित किया है | इस किस्म को हरियाणा के विभिन्न क्षेत्रों में परीक्षण के तौर पर लगाया गया था, जहां इसके बहुत ही सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। इसलिए यहां किसानों के लिए भी इसकी सिफारिश संबंधी प्रपोजल जल्द ही कमेटी को भेजा जाएगा।

यह भी पढ़ें   किसानों को जल्द दी जाएगी सोलर पम्प की सब्सिडी

अभी तक विकसित की गई ज्वार की किस्में

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय,हिसार के चारा अनुभाग 1970 से अब तक ज्वार की कुल आठ किस्में विकसित कर चुका है। इनमें से बहु-कटाई वाली किस्म एसएसजी 59-3 (1978), दो कटाई वाली किस्म एचसी 136 (1982) व एक कटाई वाली किस्में एचसी 308 (1996), एचजे 513 (2010) और एचजे 541 (2014) किसानों की पहली पसंद बनी हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here