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ड्राईलैंड कांग्रेस 2026: शुष्क भूमि खेती को बदलने की तैयारी, नई तकनीक से बढ़ेगी पैदावार और किसानों की कमाई

Dryland Congress 2026 में शुष्क भूमि खेती को लाभकारी बनाने के लिए नई तकनीक, जलवायु-सहिष्णु फसलें, जल प्रबंधन और बेहतर बाजार पर जोर दिया गया। 25 से अधिक देशों के 800 प्रतिनिधि ले रहे हैं हिस्सा।

Dry Land Congress 2026 Inauguration

देश में शुष्क भूमि खेती (Dryland Farming) को अधिक उत्पादक, लाभकारी और जलवायु-सहिष्णु बनाने के लिए विज्ञान, आधुनिक तकनीक, बेहतर जल प्रबंधन और बाजार को एक साथ जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि शुष्क भूमि को कृषि की कमजोरी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। सही विज्ञान, नीति और बाजार सहयोग मिलने पर यही क्षेत्र किसानों की आजीविका और खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के लिए बड़ी ताकत बन सकते हैं।

केंद्रीय कृषि मंत्री ने नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय कृषि विज्ञान परिसर में 10 सितंबर से शुरू हुए ‘Dryland Congress 2026’ के उद्घाटन सत्र में यह बात कही। तीन दिवसीय सम्मेलन में 25 से अधिक देशों के 800 से ज्यादा प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं और शुष्क क्षेत्रों की खेती को बेहतर बनाने के लिए नई तकनीकों, जलवायु-सहिष्णु फसलों, जल प्रबंधन, बाजार और नीतिगत उपायों पर मंथन किया जा रहा है।

शुष्क भूमि को कमजोरी नहीं, ताकत बनाने पर जोर

कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि कृषि व्यवस्था में बदलाव का उद्देश्य केवल फसल उत्पादन बढ़ाना नहीं होना चाहिए। खाद्य सुरक्षा, पोषण सुरक्षा और किसान की समृद्धि को इसके केंद्र में रखना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि सही वैज्ञानिक तकनीकों, अनुकूल नीतियों और मजबूत बाजार व्यवस्था के माध्यम से शुष्क भूमि भारत के साथ अफ्रीका और ऐसी ही कृषि चुनौतियों का सामना कर रहे दूसरे क्षेत्रों के लिए भी बड़ी ताकत बन सकती है।

इसलिए Dryland Farming में सफलता को केवल प्रति हेक्टेयर उत्पादन के आधार पर नहीं, बल्कि इससे किसानों की आजीविका और आमदनी में आए सुधार के आधार पर भी देखा जाना चाहिए।

25 से ज्यादा देशों के 800 विशेषज्ञ और किसान कर रहे मंथन

Dryland Congress 2026 में 25 से अधिक देशों से 800 से ज्यादा प्रतिनिधि शामिल हुए हैं। इनमें वैज्ञानिक, किसान, नीति निर्माता, शिक्षाविद, उद्योग प्रतिनिधि, विकास सहयोगी और नागरिक समाज संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हैं।

सम्मेलन में मुख्य रूप से ऐसी तकनीकों और नीतियों पर चर्चा की जा रही है जिनसे कम पानी और चुनौतीपूर्ण जलवायु परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में खेती को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाया जा सके।

इसके साथ ही शुष्क क्षेत्रों में किसानों के लिए आजीविका के बेहतर अवसर तैयार करने, फसलों की सहनशीलता बढ़ाने, पोषण सुधारने और किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराने पर भी फोकस है।

जलवायु-सहिष्णु फसलों की नई किस्मों पर होगा काम

शुष्क क्षेत्रों में किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में अनिश्चित बारिश और बदलती जलवायु परिस्थितियां शामिल हैं। इसे देखते हुए सम्मेलन में Climate-Resilient Crops और तेजी से फसल सुधार पर विशेष चर्चा की जा रही है।

पहले दिन के तकनीकी कार्यक्रम में तीन प्रमुख विषय रखे गए। इनमें आनुवंशिक लाभों में तेजी के लिए भविष्य की फसल प्रजनन तकनीक, जलवायु-सहिष्णु शुष्क भूमि और बेहतर आहार एवं पोषण के लिए बाजार तथा नीतियां शामिल रहीं।

विशेषज्ञों ने फसलों में आनुवंशिक सुधार की गति बढ़ाने, बदलते मौसम को सहन करने वाली किस्मों के विकास और शुष्क क्षेत्रों के बेहतर प्रबंधन की आवश्यकता बताई।

कम पानी में ज्यादा आर्थिक लाभ पर फोकस

Dryland Farming में पानी का बेहतर प्रबंधन इस पूरे बदलाव का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा। पूर्व ICAR महानिदेशक डॉ. आर.एस. परोदा ने शुष्क भूमि खेती में जल प्रबंधन पर विशेष जोर देते हुए कहा कि लक्ष्य केवल पानी बचाना नहीं, बल्कि पानी की प्रत्येक बूंद से अधिक आर्थिक और पोषण संबंधी मूल्य प्राप्त करना होना चाहिए।

इसका मतलब है कि शुष्क क्षेत्रों में ऐसी फसलों, किस्मों और कृषि प्रणालियों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है जो उपलब्ध सीमित जल संसाधनों का अधिक कुशलता से इस्तेमाल कर सकें और किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ दें।

केवल खेती नहीं, पूरी कृषि व्यवस्था में बदलाव की जरूरत

DARE के सचिव और ICAR के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने कहा कि शुष्क क्षेत्रों में परिवर्तन लाने के लिए केवल खेत या फसल पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा।

इसके लिए संपूर्ण प्रणाली, संपूर्ण समाज और संपूर्ण सरकार के दृष्टिकोण की जरूरत है। यानी वैज्ञानिक अनुसंधान से निकली तकनीक को खेत तक पहुंचाने के साथ नीति, बाजार, भूमि प्रबंधन और किसान की जरूरतों को भी एक साथ जोड़ना होगा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अब सुझावों से वास्तविक क्रियान्वयन और अलग-अलग प्रयासों से पूरी कृषि प्रणाली की ओर बढ़ने की जरूरत है।

डिजिटल तकनीक से शुष्क भूमि प्रबंधन सुधारने की तैयारी

भूमि संसाधन विभाग के सचिव नरेंद्र भूषण ने शुष्क भूमि के बेहतर प्रबंधन में Digital Public Infrastructure की भूमिका पर भी जोर दिया। डिजिटल तकनीक, बेहतर भूमि संसाधन प्रबंधन और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से ऐसे क्षेत्रों के उपलब्ध संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग करने की संभावनाओं पर काम किया जा सकता है। इससे केवल खेती ही नहीं, बल्कि भूमि और प्राकृतिक संसाधनों के दीर्घकालीन प्रबंधन को भी मजबूत करने का लक्ष्य है।

किसान के अनुभव को भी मिलेगा महत्व

सम्मेलन में केवल वैज्ञानिक और नीति निर्माता ही नहीं, बल्कि किसानों को भी अपनी बात रखने का अवसर दिया गया। पद्म श्री से सम्मानित किसान भिकल्या लाडक्या धिंडा ने शुष्क क्षेत्रों के लिए कृषि रणनीतियां तैयार करते समय किसानों के वास्तविक अनुभव और उनकी जरूरतों को शामिल करने पर जोर दिया।

यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अलग-अलग शुष्क क्षेत्रों की जलवायु, मिट्टी, उपलब्ध पानी और किसानों की आर्थिक परिस्थितियां अलग होती हैं। ऐसे में जमीनी अनुभवों को वैज्ञानिक समाधानों से जोड़ने पर अधिक व्यावहारिक कृषि मॉडल विकसित किए जा सकते हैं।

किसानों की कमाई और बाजार भी होंगे रणनीति का हिस्सा

शुष्क क्षेत्रों की कृषि में बदलाव केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगा। सम्मेलन में किसानों को बेहतर बाजार, पोषण और आजीविका के अवसर उपलब्ध कराने पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान को बेहतर तकनीक और जलवायु-सहिष्णु बीज मिल जाए, लेकिन उपज का उचित बाजार और मूल्य न मिले तो खेती में अपेक्षित आर्थिक बदलाव संभव नहीं होगा। इसी वजह से विज्ञान और तकनीक के साथ बाजार एवं नीतिगत सहयोग को Dryland Farming की भविष्य की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।

शुष्क क्षेत्रों से पलायन कम करने पर भी जोर

ICRISAT के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ने शुष्क क्षेत्रों को उत्पादक, लाभकारी और लचीला बनाने के लिए स्पष्ट रोडमैप की जरूरत बताई। इसका उद्देश्य किसानों और ग्रामीण परिवारों के लिए स्थानीय स्तर पर बेहतर आजीविका के अवसर तैयार करना भी है।

यदि शुष्क क्षेत्रों में खेती को आर्थिक रूप से अधिक लाभकारी बनाया जाता है तो इससे ग्रामीण आजीविका मजबूत होने के साथ रोजगार के लिए होने वाले पलायन को कम करने में भी मदद मिल सकती है।

डॉ. पंजाब सिंह ने भी कहा कि शुष्क भूमि कृषि के अगले चरण में ऐसी प्रणालियों की जरूरत है जो लाभकारी और जलवायु-सहिष्णु होने के साथ पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ हों और नई पीढ़ी को भी कृषि की ओर आकर्षित कर सकें।

भारत की तकनीक दूसरे देशों के किसानों के भी आएगी काम

Dryland Congress में South-South Cooperation यानी समान कृषि चुनौतियों का सामना कर रहे विकासशील देशों के बीच तकनीक, ज्ञान और सफल मॉडलों के आदान-प्रदान पर भी जोर दिया गया।

विशेषज्ञों के मुताबिक भारत में शुष्क भूमि कृषि के लिए विकसित सफल तकनीकों और मॉडलों का इस्तेमाल अफ्रीका सहित Global South के दूसरे देशों में भी किया जा सकता है। इसी तरह दूसरे देशों में विकसित सफल समाधानों से भारतीय किसानों को लाभ पहुंचाने की संभावनाएं भी मौजूद हैं।

50 वर्षों के Dryland Research पर विशेष प्रकाशन जारी

उद्घाटन सत्र में केंद्रीय कृषि मंत्री ने ‘Transforming the Drylands: The ICRISAT Journey’ का विमोचन भी किया। इसमें एशिया, अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों में विज्ञान, नवाचार और साझेदारी के क्षेत्र में ICRISAT के पांच दशकों से अधिक के कार्य को शामिल किया गया है।

इसके अलावा Dryland Congress 2026 की सार-पुस्तिका जारी की गई, जिसमें 250 से अधिक शोध सार शामिल हैं। ICRISAT Research and Corporate Profile भी लॉन्च की गई, जिसमें तेजी से फसल सुधार, मजबूत कृषि प्रणाली और कृषि-खाद्य प्रणाली में बदलाव से संबंधित अनुसंधान को प्रस्तुत किया गया है।

अगले दो दिनों में इन विषयों पर होगा मंथन

Dryland Congress 2026 में आगे भी वैज्ञानिक नवाचार, जलवायु सहनशीलता, फसल सुधार, जल प्रबंधन, टिकाऊ कृषि प्रणाली, पोषण, बाजार, नीति और किसानों की आजीविका से जुड़े विषयों पर चर्चा जारी रहेगी।

इस पूरी पहल का प्रमुख लक्ष्य शुष्क क्षेत्रों की खेती को ऐसी कृषि प्रणाली में बदलना है जिसमें सीमित संसाधनों के बावजूद किसान बेहतर उत्पादन और आमदनी प्राप्त कर सकें और बदलती जलवायु से जुड़े जोखिमों का अधिक प्रभावी तरीके से सामना कर सकें।

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