देश के आलू और शकरकंद उत्पादक किसानों को आने वाले समय में नई किस्मों और आधुनिक उत्पादन तकनीकों का लाभ मिल सकता है। आगरा में स्थापित हो रहे दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र के माध्यम से वैश्विक स्तर के उन्नत जर्मप्लाज्म, हाइब्रिड आलू तकनीक, बायोफोर्टिफाइड फसलों और जलवायु-सहिष्णु किस्मों को भारतीय कृषि की जरूरतों से जोड़ने की तैयारी है।
इस संबंध में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नई दिल्ली स्थित कृषि भवन में अंतरराष्ट्रीय आलू केंद्र (CIP) के महानिदेशक डॉ. सिमोन हेक के नेतृत्व वाले उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक की। बैठक में आगरा में स्थापित हो रहे क्षेत्रीय केंद्र की प्रगति के साथ आलू किसानों की आय बढ़ाने, आधुनिक ब्रीडिंग तकनीक और उन्नत जर्मप्लाज्म से जुड़े विषयों पर चर्चा हुई।
आगरा में स्थापित हो रहा दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र
आगरा में स्थापित हो रहा दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र भारत के साथ नेपाल, बांग्लादेश और भूटान के लिए एक प्रमुख वैज्ञानिक मंच के रूप में काम करेगा। अंतरराष्ट्रीय आलू केंद्र के अनुसार यहां वैश्विक स्तर पर विकसित वैज्ञानिक तकनीकों को भारतीय परिस्थितियों और प्राथमिकताओं से जोड़ने पर काम किया जाएगा।
इसमें खास तौर पर हाइब्रिड आलू तकनीक, बायोफोर्टिफाइड फसलें और जलवायु-सहिष्णु किस्में शामिल हैं। इन तकनीकों के माध्यम से भविष्य में आलू की बीज उत्पादन प्रणाली में तेजी और सटीकता लाने के साथ निजी क्षेत्र के निवेश को भी प्रोत्साहित करने की योजना है।
किसानों तक पहुंचेगा दुनिया का उन्नत जर्मप्लाज्म
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बैठक में कहा कि आगरा केंद्र के माध्यम से वैश्विक स्तर का नया और उन्नत जर्मप्लाज्म भारत में आना चाहिए। इस जर्मप्लाज्म की मदद से देश की अलग-अलग कृषि एवं जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल नई किस्में विकसित करने की दिशा में काम किया जा सकेगा। इसका उद्देश्य अंततः इन वैज्ञानिक उपलब्धियों का लाभ आलू उत्पादक किसानों तक पहुंचाना है।
उन्होंने ICAR और CIP के बीच कार्य का स्पष्ट विभाजन रखने पर भी जोर दिया, ताकि दोनों संस्थाओं के कार्यों में दोहराव न हो और उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल नई एवं उपयोगी तकनीक विकसित करने में किया जा सके।
हाइब्रिड आलू तकनीक पर होगा विशेष काम
बैठक में हाइब्रिड आलू तकनीक को भी महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में रखा गया। प्रस्तावित क्षेत्रीय केंद्र के जरिए इस तकनीक को भारतीय प्राथमिकताओं से जोड़ने की दिशा में काम किया जाएगा। इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन के कारण खेती के सामने बढ़ रही चुनौतियों को देखते हुए जलवायु-सहिष्णु आलू किस्मों पर भी ध्यान केंद्रित किया जाएगा। ऐसी तकनीकों और किस्मों का सफल विकास एवं विस्तार आलू उत्पादन प्रणाली को अधिक सक्षम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
आलू बीज उत्पादन प्रणाली में बदलाव की तैयारी
आलू की खेती में गुणवत्तापूर्ण बीज की उपलब्धता महत्वपूर्ण होती है। CIP ने बैठक में बताया कि नई वैज्ञानिक तकनीकों के उपयोग से आलू की बीज उत्पादन प्रणाली में तेजी और सटीकता लाने की दिशा में काम किया जाएगा। नई तकनीकों, बेहतर जर्मप्लाज्म और आधुनिक ब्रीडिंग को एक साथ जोड़कर किसानों तक बेहतर रोपण सामग्री पहुंचाने की संभावनाओं पर काम होगा। हालांकि किसानों को नई किस्में कब और किस प्रक्रिया से उपलब्ध होंगी, इसकी कोई निश्चित समय-सीमा इस बैठक में घोषित नहीं की गई है।
शकरकंद को ‘सुपरफूड’ के रूप में बढ़ावा देने की तैयारी
बैठक का एक महत्वपूर्ण विषय शकरकंद (Sweet Potato) भी रहा। खास तौर पर आयरन, जिंक और विटामिन-A से भरपूर ऑरेंज-फ्लेश्ड बायोफोर्टिफाइड शकरकंद की उन्नत किस्मों को भारतीय किसानों तक पहुंचाने पर चर्चा हुई।
केंद्रीय कृषि मंत्री ने शकरकंद को केवल पारंपरिक फसल के रूप में देखने के बजाय आधुनिक “सुपरफूड” के रूप में बड़े स्तर पर ब्रांड करने पर जोर दिया। इसका उद्देश्य शहरी और ग्रामीण दोनों बाजारों में शकरकंद की मांग बढ़ाना और इसका उत्पादन करने वाले छोटे किसानों को बेहतर बाजार एवं मूल्य उपलब्ध कराने की संभावनाएं तैयार करना है।
पोषण के साथ किसानों की कमाई पर फोकस
बायोफोर्टिफाइड शकरकंद को बढ़ावा देने की पहल पोषण और किसानों की आय, दोनों से जुड़ी हुई है। आयरन, जिंक और विटामिन-A जैसे पोषक तत्वों से भरपूर किस्मों को बाजार से बेहतर तरीके से जोड़ने पर किसानों के लिए नई मांग तैयार हो सकती है। इसीलिए बैठक में केवल नई किस्मों के विकास पर नहीं, बल्कि किसानों को उनकी उपज का अधिक लाभ दिलाने पर भी जोर दिया गया।
ICAR और CIP मिलकर करेंगे काम
भारत में कृषि अनुसंधान की मौजूदा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए कृषि मंत्री ने ICAR और International Potato Center (CIP) के बीच बेहतर समन्वय पर विशेष जोर दिया। उनका कहना था कि दोनों संस्थानों को एक ही प्रकार के काम को दोहराने के बजाय अपनी विशेषज्ञता के अनुसार जिम्मेदारियां तय करनी चाहिए। इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा और ऐसी नई तकनीकों एवं किस्मों के विकास पर ध्यान दिया जा सकेगा जिनका किसानों को व्यावहारिक लाभ मिले।