देश में जलवायु परिवर्तन और अनियमित वर्षा के कारण धान उत्पादक किसानों को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे समय में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), पूसा द्वारा विकसित पूसा बासमती 1882 किसानों के लिए एक बेहतर विकल्प बनकर उभर सकती है। यह भारत की पहली मास-व्युत्पन्न (MAS-Derived) सूखा सहिष्णु बासमती धान की उन्नत किस्म है, जिसे विशेष रूप से बासमती उत्पादक क्षेत्रों के लिए विकसित किया गया है।
यह किस्म न केवल सूखे की स्थिति में बेहतर प्रदर्शन करती है, बल्कि सिंचित परिस्थितियों में भी उच्च उपज देने की क्षमता रखती है। केंद्रीय किस्म विमोचन समिति द्वारा इस किस्म को 2022 में अधिसूचित कर दिया गया है।
किन राज्यों के लिए अनुशंसित है पूसा बासमती 1882?
पूसा बासमती 1882 को मुख्य रूप से उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत के पारंपरिक बासमती उत्पादक क्षेत्रों के लिए अनुशंसित किया गया है। इन राज्यों के किसान इसकी खेती कर सकते हैं:
- दिल्ली
- पंजाब
- हरियाणा
- उत्तराखंड
- जम्मू एवं कश्मीर
- पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बासमती उत्पादक क्षेत्र
पैदावार और समय अवधि
- ऋतु: यह खरीफ (Kharif) सीजन की फसल है।
- पकने की अवधि: यह किस्म औसतन 135 दिनों में पककर तैयार हो जाती है।
- औसत उपज: इसकी सामान्य औसत उपज 46.9 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।
- संभावित (अधिकतम) उपज: अनुकूल परिस्थितियों में यह 59.7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन दे सकती है।
- उत्पादन की स्थिति: इसे सिंचित अवस्था (Irrigated conditions) में उगाने के लिए तैयार किया गया है।
पूसा बासमती 1882 की मुख्य विशेषताएं
यह किस्म असल में लोकप्रिय बासमती किस्म ‘पूसा बासमती 1’ का ही एक आधुनिक और उन्नत रूप है। वैज्ञानिकों ने इसमें qDTY 1.1 नाम का एक विशेष क्यूटीएल (QTL) जीन शामिल किया है। यह जीन पौधे को उस समय सूखे से लड़ने की ताकत देता है जब फसल में बालियां आ रही होती हैं (प्रजनन चरण)।
रिसर्च के दौरान देखा गया कि जब रेन आउट शेल्टर (कृत्रिम सूखा क्षेत्र) में दोनों किस्मों का परीक्षण किया गया, तो जहां पुरानी पूसा बासमती 1 ने केवल 496 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की उपज दी, वहीं नई पूसा बासमती 1882 ने 987.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की शानदार औसत उपज दर्ज की। यानी सूखे में भी लगभग दोगुनी पैदावार!
इसके अलावा, अगर सामान्य रूप से समय पर सिंचाई की जाए, तो यह अपनी मूल किस्म (पूसा बासमती 1) के मुकाबले 10.26% अधिक पैदावार देती है।
किसानों के लिए क्यों है यह फायदे का सौदा?
मौसम में आ रहे बदलावों और पानी के गिरते जलस्तर को देखते हुए यह किस्म किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। यदि फसल चक्र के दौरान अचानक पानी की कमी हो जाती है, तब भी यह किस्म किसानों की लागत डूबने नहीं देगी। कम लागत, कम पानी और कम समय (135 दिन) में शानदार पैदावार के कारण यह बासमती उत्पादकों के लिए मुनाफे का सौदा साबित हो रही है।