चीकू (SAPOTA) की आधुनिक खेती कैसे करें ?

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Sapota chiku ki kheti
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चीकू की खेती

चीकू की खेती (Sapota Farming India ) भारत के आंध्रप्रदेश, गुजरात, महारष्ट्र, कर्नाटक तथा तमिलनाडु राज्यों में की जाती है | हाल  के वर्षों में इसकी खेती अलग – अलग राज्यों में होने लगी है | इसकी खेती में कम लगत में अधिक मुनाफे के कारण तेजी से लोकप्रिय हो रही है | इस फल के लिए एक खास बात यह है की इसकी खेती के लिए कम सिंचाई के साथ – साथ रख – रखाव आसान है | सबसे बड़ी बात है की इसकी अधिक मांग रहने से बाजार आसानी से उपलब्ध हो जाता है | लेकिन उन्नत तरह से खेती करने से चीकू का उत्पादन अधिक होता है |

उन्नत किस्में

बड़े फल तथा पतले छिलके के साथ गुदा मीठा अच्छे चीकू का पहचान है इसलिए इसकी उन्नत किस्मों का अधिक ध्यान रखना जरुरी है | चीकू की उन्नत किस्में क्रिकेट बाल, कलि पत्ती, भूरी पत्ती, पी.के.एम.1, डीएसएच – 2 झुमकिया, आदि किस्में अति उपयुक्त है | क्रिकेट की बाल, कालीपट्टी, कलकत्ता राउंड, कीर्तिभारती, द्वारापुड़ी, पाला, पीकेएम -1, जोनावालासा I और II, बैंगलोर, वावी वलसा आदि परन्तु उत्तरभारत में बारहमासी किस्म ज्यादा फेमस है |

पौध प्रवर्धन

चीकू की पौध बीज तथा कलम , भेट कलम से तैयार की जाती  है लेकिन व्यवसायिक खेती के लिए किसान को शीर्ष कलम, तथा भेंट कलम विधि द्वारा तैयार पौधों को ही बोना चाहिए | पौध तैयार करने की सबसे उपयुक्त समय मार्च – अप्रैल है |

पौधों की रोपाई 

पौधों की रोपाई वर्ष ऋतू में उपयुक्त रहती है | पौधों की रोपाई से पहले पौधों के लिए जड़ों को तैयार जरुर कर लेना चाहिए | इसके लिए गर्मी के दिनों में ही 7 – 8 मी. दुरी वर्गाकार विधि से 90 से.मी. गहरा आकार के गड्डे तैयार कर लेना चाहिए | गड्डों को भरते समय मिट्टी के साथ लगभग 30 किलोग्राम गोबर की अच्छी तरह सड़ी खाद, 2 किलोग्राम करंज की खली एवं 5 – 7 कि.ग्रा. हड्डी का चुरा प्रत्येक गद्दे में डालकर भर देना चाहिए | पौधों को बोने के बाद जड़ों में मिट्टी भरकर थाला बना लें |

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खाद एवं उर्वरक का उपयोग

पेड़ों में समय – समय पर खाद देते रहना चाहिए , जिससे पौधों का विकास 10 वर्षों तक होता रहे | पोधों के रोपाई के एक वर्ष बाद 4 – 5 टोकरी गोबर की खाद , 2 – 3 कि.ग्रा. अरण्डी / करंज की खली एवं 50:25:25 ग्रा. एन.पी.के. प्रति वर्ष डालते रहना चाहिए | यह मात्रा 10 वर्ष तक बढ़ाते रहना चाहिए तत्पश्चात 500:250:250 ग्रा. एन.पी.के. की मात्रा प्रत्येक वर्ष देना चाहिए | इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए की खाद और उर्वरक का उपयोग केवल जून तथा जुलाई में ही करना चाहिए | खाद सीधे जड़ में नहीं डालें बल्कि इसके लिए पौधे से दूर एक नाली बना लें उस नाली से खाद का घोल बनाकर दें |

सिंचाई

बरसात के मौसम में सिंचाई की जरुरत नहीं पड़ती है  लेकिन गर्मी के मौसम में 7 दिन पर तथा सर्दी के मौसम में 15 दिन पर सिंचाई करने से पौधों में फल तथा फूल अच्छे लगते है |

पौधों की देख रेख तथा काट छांट

चीकू के पौधों को विशेष रूप से सर्दी के मौसम में पाले से बचाना जरुरी रहता है | यह खास ध्यान पौधों की रोपाई के 3 वर्ष तक रखने की जरुरत है | इसके लिए छोटे पौधों को बचाने के लिए पुआल या घास के छप्पर से इस प्रकार ढक दिया जाता है कि वे तीन तरफ से ढके रहते हैं और दक्षिण – पूर्व दिशा धूप एवं प्रकाश के लिए खुली रहती है |

पौधों की रोपाई के समय मूल वृत्त पर निकली हुई टहनियों को काटकर साफ कर देना चाहिए | पेड़ का क्षत्रक भूमि से 1 मी. ऊँचाई पर बनने देना चाहिए | जब पेड़ बड़ा हो जाता है , तब उसकी निचली शाखायें झुकती चली जाती है और अन्त में भूमि को चुने लगती है तथा पेड़ की ऊपर की शाखाओं से ढक जाती है | इस शाखाओं में फल लगने भी बंद हो जाते हैं | इस अवस्था में इन शाखाओं को छीलकर निकाल देना चाहिए |

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पुष्पन एवं फलन

शीर्ष कलम तथा भेंट कलम के द्वारा तैयार पौधों में 2 वर्षों के बाद फूल एवं फल आना आरम्भ हो जाता है | इसमें फल साल में 2 बार आते है | पहली फ़रवरी से जून तक और दूसरा सितम्बर से ऑक्टोबर तक | फूल लगने से लेकर फल पककर तैयार होने में लगभग चार महीने लग जाते हैं | चीकू के पौधों  से फल को गिरने से रोकने के लिए फूल के समय जिबरेलिक अम्ल के 50 से 100 पी.पी.एम. अथवा फल लगने के तुरंत बाद प्लैनोफिक्स 4 मिली./ली. पानी के घोल का छिड़काव करने से फलन में वृद्धि एवं फल गिरने में कमी आती है |

रोग एवं कीट नियंत्रण

चीकू की पौधों में एक विशेषता यह रहती है की इस पर रोगों तथा कीटों का प्रकोप कम होता है | इसके बाबजूद भी पर्ण दाग रोग तथा कलि बेधक , तना बेधक, पत्ती लपेटक एवं मिलीबग आदि कीटों का प्रभाव देखा जाता है | इसके नियंत्रण के लिए मैंकोजेब 2 ग्रा./ लीटर तथा मोनोक्रोटोफास 1.5 मिली./ लीटर के घोल का छिड़काव करना चाहिए |

उपज

चीकू में रोपाई के दो वर्ष फल मिलना प्रारम्भ हो जाता है | जैसे – जैसे पौधा पुराना होता जाता है | उपज में वृद्धि होती जाती है | एक 30 वर्ष पेड़ से 25,00 से 3,000 तक फल प्रति वर्ष हो जाते हैं |

 

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