जानिए क्यों होती है भेड़ एवं बकरियों के वजन में कमी, कैसे बढ़ा सकते हैं भेड़-बकरियों का वजन

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sheep and goats weight

भेड़ एवं बकरियों का वजन

किसानों के लिए खेती के अलावा दूसरा आय का साधन पशुपालन है, इसमें दो प्रकार के पशुपालन किए जाते हैं एक तो दूध प्राप्त करने के लिए और दूसरा मांस के लिए | मांस के लिए अक्सर भेड़ पालन या बकरी का पालन किया जाता है | देश भर में बड़े पैमाने पर भेड़ बकरी का पालन किया जाता, ग्रामीण क्षेत्रों में यह रोजगार एवं आय का मुख्य साधन है | भेड़ तथा बकरी की कमाई इस बात पर निर्भर करता है कि उसका वजन कितना है | भेड़ बकरियों में कई प्रकार की ऐसी बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती है जीससे भेड़ बकरी का वजन कम हो जाता है |

पशुओं के समूह इस तरह बनायें

रेवड़ के पशुओं में दाना और चारे के लिए आपसी प्रतिस्पर्धा भी शरीर के वजन को कम कर सकती है | आमतौर पर पशुओं के समूह में समान प्रबंधन त्रुटियों के परिणामस्वरूप कमजोर और दब्बू पशुओं में शरीर का वजन प्राय: कम होता जाता है | ताकतवर और बड़े पशु, कमजोर पशुओं के आहार व स्थान पर भी अपना अधिकार जताते हैं | इससे आहार तक पहुँच से वंचित होने के कारण, कमजोर पशु और अधिक कमजोर होते जाते हैं | इसलिए पशुओं उम्र, नस्ल, लिंग, शरीरिक स्थिति आदि के अनुसार समूह बनाना हमेशा उचित होता है |

दांतों की समस्या से भी कम हो सकती है वजन में कमी

दांतों में समस्या के कारण भी चारा चबाने या निगलने की सामान्य प्रक्रिया प्रभावित होती है | भेड़ों में इंसिजर दांत आहार निगलने में प्रयोग किये जाते हैं | निकले हुए दांत, मसूड़े, की सुजन, पीरियडोंटल रोग जैसे मुँह के रोग, निगलने एवं चबाने की प्रक्रिया में परेशानी का कारण हो जाते हैं | इससे सामान्य चारे का सेवन प्रभावित होता है और पशु पर्याप्त आहार से वंचित रह जाता है | वजन कम होने की जाँच में दांत परीक्षण भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए | बढ़े हुए या घिसे हुए दांत, खनिज की कमी या फ्लोरोसिस की अधिकतम से भी हो सकते हैं | चिकित्सकीय रूप से वजन में कमी, इंसिजर दांतों के असामान्य आकार, कड–स्टेनिंग कड – ड्राफ्टिंग, जबड़े की सुजन के रूप में प्रकट होते हैं और ये वजन घटने के कारण हो सकते हैं | इस समस्या के निदान के लिए समय–समय पर पशु मुँह का परीक्षण करवाना चाहिए | कैल्शियम का उपयोग तथा आस्मां दांतों की सतह को खुरचना भी लाभप्रद होता है |

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खनिज लवण की कमी से भी हो सकते हैं रोग

कोबाल्ट, काँपर व सेलिनियम अतिआवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व हैं | इनकी कमी अथवा असंतुलन के कारण पशुओं में विभिन्न प्रकार से वजन कम होता है | कोबाल्ट की कमी से शरीरिक वजन में वृद्धि रुक जाती है | उच्च वर्षा, लिंचिंग, उच्च पी–एच, मैंगनीज की अधिकता, शुष्क मिट्टी, रेतीले तटीय मिट्टी आदि में कोबाल्ट स्वाभाविक रूप से कम पाया जाता है | इसी प्रकार काँपर की कमी से मेमने का विकास कम हो जाता है या मृत्यु भी हो जाती है, जिससे पशुपालकों को बहुत नुकसान होता है |

भेड़पालन एवं बकरीपालन में सेलिनियम भी एक महत्वपूर्ण तत्व है | इसकी कमी से मादा पशुओं में गर्भपात और प्रजनन सम्बन्धी समस्या बहुत अधिक हो जाती है इससे पैसा होने वाले मेमने कमजोर अथवा मृत पैदा होते हैं | उनका विकास भी बाधित होता है, जो मेमने जीवित होते हैं, उनमें अचानक म्रत्यु की समस्या अधिक देखि जाती है | इसको वाइट मसल रोग कहा जाता है | इन समस्याओं के निदान के लिए पशुओं को खनिज मिशन पाउडर उचित मात्र में खिलाना चाहिए |

परायक्ष्मा (जोन्स रोग)

यह भेड़ और बकरियों में होने वाला पुराना रोग है | यह वजन घटने की समस्या के लिए सीधे तौर से जिम्मेदार होता हैं | संक्रमित पशु का सही मात्रा में चारा खाते हुए भी वजन कम होना, मांसपेशियों का कम होना, जबड़ों के नीची पानी इकट्ठा होना, खून की कमी, ऊन का झड़ना, गंदी पूंछ और पेरिनियम, बार–बार दस्त लगना आदि इसके लक्षण हो सकते हैं | इस रोग में संक्रमित पशु चरागाह को भी मल त्याग से दूषित करते हैं | नियंत्रण के लिए पशुओं की समय – समय पर जांच, स्वस्थ पशुओं को पालना, खेत में प्रवेश करने से पहले प्रतिस्थापन पशुओं की जांच करना इत्यादि प्रभावी होते हैं |

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लंगड़ी रोग (फीटरॉट) / लंगड़ापन / खुरगलन

भेड़ एवं बकरियों के पैरों में सडन या गलन (लंगड़ापन) एक बहुत ही गंभीर समस्या है | यह रोग एक पशु से दुसरे पशु में फैलता है और वजन कम होने का कारण बनता है | खुरों का नरम होना या अधिक गीलापन होना भी इस रोग के मुख्य कारण हो सकते हैं | लंगड़ेपन की वजह से विकास दर कम रह जाती है और पशु अन्य पशुओं से कमजोर होता चला जाता है | इस रोग के निवारण के लिए पशुपालकों को जागरूकता के साथ–साथ फूट्बाथ का इस्तेमाल करना चाहिए तथा गीली जगह से हटाकर समय पर उपचार करवाना चाहिए |

परजीवी संक्रमण

आंतरिक व बाहरी परजीवी संक्रमण शरीर के वजन के नुकसान का कारण बन सकता है | प्रत्येक परजीवी का भेड़ और बकरी को बीमार करने का अपना अलग–अलग तरीका होता है | फीताकृमि, भेड़ और बकरियों की आंत में पोषक तत्वों को अवशोषित करने में सक्षम होती है | इससे शारीरिक वजन बढना बंद हो जाता है | कोक्सीडियन परजीवी आंतों की दीवार को नुकसान पहुंचाते हैं और आंतों से पोषक तत्वों के अवशोषण में बाधा डालते हैं | परजीवी ग्रसित आंत्रशोथ, एक अन्य गोलकृमि, हैमोनक्स के कंटोर्ट्स कारण होता है | यह दुनियाभर के चरागाहों पर चरने वाले मेमनों में सबसे महत्वपूर्ण और गंभीर समस्या है | ज्यादा संख्या में हैमोनकस कंटोर्ट्स कृमियों से गंभीर संक्रमण होता है और खून व प्रोटीन की कमी हो जाती है |

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