धान के अधिक उत्पादन के लिए इस तरह करें बीज शोधन

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dhaan beej upchar

धान हेतु बीज शोधन

मानसूनी बारिश सही समय पर आने की सम्भावना को देखते हुए किसानों खरीफ फसलों की बुआई की तैयारी शुरू कर दी है  | खरीफ फसलों में सबसे महत्वपूर्ण हैं धान की खेती | देश के अधिकांश किसानों ने धान की नर्सरी डालने का काम शुरू भी कर दिया गया है | अगेती धान की नर्सरी डाली जा चुकी है तो वहीँ मध्य अवधि तथा पिछेती धान कि खेती के लिए नर्सरी देने का काम जोरों पर चल रहा है | धान कि खेती से पहले इस बात को जानना जरुरी है कि धान कि फसल में लगने वाले रोगों को कैसे रोका जा सकता है | कुछ रोग तथा कीटों को धान कि बुवाई के समय ही यदि बीजों का शोधन किया जाए तो आगे लगने वाले कीट रोगों से बचाया जाता है | जिससे धान की फसल की लागत कम की जा सकती है तथा अधिक उत्पादन से आय में भी वृद्धि की जा सकती है | किसान समाधान धान की नर्सरी तैयार करने से पहले विभिन्न रोग से बचाव के लिए विभिन्न प्रकार के रसायनिक विधि द्वारा रोकथाम करने की जानकारी लेकर आया है |

धान बीज शोधन के लिए महत्वपूर्ण बातें

  • खेत में बुआई अथवा रोपाई पूर्व पुष्ट बीज का चयन आवश्यक है ।
  • इस कार्य के लिये सबसे पहले बीज को नमक के घोल में डालें । दस लीटर पानी में 1.7 किलो सामान्य नमक डालकर घोल बनाएं और इस घोल में बीज डालकर हिलाएं, भारी एवं स्वस्थ बीज नीचे बैठ जाएंगे और हल्के बीज ऊपर तैरने लगेंगे । हल्के बीज निकालकर अलग कर दें तथा नीचे बैठे भारी बीजों को निकालकर साफ पानी में दो-तीन बार धोएं व छाया में सुखाए ।
  • कवकनाशी दवाओं से बीज का उपचार करने से बीजों के माध्यम से फैलने वाले कवकजनित रोग फैलने की आशंका नहीं रहती है । इसके लिए बीजों को 2.5 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें । बीज उपचार के लिये बीज उपचार यंत्र (सीड ट्रीटिंग ड्रम) में बीज आधा भर लेते हैं तथा बीज की मात्रा के अनुसार आवश्यक कवकनाशी डालकर घुमा कर 5 मिनट बाद बीज की बुआई की जा सकती है ।
  • प्रमाणित किस्म के बीज का उपयोग करने पर नमक के घोल में डुबोने की आवश्यकता नहीं होती है ।
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झुलसा एवं सडन रोग से बचाव के लिए बीज शोधन

धान की फसल में विभिन्न प्रकार के रोग लगते हैं इसमें से सडन तथा झुलसा रोग महत्वपूर्ण है | इस रोग से कभी–कभी 50 प्रतिशत तक फसल का नुकसान हो जाता है | इस रोग से बचाव के लिए धान की नर्सरी तैयार करने से पहले ही बीजोपचार करें | इससे बीजों का अंकुरण अच्छा होता है एवं फसलें फफूंदी जनित रोगों से मुक्त रहती है |

भूमि शोधन के लिए 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर ट्राईकोडर्मा को लगभग 75 किलोग्राम गोबर कि सड़ी खाद में मिलाकर हल्के पानी का छींटा देकर 7–8 दिन के लिए छायादार स्थान पर रखें एवं बुवाई के पूर्व आखिरी जुताई पर भूमि में मिला दें | बीजशोधन के लिए 04 किलोग्राम ट्राईकोडर्मा प्रति किलोग्राम बीज की दर से शुष्क बीजोपचार कर बुवाई करना चाहिए | इसी प्रकार ब्युवेरिया जैव कीटनाशी विभिन्न फसलों में लगने वाले फ्लाई वेधक, पत्ती लपेटक, पत्ता भक्षक, चूसने वाले कीटों और भूमि में दीमक व सफेद गिडार आदि की रोकथाम के लिए लाभकारी है | इसका उपयोग ट्राईकोडर्मा के समान होता है |

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बैक्टरियल ब्लाईटरोग से प्रभावित क्षेत्र के लिए बीज शोधन

बैक्टरिया ब्लाईट रोग से प्रभावित क्षेत्र में 25 किलोग्राम बीज के लिए 04 किलोग्राम स्ट्रेप्टोसाईक्लिन या 40 ग्राम प्लाटोमाइसिन पानी में मिलाकर रात भर बीज को भिगोकर, दुसरे दिन छाया में सुखाकर नर्सरी में डालना चाहिए | इसके अतिरिक्त 25 किलोग्राम बीज को रात भर पानी में भिगोकर बाद में दुसरे दिन अतिरिक्त पानी निकालकर 75 ग्राम थीरम या 50 ग्राम कार्बेन्डाजिम को 8 – 10 ली. पानी में घोलकर बीज में मिला दें फिर छाया में अंकुरित कर नर्सरी में डालें | नर्सरी लगने के 10 दिन के भीतर ट्राईकोडर्मा का एक छिडकाव कर दें | यदि नर्सरी में कीटों का प्रभाव दिखाई दे तो 1.25 ली. क्यनालफास 25 ईसी या 1.5 ली. क्लोरपायरिफास 20 ईसी प्रति हेक्टेयर में छिडकाव करें |

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