राजस्थान

अल नीनो और 35 दिनों के लंबे सूखे को मात: ICAR-CAZRI की 4 नई मोठ किस्मों ने पश्चिमी राजस्थान में रचा इतिहास

राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों के लिए CAZRI ने मोठ की 4 नई सूखा सहनशील किस्में विकसित की हैं। खरीफ 2026 में 35 दिन के सूखे के बावजूद इन किस्मों ने बेहतर वृद्धि और फलियां विकसित कीं।

ICAR CAZRI Moth Bean Drought Resistant Varieties

पश्चिमी राजस्थान के कम बारिश वाले इलाकों में मोठ की खेती करने वाले किसानों के लिए चार नई किस्में उम्मीद की नई किरण बन सकती हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (ICARCAZRI), जोधपुर द्वारा विकसित काजरी मोठ-4, काजरी मोठ-5, काजरी मोठ-6 और काजरी मोठ-7 ने खरीफ 2026 के बेहद कठिन मौसम में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है।

खास बात यह है कि फसल को ऐसे समय में करीब 35 दिनों के लंबे सूखे का सामना करना पड़ा, जब पौधों में फूल आने, फलियां बनने और दाने विकसित होने की प्रक्रिया चल रही थी। इसके बावजूद बुआई के लगभग 55 दिनों बाद पौधों में हरियाली, अच्छा फैलाव और बड़ी संख्या में फलियां देखने को मिलीं।

पश्चिमी राजस्थान में करीब 10 लाख हेक्टेयर में होती है मोठ की खेती

मोठ बीन पश्चिमी राजस्थान के गर्म और शुष्क क्षेत्रों की प्रमुख दलहनी फसलों में शामिल है। इसकी खेती लगभग 10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में की जाती है, लेकिन प्रतिकूल मौसम के कारण इसकी औसत उत्पादकता करीब 350 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक ही सीमित रहती है।

इस क्षेत्र में कई जगह केवल 150 से 250 मिमी बारिश होती है। इसके साथ 20 से 30 दिनों या उससे अधिक समय तक बारिश नहीं होने और मिट्टी में नमी की कमी जैसी परिस्थितियां फसल के लिए बड़ी चुनौती बन जाती हैं। इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए CAZRI ने लंबे समय से मोठ बीन के आनुवंशिक सुधार और ब्रीडिंग पर काम किया है।

CAZRI ने विकसित की मोठ की 4 नई किस्में

पिछले तीन वर्षों में संस्थान ने चार किस्में जारी की हैं:

  • काजरी मोठ-4
  • काजरी मोठ-5
  • काजरी मोठ-6
  • काजरी मोठ-7

इन किस्मों को खासतौर पर शुष्क क्षेत्रों की कम और अनिश्चित बारिश जैसी परिस्थितियों में बेहतर तरीके से अनुकूल होने के लिए विकसित किया गया है।

खरीफ 2026 के दौरान इन किस्मों को लगभग 35 दिनों तक गंभीर नमी की कमी का सामना करना पड़ा। इसके बाद भी पौधों ने अपनी वृद्धि और फलियों का विकास जारी रखा।

35 दिनों तक नहीं हुई अच्छी बारिश

फसल चक्र के दौरान 3 अगस्त को अच्छी बारिश होने के बाद मानसून लंबे समय तक थम गया। 3 अगस्त से 7 सितंबर के बीच करीब 35 दिनों का सूखा दौर रहा।

इस अवधि में लगभग 180 मिमी वाष्पीकरण दर्ज किया गया। एक महीने से अधिक समय तक पर्याप्त बारिश नहीं होने के कारण ऊपरी 0-10 सेंटीमीटर मिट्टी में नमी करीब 15-16 प्रतिशत से गिरकर केवल 5-6 प्रतिशत रह गई।

हालांकि 10 से 40 सेंटीमीटर की गहराई वाली मिट्टी में नमी करीब 16 प्रतिशत तक बनी रही। पौधों की जड़ों ने इस उपलब्ध नमी का उपयोग किया और फसल लंबे सूखे का सामना करने में सफल रही।

30 दिनों में फलने-फूलने लगती हैं किस्में

इन नई किस्मों की महत्वपूर्ण विशेषताओं में उनकी Developmental Plasticity यानी उपलब्ध वातावरण और नमी के अनुसार वृद्धि एवं विकास को ढालने की क्षमता शामिल है।

ये किस्में बुआई के करीब 30 दिनों के भीतर फलने-फूलने की अवस्था में पहुंच सकती हैं। मिट्टी में उपलब्ध नमी के अनुसार पौधे अपनी वृद्धि और पकने की अवधि को समायोजित कर सकते हैं।

पश्चिमी राजस्थान जैसे क्षेत्रों में यह गुण विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है, क्योंकि यहां मानसून की बारिश की मात्रा और समय दोनों में काफी अनिश्चितता रहती है।

सही फसल प्रबंधन ने भी निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

वैज्ञानिकों के अनुसार केवल किस्मों की आनुवंशिक क्षमता ही नहीं, बल्कि उचित फसल प्रबंधन ने भी इनके प्रदर्शन में अहम भूमिका निभाई।

मानसून शुरू होते ही समय पर बुआई, 45 × 10 सेंटीमीटर की पौध दूरी, बुआई के लगभग 20 दिन बाद यांत्रिक गुड़ाई, खरपतवार नियंत्रण और मिट्टी की नमी संरक्षित रखने जैसे उपाय अपनाए गए।

विशेष बात यह रही कि परीक्षण वाले खेतों की मिट्टी बहुत अधिक उपजाऊ नहीं थी। इसके बावजूद नई किस्मों ने कठिन परिस्थितियों में अपनी क्षमता दिखाई।

बड़े स्तर पर तैयार किया जा रहा इन किस्मों का बीज

इन किस्मों के बीज की भारी मांग को देखते हुए साथी (SATHI) पोर्टल के माध्यम से वर्ष 2026 के लिए 23.32 क्विंटल ब्रीडर बीज की मांग दर्ज की गई है, जिसके लिए काजरी के 7 हेक्टेयर फार्म पर बीज उत्पादन का काम जारी है (2025 में 63.2 क्विंटल की मांग थी)।

1 क्विंटल ब्रीडर बीज से लगभग 1,000 से 1,400 क्विंटल सर्टिफ़ाइड बीज तैयार होता है। यदि इस क्षमता का 50% भी हासिल कर लिया जाए, तो राजस्थान में कुल मोठ रकबे के लगभग 25 प्रतिशत हिस्से को इन उन्नत किस्मों के दायरे में लाया जा सकता है। वर्तमान में राजस्थान राज्य बीज निगम (RSSC) और राष्ट्रीय बीज निगम (NSC) इसका उत्पादन कर रहे हैं।

राजस्थान के मोठ किसानों को मिल सकता है बड़ा फायदा

अगर इन किस्मों के बीज का पर्याप्त गुणन और किसानों तक विस्तार किया जाता है तो पश्चिमी राजस्थान के बड़े मोठ उत्पादक क्षेत्र को इसका लाभ मिल सकता है। उपलब्ध आकलन के मुताबिक संभावित क्षमता का 50 प्रतिशत भी हासिल होने पर राज्य के कुल मोठ क्षेत्र के करीब एक चौथाई हिस्से तक इन किस्मों को पहुंचाया जा सकता है।

DARE के सचिव एवं ICAR के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट के अनुसार मोठ बीन थार मरुस्थल की अनूठी फसल है और CAZRI की जलवायु-अनुकूल किस्में किसानों के लिए आय के नए अवसर पैदा करने के साथ दलहन आत्मनिर्भरता में योगदान दे सकती हैं।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बेहतर किस्मों के साथ समय पर बुआई, पौधों की उचित संख्या, खरपतवार नियंत्रण और नमी संरक्षण जैसी बेहतर कृषि पद्धतियों को अपनाना जरूरी है।

मंडी भाव, मौसम और सरकारी योजनाओं का तुरंत अपडेट पाने के लिए:

अपनी टिप्पणी लिखें

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *