नींबू की लाभकारी बागवानी किसान भाई इस तरह से लगाएं

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नींबू की बागवानी

नींबू अधिक आय देने वाला फल है | नींबू का पौधा मध्यम आकार का चार, पांच मीटर ऊँचा तथा फैला हुआ रहता है | इसका वृक्ष वर्ष में दो बार फल देता है जुलाई – अगस्त में एवं नवम्बर से जनवरी में फल प्राप्त होते हैं | उत्तम गुणों के फल शीत ऋतू या नवम्बर – जनवरी में प्राप्त होते हैं | नींबू की खेती में तीन वर्ष की उम्र में फलना आरम्भ कर देता है एवं पांच वर्ष की उम्र के बाद भरपूर फसल प्राप्त होने लगती है |

लेखक-आर.के.मिश्रा

नींबू की खेती के लिए उपयुक्त भूमि 

  • कपासी क्षेत्र की एक मीटर से दो मीटर गहराई वाली और नीचे मुरम या चुना कंकड़ मिश्रित रेट की वाली दोमट भुरभुरी मिटटी और कचहरी मिटटी उपयुक्त होती है | अधिक चिकनी मिटटी इसके लिए उपयुक्त नहीं होती है |
  • उपजाऊ तथा सामान्य बनावट की दुमट मिटटी नींबू लगाने के लिए अच्छी मणि जाती है | भूमि में पानी का भराव नहीं होना चाहिए नींबू विभिन्न प्रकार की अच्छी जल निकास वाली मिटटी में अच्छी तरह बढ़ता है |
  • मिट्टी की कड़ी परत या चट्टान तल से पांच फीट की गहराई तक नहीं होना चाहिए मिट्टी में चुने की मात्रा अच्छी होना चाहिए नींबू अम्लीय मिट्टी में अच्छी पैदावार देते हैं |

नींबू की खेती के लिए जलवायु

उपोष्ण जलवायु में नींबू अच्छा पैदा होता है नींबू के लिए तापक्रम 15 डिग्री सेल्सियस से 30 डिग्री सेल्सियस उचित माना गया है | नींबू में सहन शीतल अधिक होती है पाले से हानि की संभावना होती है | यह समुद्र ताल से 900  मीटर ऊँचाई तक सफलता पूर्वक लगाया जा सकता है |

नींबू के लिए भूमि की तैयारी

पौध रोपण की विधि :- वर्गाकार या आयताकार विधि से रेखांकन कर 6 × 6 मीटर अन्तर पर 60 × 60 × 60 से.मी.लम्बे चौड़े गहरे गड्डे खोदें एवं उसमें गोबर का अच्छा सदा हुआ क्म्पोष्ट खाद 25 किलो , सुपर फस्फोत 400 ग्राम, म्यूरेट आफ पोटास 150 ग्राम तथा बी.एच.सी. डस्ट 5 % , 25 ग्राम डाले एवं मिटटी में अच्छी तरह मिला कर गड्डे खोदने के एक माह बाद भरें गड्डे जमीन की की तरह से 15 से.मी. ऊँचे भरें |

पौध रोपण का समय :– 15 जुलाई से 15 15 अगस्त तक का समय पौधे लगाने का अच्छा समय है | उत्तम गुणवत्ता के स्वस्थ्य पौधों का रोपण करना चाहिए | गर्मी में खोदे गए गड्डों एवं वर्षा ऋतू के पूर्व भरे गए गड्डों में निश्चित स्थान पर पौधों का रोपण करें |

पौध रोपण के बाद मिटटी बाहर से तने की ओर अच्छी तरह दबाएँ जिससे पौधों की जड़ों के आस – पास हवा न रहे पौध रोपण के तुरन्त बाद सिंचाई करें |

नींबू में सिंचाई :-

छोटी उम्र के नींबू के पौधों को जल्दी – जल्दी पानी देना चाहिए | गर्मी में पौधों में अधिक सिंचाई करना चाहिए , मिटटी में नमी को देखकर सिंचाई करना चाहिए ठंड में ज्यादा सिंचाई करना हानिकारक है इससे मिटटी का तापमान कम हो जाने से जड़ों की कार्य क्षमता धीमी पड़ जाती है सिंचाई इस प्रकार चाहिए कि पानी तने को छूने न पाये इससे तने के गलने (मगोसिस) का दर रहता है | गर्मी में मई – जून में सप्ताह में एक बार या दस दिन के अंतर से सिंचाई करना चाहिए | सिंचाई के बाद जब पानी निचली स्थ पर चला जाये एवं उपरी स्थ पर पपड़ी जैम जाये तब गुडाई करना चाहिए जिससे नमी बनी रहे |

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फूल फल आने का समय :-

नींबू के पौधों में 3 साल बाद फूल – फल आते हैं और साल भर फल प्रपात किये जा सकते हैं नीबू के पौधों में फसल इसकी विशेष जाती, वातावरण आदि पर निर्भर करता है |

फूलने के 5 से 9 माह बाद फल पककर तैयार हो जाता है जब फल का रंग पिला पद जाता है तब फलों को तोड़ लिया जाता है |

कटाई छटाई :-

नींबू के पौधों की कटाई छटाई इन्हें अच्छा आकार देने के लिए की जाती है जब पौधे छोटे हो तभी कटाई छटाई अच्छी तरह कर देना चाहिए ताकि बाद में इनका ढाँचा मजबूत रहे | पौधे से एकाएक निकलने वाले और अतिशीघ्र वृद्धि करने वाले प्ररोहों को काट देना चाहिए मरी हुई रोग ग्रस्त व सुखी शाखाओं को भी काट कर अलग क्र देना चाहिए |

प्रारंभ में छोटे पौधे की इस प्रकार काट – छांट करना चाहिए कि भूमि के टल से लगभग 60 से 90 से.मी. तक कोई शाखा न निकले जिससे कि इतनी ऊँचाई तक एक प्रमुख तना विकसित हो सके और बाद में इस पर तिन से पांच प्रमुख शाखाएँ ली जा सकें जिससे पेड़ का एक अच्छा आकार तैयार हो और बाद में खाद पानी देने में भी सुविधा रहे |

खाद तथा उर्वरक

वर्ष
गोबर खाद किलो ग्राम
नत्रजन ग्राम
 स्फुर ग्राम
पोटाश ग्राम

प्रथम

10

100

50

50

दिवतीय

20

150

75

75

तृतीय

30

200

100

100

चतुर्थ

40

250

125

125

पंचम

50

300

150

150

षष्टम

50

400

200

200

गोबर की खाद या क्म्पोष्ट खाद , स्फुर और पोटाश की प्री मात्रा एवं नत्रजन की आधी मात्रा वर्षा आरम्भ होने पर दें |नत्रजन की शेष मात्र वर्ष समाप्त पर दें | नत्रजन की मात्रा को बराबर तिन भागों में बाँटकर क्रमश: फरवरी, जुलाई और अक्तूबर माह में दें | खाद एवं उर्वरक पौधे के फैलाव के अनुसार देना चाहिए एवं अक्तूबर तथा फरवरी माह में जिंक सल्फेट के 0.5 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें |

सूक्ष्म पोषक तत्वों का छिड़काव – भारत में नींबू के वृक्षों में लगभग सभी जगह जस्ता तांबा तथा मैंगनीज की कमी पाई जाती है सूक्ष्म तत्वों की कमी से पौधों की बढवार धीमी पद जाती है पत्तियां छोटी रह जाती है तथा शाखाएँ सूखने लगती है इस स्थिति में सूक्ष्म तत्वों का छिड़काव जरुरी है चार या पांच किलो सूक्ष्म तत्व 1000 लीटर वाली में मिलाने से घोल तैयार हो जाता है यदि जस्ते और ताँबे का एक साथ ही छिड़काव करना हो तो 1000 लीटर पानी में कापर सल्फेट एवं बुझा हुआ चुना तीनों मिला कर 4 – 4 किलो का घोल बनाएं यह घोल 8 से 10 वर्ष पुराने वृक्षों के लिए पर्याप्त होता है |

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पौध संरक्षण

कीड़े :-

नींबू की तितली – यह भूरे काले रंग की होती है इसके शरीर पर काले धब्बे पाये जाते हैं बड़ी इल्ली का रंग हर होता है यह नींबू के छोटे पौधों की पुर्न पत्तियों को खाकर सिर्फ डंठल रहने देती है तीव्र आक्रमण से पुर्न पौधा पत्ती रहित हो जाता है |

रोकथाम के उपाय

  1. मैलाथियान 0.05% या इंडोसल्फान 0.07% का छिड़काव करें |

लीफ माइनर :- इसकी इल्ली काफी छोटी पिली एवं चमकदार होती है पंखों के सिरों पर काला धब्बा पाया जाता है एवं पंखों के किनारे पर रोयें भी पाये जाते हैं |

यह सबसे अधिक हानि जुलाई – अगस्त में करती है इल्ली पत्ती में दधि मेढ़ी सुरंग बनाकर नुकसान करती है | इल्लियों पत्तियों का क्लोरोफिल खा जाती है बाद में पत्तियां सूखकर गीर जाती है |

रोकथाम

  1. मैलाथियान अथवा 0.03% फस्फामिडान का छिड़काव 15 दिन के अंतर से करें |
  2. नीम की खली का घोल (एक किलो खली 10 लीटर पानी में) प्रति 15वां दिन छिडकें |

नींबू की लाल मकड़ी (माँइट) :- यह सूक्ष्म लाल रंग की होती है | यह प्त्त्यों का रस चूसती है इस कारण पत्तियों का हरित द्रव होता है जिससे पत्तियों पर सफेद धब्बे पद जाते हैं | इसकी रोकथाम के लिए सल्फर 50% घुलन शील का छिड़काव करें |

रोग या बीमारियाँ

सिट्रस कंकर :- इसमें कारक के समान पत्तियों, टहनियों और फलां पर उठे हुये खुरदरे और पीले रंग के धब्बे होते हैं यह रोग कागजी नींबू में अधिक होता है |

रोकथाम :- इसकी रोकथाम के लिए प्रभावित अंगों का काट कर जला दें |

5:5:50 वोदों मिश्रण का छिड़काव करें | 5% नीम की खली के घोल का छिड़काव करें | (इस घोल को एक सप्ताह सदा लें) एग्री माँइसीन 100 का 0.06% के घोल छिड़काव करें |

सुखा रोग में पत्तियों का पीला पन दूर करने के लिए जस्ता 0.5% एवं लोहा (फ़र्स – सल्फेट) 0.4% का छिड़काव करें | माँइक्रान सी या ट्रेसल -2 का 0.5% छिड़काव करें एवं उचित उधानिकी क्रियाओं का प्रबंध करें |

लेखक – श्री आर.के.मिश्रा 
उद्यान अधीक्षक मोहारा, ब्लाक- जैसीनगर मध्यप्रदेश  

नींबू की बागवानी के लिए महीनेवार किये जाने वाले कृषि कार्य 

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