अधिक आय के लिए किसान गन्ने साथ करें इन फसलों की खेती

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ganne ki sahfasli kheti

गन्ने के साथ सह फसलीय खेती

गन्ने की खेती देश में बहुत लम्बे समय से की जा रही है | देश गन्ने के उत्पादन में प्रथम स्थान रखता है परन्तु गन्ना किसानों की आय में वृद्धि नहीं होने के चलते बहुत से किसान गन्ने की खेती को छोड़ दूसरी फसलों की ओर मुड़ने को मजबूर है | गन्ने के किसान जिस खेत में गन्ने की खेती करते हैं उस खेत से दूसरी फसल नहीं लेते हैं परन्तु किसान भाई अधिक आय के लिए गन्ने की सह-फसली खेती भी कर सकते हैं जिससे उन्हें अतिरिक्त आय प्राप्त हो सकती है | देश में वैज्ञानिकों के द्वारा गन्ने के साथ कई अन्य फसलों के उत्पदान के लिए प्रयोग किये गए हैं जिससे पता चलता है कि यह पद्धति किसानों के लिए बहुत ही लाभकारी है |

नई पद्धति से गन्ने के साथ सहायक फसल के रूप में खेती किया जा रहा है, इससे किसानों को गन्ने के साथ अतिरिक्त लाभ प्राप्त होता है | अलग–अलग समय में गन्ने के साथ अलग– अलग फसलों की खेती की जा सकती है | किसान समाधान गन्ने के साथ वर्ष भर सहायक फसल के रूप में अलग–अलग फसलों की खेती की जानकारी लेकर आया है |

सहफसली खेती क्या होती है ?

एक ही खेत में एक साथ, एक ही मौसम में दो या दो से अधिक फसलों को वैज्ञानिक विधि से इस प्रकार लगाया जाये ताकि प्रति इकाई क्षेत्रफल से कम लागत में अधिक से अधिक लाभ प्राप्त किया जा सके |

गन्ने के साथ सहफसली खेती करने से होने वाले लाभ

सहफसली से विभिन्न प्रकार के लाभ होता है जो इस प्रकार है :-

  • प्रति इकाई क्षेत्रफल से अधिक उत्पादन प्राप्त कर आमदनी को बढ़ाया जा सकता है |
  • गन्ने में प्रारम्भिक अवस्था में लगने वाली लगत को मुख्य फसल के तैयार होने से पहले ही सहायक फसल से निकला जा सकता है |
  • इस फसल प्रणाली में गन्ने के साथ दलहनी फसलों को उगाकर मृदा स्वास्थ्य को बनाये रखा जा सकता है |
  • मृदा से नमी, पोषक तत्व, प्रकाश एवं खली स्थान का समुचित उपयोग किया जा सकता है |
  • श्रम, पूंजी, पानी, उर्वरक इत्यादि को बचाकर लागत को कम किया जा सकता है |

बसंत एवं शरद ऋतू में गन्ने के साथ प्रमुख फसलें

हमारे देश में गन्ने की बुआई एक वर्ष में दो बार (बसंत एवं शरद) की जाती है | बसंत ऋतू में गन्ने के साथ मूंग, उड़द, लोबिया, भिंडी, करेला, लौकी, कददू, प्याज, गेहूं, चना, मसूर, मटर एवं आलू इत्यादि फसलों को लगाया जा सकता है |

गन्ना + मूंग / उड़द / लोबिया / भिंडी

गन्ना एक लंबी अवधि की फसल है और इसकी प्रारम्भिक वृद्धि धीमी गति से होती है, जबकि मूंग/उड़द/लोबिया/भिंडी फसलें कम अवधि में होती है | ये लगभग 60 से 70 दिनों में पककर तैयार हो जाती है | लोबिया एवं भिंडी को बाजार में अच्छे दामों पर बेचकर अधिक लाभ कमाया जा सकता है |

गन्ने की फसल के साथ मूंग उत्पदान के लिए बीजदर एवं किस्में

किसान गन्ने के साथ मूंग की फसल सहायक फसल के रूप में लगया जा सकता है | सहयक फसल के रूप में मूंग की 15 से 18 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर होना चाहिए | गन्ने के साथ सहायक फसल के रुप में मूंग फसल की उन्नत किस्म इस प्रकार है :- एसएमएल – 668, आईपीएम 2 – 3, मालवीय – 16, सम्राट

गन्ने की फसल के साथ भिन्डी उत्पदान के लिए बीजदर एवं किस्में

सहायक फसल के रूप में भिंडी को लगाया जा सकता है | गन्ने के साथ सहायक फसल के रूप में भिंडी लगाने की दर 8 से 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर होना चाहिए | गन्ने के साथ भिंडी फसल को सहायक फसल के रूप में लगाने के लिए उन्नत किस्म इस प्रकार है :-वी.आर.ओ. – 6, अर्का अनामिका, अर्का अभय

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गन्ना + प्याज

ट्रेंच विधि से गन्ने की बुआई करने पर इसके साथ प्याज को सफलतापुर्वक लगाया जा सकता है, क्योंकि ट्रेंच विधि में बनने वाली मेड पर प्याज का विकास अच्छा होता है | प्याज कम अवधि की फसल होने के करण कम समय में अच्छा मुनाफा दे सकती है |

गन्ने की फसल के साथ प्याज उत्पदान के लिए बीजदर एवं किस्में

गन्ना के साथ सहायक फसल के रूप में प्याज को लगा सकते हैं | गन्ने के साथ प्याज लगाने का दर 6 से 8 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है तथा गन्ने के साथ सहायक फसल के रूप में प्याज लगाने के लिए उन्नत किस्म इस प्रकार है :-  एग्री फाउंड लाइट रेड, पूसा रेड, पूसा रतनार, पंजाब 48 इत्यादि

गन्ना + कद्दूवर्गीय सब्जियां

कददूवर्गीय सब्जियों को वसन्तकालीन गन्ना के साथ लगाकर अधिक से अधिक लाभ कमाया जा सकता है | इन सब्जियों में मुख्य रूप से लौकी, कददू एवं खीरे को आसानी से उगाया जा सकता है |

गन्ना + सरसों / तोरिया / राई / अलसी

गन्ने की वानस्पतिक वृद्धि शरद ऋतू के अंतिम पड़ाव से ही आरम्भ होती है, तब तक सरसों / तोरियाँ / राई / अलसी फसलों की कटाई का समय हो जाता है | गन्ना एवं इन फसलों में पोषक तत्व, पानी, प्रकाश एवं हवा के लिए भी कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होती है |

गन्ने की फसल के साथ सरसों उत्पदान के लिए बीजदर एवं किस्में

गन्ने के साथ सहायक फसल के रूप में सरसों को लगाया जा सकता है | गन्ने के सहायक फसल के रूप में सरसों फसल की लगाने की दर 2 से 3 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है | गन्ने के सहायक फसल के रूप में सरसों की उन्नत किस इस प्रकार है :- पूसा तार्क, पूसा मस्टर्ड 26, पूसा मस्टर्ड – 27, पूसा इत्यादि

गन्ने की फसल के साथ तोरिया उत्पदान के लिए बीजदर एवं किस्में

गन्ने के साथ सहायक फसल के रूप में तोरी फसल को लगया जा सकता है | गन्ने के सहायक फसल के रूप में तोरी फसल की दर 2 से 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है | गन्ने की सहायक फसल के रूप में तोरी की मुख्य प्रजातियां इस प्रकार है :-पीटी – 30, टी – 9, पीटी – 303, भवानी इत्यादि |

गन्ने की फसल के साथ राई उत्पदान के लिए बीजदर एवं किस्में

गन्ने के साथ राई की फसल बोई जा सकती है | गन्ने के साथ राई की फसल बोने के लिए 3 से 4 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उपयोग करना चाहिए | गन्ने के सहायक फसल के रूप में राई की मुख्य प्रजातियां इस प्रकार है :- वरुण, रोहिणी, नरेंद्र राई इत्यादि |

गन्ना+चना / मसूर / मटर

शरद ऋतू में गन्ने की वृद्धि बहुत धीमी गति से होती है | इसकी वृद्धि मुख्य रूप से शरद ऋतू के अंतिम से आरम्भ होती है | तब तक चना / मसूर / मटर फसलें लगभग पककर तैयार होने की अवस्था में पहुँच जाती हैं | दलहनी फसलें मृदा स्वास्थ्य को बनाए रखने में भी मददगार होती है |

गन्ने की फसल के साथ चना एवं मसूर की खेती के लिए बीजदर एवं किस्में

गन्ने के खेती के साथ सहायक फसल के रूप में मसूर की खेती किया जा सकता है | गन्ने के सहायक फसल के रूप में मसूर की 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज का उपयोग करना चाहिए | गन्ने के साथ मसूर की यह उन्नत किस्म का उपयोग करना चाहिए | नरेंद्र मसूर, पीएल – 8, शिवालिक, पीएल 639, पीएल 406 आदि सहायक फसल के रूप में चना की खेती कर सकते हैं | गन्ने के साथ चने की खेती करने के लिए 50 से 55 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उपयोग करें | गन्ने के साथ सहायक फसल के रूप में चने की उन्नत किस्म इस प्रकार है :-जीजे 14, जीजी 1582, पूसा आदि

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गन्ने की फसल के साथ मटर की खेती के लिए बीजदर एवं किस्में

गन्ने के साथ सहायक फसल के रूप में मटर की फसल ली जा सकती है | गन्ने के साथ सहायक फसल के रूप में मटर की 60 से 70 किलोग्राम बीज का उपयोग करना चाहिए | गन्ने के साथ सब्जी मटर की उन्नत किस्म इस प्रकार है :- काशी उदय, काशी अमन आदि

गन्ना + गेहूं

इस प्रणाली में मुख्य एवं सहायक दोनों ही फसलों को अधिक पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है | इसलिए इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि पोषक तत्वों का प्रयोग संतुलित मात्रा में हो ताकि दोनों ही फसलों के उत्पादन एवं मृदा स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़े | इस सफसली प्रणाली में गेहूं का उत्पादन लगभग 30 से 35 क्विंटल/हेक्टेयर तक प्राप्त किया जा सकता है |

गन्ने की फसल के साथ गेहूं उत्पदान के लिए बीजदर एवं किस्में

गन्ने के साथ गेहूं की पैदावार ली जा सकती है | गन्ने के सहायक फसल के रूप में गेहूं की 75 से 80 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज का उपयोग करना चाहिए | गन्ने के साथ सहायक फसल क रूप में गेहूं की इन प्रजातियों का प्रयोग करना चाहिए- यूपी 2338, पीबीडब्ल्यू 343 इत्यादि

गन्ना + धनिया

धनिया, मसाले वाली फसल है | इसका उपयोग हरी पत्तियों या पकने के बाद दाने के रूप में किया जाता है | धनिया लगभग प्रत्येक घर में उपयोग होता है | शरदकालीन गन्ने की बुआई के बाद दो पंक्तियों के मध्य रिक्त स्थान में धनिया को लगाया जा सकता है |

गन्ना + लहसुन

लहसुन की बुआई भी उसी समय की जाती है, जब शरदकालीन गन्ने की बुआई की जाती है | गन्ने की दो पंक्तियों के मध्य रिक्त स्थान को लहसुन लगाकर भरा जा सकता है | इससे किसान को मुख्य फसल गन्ना की आय के अतिरिक्त एक और फसल प्राप्त हो जाती है |

गन्ना + पालक / मूली

ट्रेंच विधि से बुआई करने पर गन्ने की दो पंक्तियों के मध्य रिक्त स्थान में पालक या मूली को श्फ्सली प्रणाली में उगाया जा सकता है, ताकि समय एवं खाली पड़े स्थान का सही उपयोग हो सके |

गन्ना + आलू

गन्ने की बुआई ट्रेंच विधि से की जाती है तो आलू को सहफसली प्रणाली में आसानी से लगाया जा सकता है | इस विधि में बनने वाली मेड पर दो कतरने आलू की लगाई जा सकती हैं | आलू कम अवधि की फसल होने के कारण कम समय में अच्छा मुनाफा दे सकती है |

गन्ने के साथ आलू की खेती के लिए बीजदर एवं किस्में

गन्ना के साथ सहायक फसल के रूप में आलू का पैदावार लिया जा सकता है | गन्ने के साथ सहायक फसल के रूप में आलू की 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज लगता है | गन्ने के साथ सहायक फसल के रूप में आलू की उन्नत ककिस्म इस प्रकार है :- कुफरी अशोकम कुफरी चन्द्रमुखी, कुफरी अलंकार, कुफरी बहार, कुफरी, कुफरी ज्योति इत्यादि

गन्ना उत्पादन करने वाले किसान एक योजनाबद्ध तरीके से उपरोक्त तकनीकियों का प्रयोग गन्ने के साथ करते हैं, तो निश्चित तौर पर प्रति इकाई क्षेत्रफल से अधिक आमदनी प्राप्त होगी | इसके साथ – साथ मृदा स्वास्थ्य एवं पर्यावरण को भी स्वस्थ्य बनाए रखा जा सकता है | किसान भाई सहफसलीय खेती के लिए अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र से प्रशिक्षण भी ले सकते हैं | 

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