खेती के साथ मछली पालन से अतिरिक्त कमाई करने की योजना बना रहे किसानों के लिए प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना मददगार साबित हो रही है। छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में इस योजना से करीब 150 किसान मछली पालन, हैचरी और पाउंड लाइनर जैसी गतिविधियों से जुड़कर अपनी आमदनी के नए स्रोत तैयार कर रहे हैं।
योजना के तहत पात्र हितग्राहियों को विभिन्न मत्स्य पालन गतिविधियों के लिए सरकारी सहायता दी जा रही है। महिला, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के हितग्राहियों के लिए 60 प्रतिशत तथा सामान्य वर्ग के हितग्राहियों के लिए 40 प्रतिशत तक अनुदान का प्रावधान है। महासमुंद जैसे धान उत्पादक क्षेत्र में किसान अब पारंपरिक खेती के साथ मछली पालन को अपनाकर आय में विविधता ला रहे हैं। इससे गांवों में स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा हो रहे हैं।
मछली पालन के इन कामों के लिए मिल रही सहायता
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत मत्स्य क्षेत्र से जुड़ी विभिन्न गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इनमें नए तालाबों का निर्माण, बायोफ्लॉक यूनिट, मछली बीज हैचरी, कोल्ड स्टोरेज और मछली दाना निर्माण जैसी परियोजनाएं शामिल हैं। इसका उद्देश्य केवल मछली उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि मत्स्य पालन के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा तैयार कर किसानों और ग्रामीण युवाओं के लिए स्वरोजगार के अवसर बढ़ाना भी है।
किसान ने लगाई 20 हजार वर्गफुट की मछली हैचरी
महासमुंद जिले के बिरकोनी निवासी किसान दिनेश चन्द्राकर इसका उदाहरण हैं। पारंपरिक खेती में बढ़ती लागत को देखते हुए उन्होंने मछली पालन की तरफ कदम बढ़ाया। योजना के तहत उन्होंने करीब 7.50 लाख रुपये की लागत से एक हेक्टेयर में तालाब तैयार कराया। इसके अलावा लगभग 14 लाख रुपये की लागत से 20 हजार वर्गफुट में मछली हैचरी स्थापित की। हैचरी में मछली के बच्चे तैयार करने के बाद उन्हें तालाब में डाला जाता है। करीब 8 से 9 महीने में मछलियां बिक्री के लिए तैयार हो जाती हैं।
8-9 महीने में करीब 15 टन मछली का उत्पादन
दी गई जानकारी के अनुसार इस व्यवस्था से लगभग 15 टन मछली का उत्पादन हो जाता है। उत्पादन लागत करीब 70 से 80 रुपये प्रति किलो बताई गई है, जबकि बाजार में मछली की बिक्री 120 से 150 रुपये प्रति किलो तक हो रही है। लागत और बाजार भाव के इस अंतर से किसान को मछली पालन से अच्छा लाभ मिल रहा है।
₹28 लाख की पाउंड लाइनर यूनिट पर मिला 60% अनुदान
ग्राम बकमा के किसान हिमांशु चंद्राकर ने भी प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना का लाभ लेकर मछली पालन को आय का जरिया बनाया है। उन्होंने करीब 28 लाख रुपये की लागत से दो पाउंड लाइनर यूनिट तैयार कराई हैं। उन्हें सरकार की ओर से 60 प्रतिशत अनुदान मिला। सभी खर्चों को निकालने के बाद उन्हें सालाना करीब 3 से 4 लाख रुपये की शुद्ध बचत हो रही है। यह उदाहरण उन किसानों के लिए महत्वपूर्ण है जो खेती के साथ किसी संबद्ध व्यवसाय को जोड़कर नियमित आय का अतिरिक्त स्रोत तैयार करना चाहते हैं।
किसे मिलता है 60% और किसे 40% अनुदान?
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत हितग्राही की श्रेणी के आधार पर सहायता का प्रावधान किया गया है।
महिला, अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के हितग्राहियों को 60 प्रतिशत तक अनुदान, जबकि सामान्य वर्ग के हितग्राहियों को 40 प्रतिशत तक अनुदान दिया जाता है।
हालांकि वास्तविक सहायता संबंधित गतिविधि, स्वीकृत इकाई लागत और योजना के निर्धारित प्रावधानों के अनुसार तय होती है।
गांव में ही लोगों को मिल रहा रोजगार
मछली पालन से केवल यूनिट स्थापित करने वाले किसानों की आय ही नहीं बढ़ रही, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार भी तैयार हो रहा है।
बिरकोनी में मछली पालन से जुड़े मजदूरों को अब काम के लिए बाहर जाने की जरूरत कम हुई है। दी गई जानकारी के मुताबिक स्थानीय मजदूरों को करीब 9 हजार रुपये प्रतिमाह की आय मिल रही है और गांव में ही नियमित काम उपलब्ध हो रहा है।
धान के साथ मछली पालन बन सकता है अतिरिक्त आय का जरिया
महासमुंद में करीब 150 किसानों का मछली पालन जैसी गतिविधियों से जुड़ना बताता है कि कृषि के साथ संबद्ध व्यवसाय किसानों की आय के स्रोत बढ़ाने में उपयोगी हो सकते हैं।
विशेष रूप से तालाब, हैचरी, बायोफ्लॉक और पाउंड लाइनर जैसी गतिविधियों के लिए सरकारी सहायता मिलने से शुरुआती निवेश का बोझ कम हो सकता है। ऐसे में इच्छुक किसान प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत अपने क्षेत्र में उपलब्ध गतिविधियों और पात्रता की जानकारी जिला मत्स्य पालन विभाग से प्राप्त कर सकते हैं।