कर्जमाफ़ी को गलत ठहराने से पहले जानें क्या कहते हैं किसानों की आत्महत्या के आकड़ें

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भारत के विभिन्न राज्यों में किसानों की आत्महत्या के आकड़ें

1995 से 2014 के बीच 3,00,000 से ज्यादा किसान आत्म हत्या कर चुके हैं | वर्ष 2014 के बाद से केंद्र सरकार के द्वारा किसानों की आत्महत्या के आकड़े जारी नहीं किये गए है  |

तीन राज्यों (राजस्थान, मध्य प्रदेश, छतीसगढ़) में एक के बाद एक राज्यों का कृषि कर्ज माफ़ किया जाने लगा तो पुरे देश में इस बात की चर्चा होने लगी की किसानों की कर्ज माफ़ करना जरुरी था क्या ? देश में किसानों के हालत पर चर्चा के बजाय इस बात की चर्चा होने लगी की इससे बैंकों की हालत खराब हो जाएगी | जनता के द्वारा दिया जाने वाला टैक्स का पैसा सरकार किसानों को मुफ्त में दे रही है | ऐसे देखा जाए तो तीन राज्यों को मिलाकर सरकार केवल 1.1 लाख करोड़ रुपया ही माफ़ कर रही है |

क्या सच में बैंकों पर बोझ बढ़ जायेगा

 देश में कुल NPA (नॉन परफार्मिंग एसेट) 9.60 लाख करोड़ रुपया है | जिसमें से मात्र 85,000 करोड़ रुपया ही किसानों का है | शेष रुपया तो उद्योगपतियों का है | लेकिन 85,000 करोड़ रुपया माफ़ होने पर देश की बैंक बंद होने लगते हैं सरकार पर राजस्व घाटा बढ़ जाता है | इसके विपरीत अगर देश के सभी लोग किसानों की आत्महत्या पर ही नजर डाल लेते तो शायद किसानों के साथ हमदर्दी दिखाई जाती और कर्जमाफी को गलत नहीं ठहराया जाता |

क्या कहते हैं किसानों की आत्महत्या के आकड़े        

किसान समाधान अपने पाठकों के लिए 2005 से 2014 तक की कुल आत्महत्या की रिपोर्ट लेकर आये  है | यह रिपोर्ट अलग – अलग राज्यों के अलावा अलग – अलग राज्यों पर आधारित होगा तथा एनसीआरबी के आधार पर है |

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देश में किसानों की इतनी आत्महत्या हुई है की केंद्र सरकार ने 2015 से किसानों की आत्महत्या के आकडे देना ही बन्द कर दिया है | 1995 से 2014 तक कुल 3,02,116 किसानों ने आत्म हत्या कर ली है | देश के पांच राज्य महारष्ट्र , तेलंगाना, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ सबसे ज्यादा आत्महत्या करने वाला राज्य है |  इसमें से महाराष्ट्र में 20 वषों में 63,318 किसानों ने आत्महत्या कि है | एक बात और भी ध्यान देने की बात है की इस किसान आत्महत्या में केवल वे किसान नहीं आते हैं जिनके पास भूमि है | बल्कि बड़े पैमाने पर किसान मजदुर भी आते हैं  | वर्ष 2014 में कृषि मजदूरों की आत्महत्या 6,710 थी जो की किसानों से तीन गुना ज्यादा हैं | आंध्र प्रदेश में वर्ष 2014 में रिकाड 160 किसान आत्महत्या करते हैं वहीँ इसी वर्ष कृषि मजदुर तीन गुना आत्महत्या करते हैं |

आत्महत्या दर में वृधि

अगर आत्महत्या करने की वृद्धि दर को देखें तो यह मालूम चलता है की वर्ष 2014 के 12 महीनों में दुगुनी हो गई है | कर्नाटक में 245% आंध्र प्रदेश में 138% महारष्ट्र में 94%, मध्य प्रदेश में 89% छत्तीसगढ़ में 30% की दर से आत्महत्या में वृद्धि हुआ है | जो बहुत ही चिंता की बात है | लेकिन केंद्र सरकार ने वर्ष 2014 के बाद आत्महत्या की डेटा देना बंद कर दिया है | शायद सरकार यह सोंचती है की आत्महत्या का डेटा देने से जनता में रोष बढेगा | लेकिन इससे आत्महत्या में कमी तो नहीं लाया जा सकता है |

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अभी देश में राज्य सरकार के द्वारा किसानों का कर्ज माफ़ किया जा रहा है | लेकिन वर्ष 2008 में 52,260 करोड़ रुपया यू.पी.ए. सरकार ने माफ़ किया था लेकिन न तो वर्ष 2008 और नहीं 2009 में किसानों की आत्महत्या में ज्यादा कमी आई थी | जहां पुरे देश में वर्ष 2008 में 19,327 किसानों ने आत्म हत्या की थी  वहीँ वर्ष 2009 में 18,384 किसानों ने आत्म हत्या की थी | इसमें से भी पांच सबसे  बड़े आत्महत्या वाले राज्यों में से छत्तीसगढ़ ,मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या बढ़ी थी | केवल दो राज्य आंध्र प्रदेश कर्नाटक राज्य में आत्महत्या में कमी आई थी |

इसलिय यह कहा जा सकता है की किसानों का कर्ज माफ़ करना ही केवल काफी नहीं होगा इसके आलावा किसानों को न्यूनतम बाजिब आमदनी भी तय करना होगा | अभी हाल के वर्ष में तेलंगाना राज्य ने किसानों के लिए 4,000 रुपया प्रति एकड़ तय किया है | तो दूसरी तरफ झारखंड राज्य ने धान के किसानों के लिए 5,000 रुपया तय किया है | यह दोनों राज्यों ने अपने किसानों के आत्महत्या रोकने में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है |

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