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शनिवार, मई 18, 2024
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खेतों की बिना जुताई के ही किसान हैप्पी सीड ड्रिल से कर रहे हैं मूंग की बुआई

गेहूं की कटाई के बाद किसान अपने खेतों में ग्रीष्मकालीन फसलों खासकर मूंग एवं उड़द की खेती करते हैं लेकिन इसके लिए किसानों के पास काफी कम समय रहता है। ऐसे में किसान हार्वेस्टर से कटाई के बाद हैप्पी सीडर कृषि यंत्र से मूंग की बुआई कर रहे हैं। खास बात यह है कि इस मशीन से बुआई के लिए किसानों को अपने खेतों की जुताई करने की आवश्यकता नहीं होती ओर ना ही खेतों में शेष रह गये फसल अवशेषों को जलाने की।

गुरुवार के दिन जबलपुर जिले के पनागर विकासखण्ड के ग्राम ख़िरियकलां में हैप्पी सीड ड्रिल मशीन से उन खेतों में मूंग की बुआई की गई जहाँ कंबाइन हार्वेस्टर से कटाई के बाद गेहूँ फसल के अवशेष मौजूद थे। इससे जहां मूंग उत्पादन की लागत में कमी आएगी वहीं वायु प्रदूषण भी नहीं होगा।

फसलों की लागत में आती है कमी

उप संचालक किसान कल्याण एवं कृषि विभाग रवि आम्रवंशी के मुताबिक खेती की लागत कम करने और कम समय में अतिरिक्त फसल के लिये जिले के किसानों को लगातार नवाचार हेतु प्रेरित किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि पिछले कुछ वर्षों से जिले में कंबाइन हार्वेस्टर से गेंहू की कटाई का चलन बढ़ा है। जिससे कटाई उपरान्त खेतों में बचे फसल अवशेष को किसान जला देते हैं और उसके बाद खेत की जुताई करके उड़द या मूंग की बुआई करते हैं।

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कृषि विभाग के उप संचालक ने इस अवसर पर बताया कि फसल अवशेष जलाने से वातावरण प्रदूषित होता है तथा आम जनता में श्वास की बीमारियों का खतरा भी बढता है। साथ ही तापमान में भी वृद्धि भी होती है। इन सभी समस्याओं से निपटने का सबसे अच्छा विकल्प है “जीरो टिल सीड ड्रिल” या “हैप्पी सीडर” से बीज की बोनी है।

हैप्पी सीडर से बुआई करने पर होता है यह फायदा

उप संचालक ने जानकारी देते हुए बताया कि जीरो टिलेज से किसानों को बहुत से लाभ होते हैं। इनमें एक फसल काटने के तुरंत बाद दूसरी फसल की बोनी की जा सकती है। पहली फसल के अवशेष दूसरी फसल के लिये मल्चिंग का काम करते हैं, जिससे पानी के वाष्पन की गति धीमी होती है तथा जल संरक्षण में मददगार होती है।

गेंहू फसल के अवशेष अगली फसल के लिये जैविक खाद का काम करते है। भूमि में निरंतर नमी बने रहने से भूमि के अंदर तथा बाहर पलने वाले मित्र कीटों को नुकसान नहीं होता है। फसल अवशेष सड़ने से जैविक खाद बन जाती है जिससे भूमि का आर्गेनिक कार्बन कंटेंट बढता है तथा भूमि की जल धारण क्षमता में भी बढ़ोतरी होती है।

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