लहसुन एवं प्याज की खुदाई एवं सुरक्षित भण्डारण इस तरह करें

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प्याज एवं लहसुन की खुदाई एवं भण्डारण

हमारे देश में प्याज एवं लहसुन हमारे दैनिक आहार का हिस्सा है ओर इसका उपयोग सब्जी एवं मसाले के रूप में किया जाता है | प्याज की खेती रबी एवं खरीफ दोनों मौसम में कि जाती है यधपि अधिकांश खेती रबी के रूप में होती है | खरीफ प्याज कि खुदाई अक्टूबर–नवम्बर में किया जाता है अर्थात जून से सितम्बर तक प्याज निकालने का समय नहीं होता है | इसलिए इस दौरान प्याज कि उपलब्धता बनाये रखने तथा रबी प्याज कि खुदाई जब अप्रैल–मई माह में कि जाती है उस दौरान मूल्यों में गिरावट रोकने के लिए प्याज का भंडारण आवश्यक हो जाता है |

लहसुन की खेती केवल रबी मौसम में होती है ओर लहसुन कि खुदाई का काम मार्च – अप्रैल में किया जाता है | अत: अगली फसल आने के पूर्व लगभग 9 से 10 माह तक इसे भंडारण किया जाता है | प्याज तथा लहसुन कि कम श्वसन स्तर तथा इसकी शुष्क बाहरी कवच कि वजह से अन्य सब्जियों के मुकाबले इसे लम्बी अवधि तक भण्डारित किया जा सकता है |

प्याज एवं लहसुन के भंडारण हेतु खुदाई के बाद कुछ प्रमुख कारकों एवं बिन्दुओं पर अगर विशेष ध्यान दिया जाये तो निश्चित रूप से न केवल इनकी भंडारण क्षमता में बढ़ोतरी कि जा सकती है बल्कि भंडारण के दौरान होने वाले नुकसान को भी कम किया जा सकता है | किसान प्याज तथा लहसुन कि भंडारण के लिए इन बिन्दुओं को ध्यान रखे |

फसल के खुदाई का समय :-

लहसुन एवं प्याज कि पत्तियां परिपक्वता आने पर पिली पड़ने लगती है ओर पत्तियों में नमी कि मात्रा में हार्स होने लगता है | इसके अतिरिक्त कंद के समीप पौधे कमजोर हो जाता है फलस्वरूप पौधे गिरने लगते हैं | यद्धपि खरीफ प्याज कि खुदाई के समय पौधों कि वानस्पतिक वृद्धि जारी रहती है ओर वातावरण के तापमान में कमी कि वजह से प्याज के पौधे गिरते नहीं हैं | इसलिए इस मौसम के प्याज भंडारण में ज्यादा सुरक्षित नहीं रहते हैं |

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प्याज एवं लहसुन कंदों को निकालने या खुदाई कि विधि :-

वैसे क्षेत्र जहाँ मिटटी हल्की है प्याज व लहसुन हाथों से उखाड़कर निकाले जाते हैं , लेकिन भारी मिट्टियाँ में कुदाल का प्रयोग किया जाता है | एसा देखा गया है कि लहसुन के पौधे प्याज के मुकाबले कमजोर व भंगुर होते हैं इसलिए लहसुन कि खुदाई कुदाल से कि जानी चाहिए |

प्याज एवं लहसुन खुदाई उपरांत क्यूरिंग (धुप में सुखाना) :-

खुदाई के बाद प्याज एवं लहसुन को खेत पर ही पत्तियों सहित सुखाया जाना चाहिए | पत्तियां सहित कंदों को इस प्रकार रखी जानी चाहिए जिससे अगली कतार के कंद पीछे वाली कतार कि पत्तियों से धक जाएं | इस अवस्था में पत्ती सहित कंदों को 3 – 4 दिनों तक सूखने हेतु रखने चाहिए | क्यूरिंग ठीक तरीके से करने पर कंदों कि सुसुप्तावस्था कि अवधि में बढ़ोतरी होती हैं ओर भंडारण के दौरान प्रस्फुटन कि समस्या में कमी आती है | यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि लहसुन को एक – दो दिन तक ही सुखाना चाहिए क्योंकि तेज धुप में अधिक दिनों तक सुखाने से लहसुन में कई विकृतियाँ हो सकती है |

पत्तियां सूखने के बाद प्याज कि पत्तियों को इस प्रकार काटा जाता है ताकि 2.5 से 3 से.मी. लम्बी डंडी बची रहे | इन कंदों को छाया में लगभग दो सप्ताह सुखाना चाहिए | एसा करने से कंदों कि गर्दन के कटे हिस्से सुखाकर बंद हो जाते हैं ओर रोग कारकों द्वारा संक्रमण कि सम्भावना कम हो जाती है | छाया में सुखाने से प्याज के बाह्य परत (शल्क) कि नमी व्श्पिकृत होकर निकल जारी है ओर प्याज का रंग भी निखर आता है |

लहसुन को छाया में सुखाने के बाद यदि आवश्यकता हो तो उसकी पत्तियां काटी जा सकती अहि अन्यथा पर्याप्त भण्डारण व्यवस्था उपलब्ध हो तो लहसुन को पत्तियों सहित भण्डारण करना चाहिए | पत्तियां काटनी हो तो कम से कम 2 से 2.5 से.मी. कम्बी डंडी रखनी चाहिए |

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कंदों का आकार व श्रेणीकरण

कंदों को आकार के अनुसार तिन श्रेणीकरण – छोटे, मध्यम व बड़े कंदों में अलग कर भण्डारित करना अच्छा होता है | एक समान माध्यम आकार के कन्दों के बीच समुचित खाली जगह होने कि वजह से वायु का संरचना अच्छा होता है ओर भण्डारण के दौरान नुक्सान अपेक्षाकृत कम होता है | छोटे आकार के कंदों में सडन से नुकसान ज्यादा होता है जबकि बड़े आकार के कंदों में सडन तथा प्रस्फुटन / अंकुरण कि समस्या ज्यादा होती है |

प्याज एवं लहसुन भंडारण कि वातावारणीय परिस्थिति :-

हमारे प्रदेश व जिले में प्याज तथा लहसुन का भण्डारण सामान्य वातवरणीय स्थिति में ही छोटे व सीमान्त कृषक बन्धुओं द्वारा किया जाता है | भण्डारण प्राय: अप्रैल–मई से अक्तूबर–नवम्बर महीने तक किया जाता है | इसी लम्बी अवधि कि मई–जून महीने में उच्च तापमान तथा अपेक्षाकृत निम्न आद्रता रहती है जिस कारण कंदों के वजन में तीव्रता से कमी आती है |

जुलाई से सितम्बर महीने में तापमान भण्डारण हेतु अनुकूल रहता है लेकिन सापेक्षिक आद्रता अधिक रहती है जिस कारण सडन तथा रोग कि सम्भावना बढ़ जाती है | अक्तूबर – नवम्बर महीने में तापमान में कमी कि वजह से प्रस्फुटन / अंकुरण कि समस्या का सामना करना पड़ता है | इस प्रकार सामान्य वातावरणीय परिस्थिति में भण्डारण के दौरान नुक्सान अधिक होते हैं | अतएव भंडारण गृह कि संरचना इस प्रकार कि जानी चाहिए जिससे वायु – संरचण समुचित रहे, तापमान तत्र्हा आद्रता यथा संभव अनुकूल रखी जा सके | इस प्रकार के भण्डारण गृहों में नुक्सान को एक सीमा तक ही कम किया जा सकता है |

कोल्डस्टोरेज या शीतगृह जहाँ तापमान व आद्रता नियंत्रित कि जा सकती है प्याज ओर लहसुन का भण्डारण कर हानि से बचा जा सकता है | शीतगृहों में प्याज व लहसुन को 2 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान तथा 70 प्रतिशत सापेक्षिक आद्रता पर 8 से 9 माह तक सुरक्षित रखा जा सकता है |

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