ब्रोकली की खेती कर किसान कमाएं अधिक मुनाफा

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broccoli ki kheti

ब्रोकली (Broccoli Farming) की खेती

ब्रोकली गोभीय वर्गीय सब्जियों के अंतर्गत एक प्रमुख सब्जी है | यह एक पौष्टिक इटालियन गोभी है | जिसे मूलतः सलाद, सूप, व सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाता है | ब्रोकली दो तरह की होती है – स्प्राउटिंग ब्रोकली एवं हेडिंग ब्रोकली | इसमें से स्प्राउटिंग ब्रोकली का प्रचलन अधिक है | हेडिंग ब्रोकली बिलकुल फूलगोभी की तरह होती है , इसका रंग हरा, पीला अथवा बैंगनी होता है | हरे रंग की किस्म ज्यादा लोकप्रिय है | इसमें विटामिन, खनिज लवन (कैल्शियम, फास्फोरस एवं लौह तत्व) प्रचुरता में पाये जाते हैं |

पौष्टिकता से भरपूर होने के कारण गर्भवती महिलाओं के लिए अधिक फायदेमंद है | देश के बड़े शहरों में इसकी अत्यधिक मांग होने के कारण इसकी खेती पर्वतीय क्षेत्रों में विशेषकर हिमाचल प्रदेश में बड़े पैमाने पर की जाने लगी है | उत्तराखंड में भी इसकी लोकप्रियता बढ़ रही है | इसका बाजार भाव अधिक होने के कारण किसानों को अधिक आय प्रदान कर सकती है | अधिक मुनाफा देने के कारण किसान समाधान इसकी जानकारी लेकर आया है |

अनुमोदित किस्में

के.टी.एस.- 1 :-

इस किस्म के शीर्ष हरे रंग के कोमल डंठल युक्त होते हैं, जिनका औसत वजन 200 – 300 ग्राम होता है और रोपाई के लगभग 80 – 90 दिनों बाद काटने योग्य हो जाता है | मुख्य शीर्ष काटने के कुछ दिनों बाद छोटे – छोटे शीर्ष शाखाओं की तरह मुख्य भाग के रूप में पत्तियों के कक्षों से निकलते हैं उन्हें भी काटकर उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है |

पालक समृद्धि :-

यह किस्म भी हरे शीर्ष वाली स्प्राउटिंग ब्रोकोली किस्म है | जिसका शीर्ष भाग बड़ा एवं लम्बे कोमल डंठल युक्त होता है | प्रत्येक शीर्ष का औसत वजन 25- – 300 ग्राम होता है | मुख्य शीर्ष को काटने के बाद छोटे – छोटे शीर्ष पत्तों के कक्षों से निकलते हैं | यह किस्म 85 – 90 दिनों में रोपाई के बाद कटाई योग्य हो जाती है | इसमें येलो आई रोग एवं ब्रैक्टिंग विकार के लिए प्रतिरोधिता पायी जाती है |

एन.एस.- 50 :

यह मध्यम अवधि में तैयार होने वाली संकर किस्म है | इनके हेड गठीले, समरूप एवं गुम्बदाकार होते हैं | यह किस्म कैट आई से रहित है | इसके पौधे मृदुरोमिल आसिता एवं काला सडन रोग के प्रति सहनशील है | इसका बीज नामधारी मार्क से बाजार में मिलता है |

ब्रोकोली संकर – 1 :-

इसकी परिपक्वता रोपाई के 60 – 65 दिन बाद होती है | इसके शीर्ष हरे रंग के गठीले होते हैं, जिसका औसत वजन 600 – 800 ग्राम होता है | इसके बीज राष्ट्रीय बीज निगम द्वारा किसानों को उपलब्ध कराये जाते हैं |

टी.डी.सी. – 6 :-

इसके शीर्ष हरे रंग के होते हैं, जिसका औसत वजन 600 – 800 ग्राम होता है | इसकी फसल रोपाई के 65 – 70 दिन बाद तैयार हो जाती है | इसकी ब्र्र्ज दर 300 – 350 ग्राम प्रति हैक्टेयर अनुमोदित की गयी है | इस प्रजाति के बीज उत्तराखंड तराई बीज निगम, पंतनगर द्वारा किसानों को उपलब्ध कराये जाते है |

खेत की तैयारियां

ब्रोकोली के लिए दुमट अथवा बलुई – दुमट मिटटी वाली भूमि सर्वोतम मणि जाती है | अधिक अम्लीय भूमि इसके लिए अच्छी नहीं होती है | भूरी मिटटी एवं उपजाऊपन वाले खेत भी इसकी खेती हेतु उपयुक्त होते हैं, किन्तु उनमें जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए | खेत में पानी रुकना नहीं चाहिए अन्यथा पौधों की बढवार रुक जाती है और पौधे पीले पड़कर सड़ने लग जाते हैं | खेत की तैयारी के लिए दो जुताई पर्याप्त होती हैं, जिसमें अच्छी साड़ी गोबर की खाद दो कुन्तल प्रति नाली की दर से मिलाकर रोपाई हेतु भली – भंति तैयार करना चाहिए |

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बीज बुवाई का समय

अच्छे शीर्षों के निकलने एवं विकास के लिए 12 – 16 डिग्री सेन्टीग्रेट तापमान उपयुक्त होता है | अत: बीज की बुवाई एवं रोपाई के समय का निर्धारण उचित तापमान तथा क्षेत्र विशेषकर एवं वातावरणीय प्रस्थिति को ध्यान में रखते हुये किया जाना चाहिए |

  • निचले पर्वतीय क्षेत्र – सितम्बर अन्त से अक्तूबर
  • मध्य पर्वतीय क्षेत्र – मध्य अगत से सितम्बर
  • वेमौसमी खेती हेतु नवम्बर से मध्य जनवरी
  • ऊँचे पर्वतीय क्षेत्र – मार्च अथवा अप्रैल

बीज दर

ब्रोकोली के लिए 400 – 500 ग्राम बीज प्रति हैक्टेयर (8 – 10 ग्राम प्रति नाली) पर्याप्त होता है |

पौधशाला की तैयारी

जमीन से 15 सेमी. उठी हुयी नर्सरी की क्यारी में अच्छी साड़ी हुयी गोबर / क्म्पोष्ट खाद तथा 50 – 60 ग्राम प्रति वर्गमीटर की दर से सिंगल सुपर फास्फेट मिलाकर भूमि की तैयारी करनी चाहिए | पौधशाला में भूमिगत कीटों एवं व्याधियों से बचाव के इए यह उपाय अपनायें |

क्यारी में 5 ग्राम थायरम प्रति वर्गमीटर की दर से अच्छी प्रकार मिलाकर 5 – 7 सेमी. की दुरी पर 1.5 – 2 सेमी. गहरी कतारें निकालें | तत्पश्चात कवकनाशी 10 ग्राम ड्राईकोडर्मा या एक ग्राम कार्बेन्डाजिम अथवा 2.5 ग्राम थाइरम प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से शोधित बीज की बुवाई करें तथा जमने तक हल्की सिंचाई फव्वारे द्वारा करें | अधिक वर्ष से बचाव हेतु नर्सरी की क्यारी को घासफूस की छपर अथवा पालीथीन शीट से ढकने का प्रबन्ध रखना चाहिए | बेमौसमी खेती हेतु पौध पालीहाउस अथवा पालिटनल के अन्दर तैयार करनी चाहिए | पालीहॉउस अथवा पालीटनल के अन्दर भी पौधशाला में जड़ों में तापमान आवश्यकता से कम होने पर पालीहाउस में हीटर लगा दें | इससे बीजों का जमाव शीघ्र होने में मदद मिलेगी |

रोपाई

रोपाई हेतु 25 – 30 दिन की पौध उपयुक्त होती है | अत: पौध तैयार होने पर रोपाई शीघ्र करें | रोपाई से पूर्व नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा और 500 ग्राम थीमेट प्रति नाली की दर से खेत में छिड़क कर अच्छी तरह खेत तैयार कर लें | उसके बाद कतार से कतार की दुरी 45 – 50 सेमी. तथा पौध की दुरी 45 – 50 सेमी. रखते हुये पौध रोपाई कर हल्की सिंचाई करें | यदि कुछ पौधे मर गये हों अथवा बढवार अच्छी न हो तो उनके स्थान पर नई पौध की पुन : रोपाई एक हफ्ते के अन्दर कर दें | रोपाई के एक माह बाद शेष आधी नत्रजन मात्रा छिड़क कर पौधों के चारों तरफ मिटटी चढायें |

खाद या उर्वरक

उर्वरको का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करना उपयुक्त रहता है | अच्छी उपज के लिए प्रति हैक्टेयर 15 – 20 टन गोबर / क्म्पोष्ट खद, 100 किलोग्राम नत्रजन, 100 किलोग्राम फास्फोरस तथा 50 किलोग्राम पोटाश का प्रयोग किया जाना अनुकूल होता है |

खरपतवार नियंत्रण

शुरू के डेढ़ से दो माह तक खेत से खरपतवार निकलते रहें जिससे पौधों की बढवार अच्छी हो सके | इसके लिए आवश्यकतानुसार दो से तिन निराई – गुडाई पर्याप्त होगी |

रोग नियंत्रण

इस फसल में बीमारियों का प्रकोप अधिक नहीं होता है किन्तु रोपाई के बाद कुछ कीटों एवं व्याधियों का प्रकोप हो सकता है |

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आर्द्रपतन :-

  1. पौध जमीन की स्थ से गलकर मरने लगती है | इसके उपचार एवं रोकथाम के लिए निम्न उपाय अपनाने चाहिए |
  • भूमि में जल निकास का उचित प्रबन्ध करें |
  • नर्सरी का स्थान ऊँची जगह पर चुने एवं हर वर्ष बदलते रहें |
  • कार्बेन्डाजिम एक ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार कर बुवाई करें अथवा जैविक विधि से बीज उपचार हेतु ट्राइकोडर्मा विरिडी (4 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज) अथवा ट्राइकोडर्मा हरजियानम 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज अथवा 25 ग्राम ट्राइकोडर्मा एवं 2.5 किलोग्राम गोबर की खाद में मिलाकर प्रति नाली की दर से पौधशाला की मिटटी में मिलायें |
  • नर्सरी में बीज की घनी बुवाई न करें और बुवाई कतारों में करें |
  • पौधशाला को सौर्यकरण द्वारा निर्जिविकरण करें |
  • बुवाई के 10 दिन बाद कार्बेन्डाजिम की 1 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर क्यारियों को तर करें तथा पु: 15 – 20 दिन बाद इसी दावा के घोल से क्यारी को ट्र कर लें |

जड़ विगलन :

  1. इस रोग के कारण रोपाई के उपरान्त कुछ पौधों की बढवार रुकी हुई दिखायी पड़ती है | पौधों को उखाड़कर देखने पर पत्ता चलता है कि इनकी जड़ें गलकर केवल एक तार की तरह हो गई हैं | इसकी रोकथाम के लिए बीज उपचार आर्द्रगलन रोग जैसा करें, रोपाई के समय पौध को दावा के घोल में डुबोकर लगायें तथा रोग के लक्षण खेत में दिखाई देने पर कार्बेन्डाजिम का 0.1 प्रतिशत की दर (एक ग्राम / लीटर पानी) से घोल बनाकर पौधों की जड़ों के पास छिड़काव करें तथा उचित फसलचक्र भी अपनायें |

कलि पर्णचिती रोग व मृदुल आसिता :-

इस रोग के कारण पत्तियों पर काले या भूरे धब्बे दिखाई देते हैं | इसके नियंत्रण हेतु मैंकोजेब 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से पौधों में छिड़काव करें |

कीट नियंत्रण

माहू :- इस कीट के व्यस्क तथा शिशु दोनों ही मुलायम पत्तियों से रस चूसकर पौधों को हानि पहुंचाते हैं | पत्तियां पिली पद कर सूखने लगती हैं | प्रकोप अधिक होने पर गोभी के शीर्षों में भी माहू दिखायी पड़ते हैं | इसके नियंत्रण हेतु एजेडारेकटीन 1 – 2 मिली. अथवा इमिडाक्लोप्रिड 0.3 मिली. प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें |

गोभी की तितली :-

यह एक सफ़ेद रंग की तितली हैं, जिसके पीले रंग के अंडे गुच्छे में पत्तियों के पिछली स्थ पर बहुतायत में दिखाई पड़ते हैं | अंडो से निकलने वाली शुरुआती अवस्था से ही पत्तियों को भरी मात्रा में क्षति पहुंचती हैं | इसके नियंत्रण हेतु सबसे अंडों को चुनकर नष्ट कर दें फिर नियंत्रण हेतु इंडोसल्फान 35 ई.सी.का 2 मिली. अथवा इंडोक्साकार्ब 14.5 ई.सी. का 0.2 मिली. या बैसिलस थुरिंजीयेन्सिस का 1.5 – 2.0 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें |

फसल की कटाई

ब्रोकोली के शीर्ष की कटाई शीर्ष की कलियों के खुलने से पहले ही की जाती है | शीर्ष को 10 – 20 से.मी. तने (डंठल) के साथ काट लिया जाता है | इसके पश्चात् निचले पत्तों के कक्षों से नई कोपलें निकलती है जिनमे छोटे – छोटे शीर्ष बनते हैं | इन्हें भी समय – समय पर काट लेना चाहिए |

उपज

ब्रोकोली की औसत उपज 150 – 200 कुन्तल प्रति हैक्टेयर (3 – 4 कुन्तल प्रति नाली) है |

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