गेहूं की फसल में लगने वाले सभी रोग, उनकी पहचान एवं उनका उपचार ऐसे करें ?

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gehu ki fasal me lagne waale sabhi rog ke liye dawa se upchar

गेहूं में होने वाले प्रमुख रोग तथा उनकी रोकथाम

भारत देश में गेहूं का उत्पादन में महत्वपूर्ण स्थान है लगभग देश के सभी राज्यों में किसान गेहूं की खेती करते हैं |  गेहूं में बीमारियों सुत्रकृमियों तथा हानिकारक कीटों के कारण 5–10 प्रतिशत उपज की हानि होती है और दानों तथा बीजों की गुणवत्ता भी खराब होती है | गेहूं की नई प्रजातियों को जारी करने से पहले रतुआ रोग तथा पर्ण झुलसा रोगों की प्रतिरोधिता के लिए कई साल तक जांचा जाता है तथा अन्य बीमारियों तथा कीटों के लिए कम से कम दो साल तक परीक्षण किया जाता है | इनमें से केवल उच्च प्रतिरोधिता वाली प्रजातियों की ही संस्तुति की जाती हैं | लेकिन एक ही प्रजाति में सभी प्रकार के रोगों, सूत्रकृमियों तथा हानिकारक कीटों के लिए प्रतिरोधिता होना एक कठिन कार्य हैं | समय के साथ–साथ रोगजनकों का भी विकास होता रहता है और प्रकृति में इनकी नवीनतम प्रजातियाँ विकसित होती रहती है |

किसान समाधान गेहूं में लगने वाले सभी तरह के रोग कि जानकारी तथा उनकी पहचान एवं रोकथाम लेकर आया है | यह सबही रोग देश के विभिन्न क्षेत्रों के अनुसार अलग – अलग होते है इसलिए सभी रोगों कि पूर्ण जानकारी दी जा रही है जिससे गेहूं को रोग से बचाया जा सके |

गेहूं में लगने वाले प्रमुख रोग इस तरह हैं

गेहूं का पर्ण रतुआ / भूरा रतुआ रोग  :-

यह पक्सीनिया रिकोंडिटा ट्रिटिसाई नामक कवक से होता है तथा सम्पूर्ण भारत में पाया जाता है | इस रोग की शुरुआत उत्तर भारत की हिमालय तथा दक्षिण भारत की निलगिरी पहाड़ियों से शुरू होता है एवं वहां पर जीवित रहता है तथा वहाँ से हवा द्वारा मैदानी क्षेत्रों में फैलकर गेहूं की फसल को संक्रमित करता है |

रोग कि पहचान :-

इस रोग कि पहचान यह है कि प्रारम्भ में इस रोग के लक्षण नारंगी रंग के सुई की नोक के बिन्दुओं के आकार के बिना क्रम के पत्तियों की उपरी सतह पर उभरते हैं जो बाद में और घने होकर पूरी पत्ती और पर्ण वृन्तों पर फैल जाते हैं | रोगी पत्तियां जल्दी सुख जाती है जिससे प्रकाश संश्लेषण में भी कमी होती है और दाना हल्का बनता है | गर्मी बढने पर इन धब्बों का रंग, पत्तियों की निचली सतह पर काला हो जाता है तथा इसके बाद यह रोग आगे नहीं फैलता है | इस रोग से गेहूं की उपज में 30 प्रतिशत तक की हानि हो सकती है |

रोकथाम :-

धब्बे दिखाई देने पर 0.1 प्रतिशत प्रोपीकोनेजोल (टिल्ट 25 ईसी) का एक या दो बार पत्तियों पर छिड़काव करें |

गेहूं का धारीदार रतुआ या पीला रतुआ रोग 

यह पक्सीनिया स्ट्राईफारमिस नामक कवक से होता है | इस रोग के लक्षण प्रारम्भ में पत्तियों के उपरी सतह पर पीले रंग की धारियों के रूप में देखने को मिलते हैं जो कि धीरे–धीरे पूरी पत्तियों को पीला कर देते हैं तथा पीला पाउडर जमीन पर भी गिरने लगता है  इस स्थिति को गेहूं में पीला रतुआ कहते हैं| यदि यह रोग कल्ले निकलने वाली अवस्था या इससे पहले आ जाता है तो फसल में बाली नहीं आती है | यह रोग उत्तरी हिमालय की पहाड़ियों से उत्तरी मैदानी क्षेत्र में फैलता है | यह रोग तापमान बढने पर कम हो जाता है तथा पत्तियों पर पीली धारियां काले रंग की हो जाती है | मध्य तथा दक्षिणी क्षेत्रों में यह रोग अधिक तापमान की वजह से नहीं फैलता हैं |

रोकथाम :-

इस रोग कि रोकथाम के लिए उन्नत प्रतिरोधी किस्मों का प्रयोग करें | मेन्कोजेब 75 डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें |

गेहूं का तना रतुआ या काला रतुआ रोग  :-

इस रोग का रोग जनक पक्सीनिया ग्रैमिनिस ट्रिटिसाई नामक कवक है | यह रोग प्रारम्भ में निलगिरी तथा पलनी पहाड़ियों से आता है तथा इसका प्रकोप दक्षिण तथा मध्य क्षेत्रों में अधिक होता है | उत्तरी क्षेत्र में यह रोग फसल पकने के समय पहुँचता है | इसलिए इसका प्रभाव नगण्य होता है | यह रोग अक्सर 20 डिग्री नगण्य सेंटीग्रेड से अधिक तापमान पर फैलता है | इस रोग के लक्षण तने तथा पत्तियों पर चाकलेट रंग जैसा काला हो जाता है | दक्षिण तथा मध्य क्षेत्रों में जारी की नवीनतम प्रजातियाँ इस रोग के लिए प्रतिरोधी होती है | हालांकि लोक -1 जैसी प्रजातियों में यह रोग काफी लगता है |

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 हाल के कुछ वर्षों में इस रोग की नयी प्रजाति यू.जी. 99 कुछ अफ़्रीकी देशों में विकसित हो गयी है | यह सर्वप्रथम युगांडा (अफ्रीका) में वर्ष 1999 में पाई गयी लेकिन यह अभी तक भारत में नहीं पाई गई है फिर भी इसके महत्व को जानते हुये, देश की प्रमुख प्रजातियों को इस रोग के लिए परीक्षित कर लिया गया है तथा गेहूं की लगभग 20 प्रजातियाँ इसके लिए प्रतिरोधी पाई गयी है | जिनका उपयोग, देश में समय आने पर और बढ़ाया जा सकता है | इस दिशा में देश एवं विदेश में अनुसंधान जोरों से चल रहा है तथा देश में ज्यादा चिंता का विषय नहीं है |

गेहूं का करनाल बंट रोग :-

यह रोग सर्वप्रथम 1931 में करनाल (हरियाणा) से रिपोर्ट किया गया था तथा वर्तमान में विश्व के अन्य देशों में भी पाया जाता है | भारत में यह रोग अधिक तापमान तथा उष्ण जलवायु वाले राज्यों जैसे कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात तथा मध्यप्रदेश में नहीं पाया जाता तथा इसका प्रकोप अपेक्षाकृत ठंडे प्रदेशों जैसे जम्मू – कश्मीर, हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड के मैदानी इलाके पंजाब, हरियाणा , उत्तर प्रदेश तथा उत्तरी राजस्थान में अधिक होता है | इस रोग का कारक एक कवक टिलेसिया इंडिका है |

यह रोगजनक मृदा में रहता है तथा संक्रमित बीज इस रोग को नये क्षेत्रों में फैलाते हैं | इस रोग से दानों के अन्दर काला चूर्ण बन जाता है तथा अंकुरण क्षमता कम हो जाती है | विश्व में कई गेहूं का आयत करने वाले देश, जहाँ पर यह रोग नहीं है, गेहूं को पुर्न रूप से करनाल बंट मुक्त होने पर जोर देते हैं तथा इसके कारण अंतराष्ट्रीय अनाज व्यापर प्रभावित होता है |

रोकथाम :-

इस रोग कि रोकथाम के लिए बीज को थाइरम 2.5 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित कर बोयें | उन्नत प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग करें | रोकथाम हेतु खड़ी फसल में प्रोपिकोनोजोल 25 ई.सी. 0.1 प्रतिशत घोल का छिड़काव डफ अवस्था में करें |

गेहूं का खुला कंडुआ या लूज स्मट रोग  :-

यह रोग आन्तरिक रूप से संक्रमित बीज से पैदा होता है | इसका रोग जनक एक कवक अस्टीलैगो सेजेटम प्रजाति ट्रिटिसाई बीज के भ्रूण भाग में छिपा रहता है तथा संक्रमित बीज ऊपर से देखते में बिल्कुल स्वस्थ बीजों की तरह ही दिखाई देता है | इस रोग से प्रति वर्ष उत्तर भारत में गेहूं कि उपज में 1–2 प्रतिशत की हानि होती है | इस रोग के लक्षण बाली आने पर ही दिखाई देते हैं | रोगी पौधों की बालियों में दानों की जगह रोग जनक के रोगकंड (स्पोर्स) काले पाउडर के रूप में पाये जाते हैं जो कि हवा से उड़कर अन्य स्वस्थ बालियों में बन रहे बीजों को भी संक्रमित कर देते हैं | इस प्रकार रोग आगे आने वाली फसल में पहुंच जाता है | प्राय किसान भाई इस तरह से संक्रमित बीज से अनजान रहते हैं तथा बीजोपचार से चुक जाते हैं तथा बाद में उसकी फसल में इस  रोग की कोई रोकथाम सम्भव नहीं होती है |

रोकथाम :-

इस रोग कि रोकथाम के लिए रोग्र्स्त पौधों को उखाड़कर जला दें | बीजों को कार्बोक्सिन 75 डब्लू.पी. 1.5 ग्राम या कर्बेन्डाजिम 50 डब्लू.पी. 1.0 ग्राम या टेब्यूकोनाजोल 2.0 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से बीजोपचार कर बुवाई करें |

गेहूं का पर्ण झुलसा या लीफ ब्लाईट रोग :-

यह रोग मुख्यत: बाईपोलेरिस सोरोकिनियाना नामक कवक से पैदा होता है | यह रोग सम्पूर्ण भारत में पाया जाता है लेकिन इस रोग का प्रकोप नम तथा गर्म जलवायु वाले उत्तर पूर्वी क्षेत्र में अधिक होता है | इस रोग के लक्षण पौधे के सभी भागों में पाये जाते हैं तथा पत्तियों पर प्रमुख होते हैं | प्रारम्भ में रोग के लक्षण भूरे रंगे के नाव के आकार के छोटे धब्बों के रूप में उभरते हैं | जो कि बड़े होकर पत्तियों के सम्पूर्ण भाग या कुछ भाग को झुलसा देते हैं तथा ऊतक मर जाते हैं और हरा रंग नष्ट हो जाता है | इससे प्रकाश संशलेशण बुरी तरह प्रभावित होता है  इस प्रकार के बीज में अंकुरण क्षमता बहुत कम होती है | इस रोग से रोग ग्रसित फसल में 50 प्रतिशत तक उपज की हानि हो सकती है |

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रोकथाम :-

  1. इस रोग से बचाने के लिए जनवरी के प्रथम सप्ताह से 15 दिन के अंतराल पर सवा किलो मैंकोजेब प्रति हैक्टेयर का 6,000 लीटर पानी में घोल बनाकर 3 – 4 बार छिड़काव करें |
  2. इसके अलावा 2.5 ग्राम / कि.लो. बीज की दर से कार्बोक्सिन (वीटावैक्स 75 डब्ल्यूपी) के साथ बीजोपचार करें |
  3. खेत में जमाव न रहने दें |

गेहूं का  चूर्णिल आसिता या पौदरी मिल्ड्यू रोग :-

यह रोग ठंडे प्रदेशों में पाया जाता है तथा ब्लुमेरिया ग्रैमेनिस ट्रिटिसाईनामक कवक से होता है | यह रोगजनक ग्रीष्म काल में उत्तर के पहाड़ों पर जीवित रहता है तथा बाद में फसल अवधि में उत्तरी मैदानी क्षेत्रों में फैल कर गेहूं की फसल को संक्रमित करता है | इस रोग से पत्तियों की उपरी स्थ पर गेहूं के आटे के रंग के सफेद धब्बे पड़ जाते हैं जो कि उपयुक्त परिस्थितियाँ होने पर बालियों तक पहुंच जाते हैं | तापमान बढने पर इन सफेद भूरे धब्बों में आलपिन की नोंक के आकार के गहरे भूरे क्लिस्टोथिसिया बन जाते हैं तथा इस रोग का फैलाव रुक जाता है | आजकल यह रोग उत्तरी पहाड़ी तथा उत्तरी पश्चिमी मैदानी क्षेत्रों में काफी फैलने लगा है तथा इन क्षेत्रों में उगने वाली प्रजातियों में इस रोग की प्रतिरोधी शक्ति कम है | यह रोग मेड पर उगने वाली तथा पेड़ों की छाया वाली फसल में अधिक लगता है | इस रोग के कारण दाना हल्का बनता है |

रोकथाम

  1. रोग के संक्रमन से डेन बनने की अवस्था तक 0.1 प्रतिशत प्रोपिकोनेजोल (टिल्ट 25 ईसी) का पत्तियों पर छिड़काव करें |
  2. छायादार खेत में गेहूं की बुआई न करें |
  3. उत्तर पर्वतीय क्षेत्रों में एचएस 542, वीएल 829, वीएल 907, वीएल 907, एचएस 507, एचएस 490, इत्यादी किस्मों का प्रयोग करें |

ध्वज कंड या फ्लैग समट :-

यह रोग उत्तरी भागों में जहाँ पर जमीं बलुई होती है, ज्यादा फैलता है तथा पंजाब तथा हरियाणा में इस प्रकार की जमीनों में यह रोग 10 प्रतिशत तक पाया जाता है | यह रोग एक कवक यूरोसिस्टिस एग्रोपाइरी से होता है तथा रोगजनक संक्रमित खेत में ही होता है | इस रोग के कारण संक्रमित पौधों की पत्तियां अधिक लम्बी, मुड़ी हुई तथा प्रारम्भ में चंडी जैसे रंग की दिखाई देती है जोकि बाद में कवक बीजाणुओं के बनने से कलि होकर टूट जाती है | एसे पौधों में बालियाँ नहीं बनती है |

रोकथाम :-

2.5 ग्राम / कि.ग्रा. बीज की दर से कार्बोक्सिन (वीटावैक्स 75 डब्ल्यू) या कर्बेडिजिम (बाविस्टीन 50 डब्ल्यूपी) से अथवा 1.25 ग्राम / कि.ग्रा. बीज की दर से टेब्युकोनेजोल 2 डीएस (रैकिस्ल) के साथ बीजोपचार करें | पहले साल जिन सुग्राही किस्मों में यह ध्वज कन्द देखा गया हो, उनकी बुआई न करें |

अन्य फसलें , जो इस कवक की अतिथेय नहीं हैं, के साथ फसल आवर्तन (क्राप रोटेशन) करें |

पहाड़ी बंट या हिल बंट :-

यह बीमारी प्रमुख रूप से उत्तरी पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है तथा टिलेसिया फ़ोइटिडा एवं टिलेसिया कैरीज नामक कवकों के कारण होती है | इस रोग में रोगी बालियों में दानों की जगह कवक की कलि रंग की संरचनाए बन जाती है जो कि थ्रेशिंग के समय टूटकर कवक बीजाणुओं को स्वस्थ बीजों पर फैला देती है |

रोकथाम :-

  1. 25 प्रतिशत कार्बोक्सिन (वीटावैक्स 75 डब्ल्यूपी) साथ बीजोपचार करें |
  2. रोगरोधी किस्मों का प्रयोग करें
  3. बुआई के लिए संक्रमित खेत से बीज न लें |

पाद विगलन या फुट राँट :-

यह रोग अधिक तापमान वाले प्रदेशों , जैसे मध्य प्रदेश, गुजरात तथा कर्नाटक में पाया जाता है तथा सोयाबीन – गेहूं फसल चक्र में अधिक होता है | यह रोग स्क्लरोसियम रोलफसाई नामक कवक से होता है जो कि संक्रमित भूमि में पाया जाता है | इस रोग से रोगी पोधों की जड से ऊपर कालर वाले भाग पर सफेद कपास के आकार की कवक पैदा होती है तथा तने का भूमि से ऊपर का भाग सड जाता है तथा रोगी पौधा मर जाता है |

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