ओल (जिमीकंद) की वैज्ञानिक खेती

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ओल की  खेती

ओल यानि जिमीकन्द एरेसी कुल का एक सर्वपरिचित पौधा है जिसे भारतवर्ष में सूरन, बालुक्न्द, अरसधाना, कन्द तथा चीनी आड़ी अनेक नामों से जाना जाता है | इसकी खेती भारत में प्राचीन काल से होती आ रही है तथा अपने गुणों के कारण यह सब्जियों में एक अलग स्थान रखता है | बिहार में इसकी खेती गृह वाटिका से लेकर बड़े पैमाने पर हो रही है तथा यंहा के किसान इसकी खेती आज नगदी फसल के रूप में कर रहे हैं | ओल में पोषक तत्वों के साथ ही अनेक औषधीय गुण पाये जाते हैं जिनके कारण इसे आयुर्वेदिक औषधियों में उपयोग किया जाता है | इसे बवासीर, खुनी बवासीर, पेचिश, ट्यूमर बताया गया है | इसकी खेती हल्के छायादार स्थानों में भी भली – भांति की जा सकती है जो किसानों के लिए काफी लाभप्रद सिद्ध हुआ है |

मिटटी का चुनाव एवं खेत की तैयारी

ओल के सर्वोतम विकास एवं अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए उत्तम जल निकास वाली हल्की और भुरभुरी मिटटी सर्वोतम है | इस फसल के लिए बलुई दोमट मिटटी जिसमें जीवांश पदार्थ प्रचुर मात्र में हो, उपयुक्त पायी गयी है | खेत की पहली जुताई मिटटी पलटने वाले हल से और दो – तिन बार देशी हल से अच्छी तरह जोत कर मिटटी को मुलायम तथा भुरभुरी बना लेना चाहिए | प्रत्येक जुताई के बाद खेत में पाता चलाकर समतल कर दें |

उन्नत प्रभेद

गजेन्द्र, कोवर, संतराशही प्रमुख प्रभेद है, जिसमें गजेन्द्र प्रभेद आज पुरे भारत में फैल गया है,यह 200 से 215 दिन में तैयार होने वाली प्रजाति है | इस प्रजाति की औसत उपज 40 – 50 टन / हे. है | इसमें कैल्शियम आक्जेलेट कम मात्रा में पाया जाता है जिसके कारण इसमें कबकबाहट नहीं होता है | यही कारण है की इसका व्यवहार विभिन्न व्यंजनों के रूप में होता है |

बीज एवं बुआई

ओल का प्रवर्धन वानस्पतिक विधि द्वारा किया जाता है जिसके लिए पूर्ण कन्द या कन्द को काट कर लगाया जाता है | बुवाई हेतु 250 – 500 ग्राम का कंद उपयुक्त होता है | यदि उपरोक्त वजन के पुर्न कंद उपलब्ध हो तो उनका हो उपयोग करें | एसा करने पर प्रस्फुटन अग्रिम होता है जिससे फसल पहले तैयार एवं अधिक उपज की प्राप्ति होती है | यदि कन्द का आकार बड़ा हो तो उसे 250 – 500 ग्राम के टुकड़ों में काट कर बुआई करना चाहिए | परन्तु कन्द को काटते समय इस बात का ध्यान रखें की प्रत्येक टुकड़े में कम से कम कालर (कलिका) का कुछ भाग अवश्य रहे |

उपरोक्त कन्दों को बोने से पूर्व कन्दोपचार करना चाहिए | इसके लिए इमीसान 5 ग्राम एवं स्ट्रेप्टोसाइक्लीन 0.5 ग्राम को प्रति लीटर पानी में घोल कर कन्द को 25 – 30 मिनट तक या ताजा गोबर का गाढ़ा घोल बनाकर उसमें 2 ग्राम कार्बोन्डाजिम (वेविस्टीन) पाउडर प्रति लीटर घोल में मिलाकर कन्द को उपचारित कर छाया में सुखाने के बाद ही लगायें | उपरोक्त आकार के कन्द लगाने पर इनकी बढवार 8 – 10 गुणा के बीच होता है | बीज दर कन्द के आकार एवं बुआई की दूरी पर निर्भर करता है |

कन्द का वजन दुरी बीज दर (किवंटल/हे.)

 

250 ग्राम 75 × 75 से.मी. 40 – 50
500 ग्राम 75 × 75 से.मी. 70 – 80

 

250 ग्राम 1 × 1 से.मी. 25

 

500 ग्राम 1 × 1 से.मी. 25

 

 

बुआई का समय

अप्रैल – जून

लगाने की विधि – दो विधियों द्वारा ओल की बुआई की जाती है |

चौरस खेत में

गड्ढों में

  1. चौरस खेत – इस विधि में ओल की बुआई करने के लिए अंतिम जुताई के समय गोबर की सदी खाद एवं रासायनिक उर्वरक में नेत्रजन एवं पोटाश की 1/3 मात्रा एवं फास्फोरस की पुर्न मात्रा को खेत में मिलाकर जुताई कर देते हैं | उसके बाद कन्दों के आकार के अनुसार 75 से 90 से.मी. की दुरी पर कुदाल द्वारा 20 से 30 मी. गहरी नाली बनाकर कन्दों की बुआई कर डी जाती है तथा नाली को मिटटी से ढक दिया जाता है |
  2. इस विधि से अधिकांशत : ओल की बुआई की जाती है | इस विधि में 75 × 75 × 30 से.मी. या 1.0 ×0 × 30 से.मी. चौड़ा एवं गहरा गड्ढा खोद कर कंदों की रोपाई की जाती है | रोपाई के पूर्व निर्धारित मात्रा में खाद एवं उर्वरक मिलाकर गड्ढा में डाल दें | कन्दों को बुआई के बाद मिटटी से पिरामिड के आकार में 15 से.मी. ऊँचा कर दें | कन्द की बुआई इस प्रकार करते हैं की कन्द का कलिका युक्त भाग ऊपर की तरफ सीधा रहे |

चीकू की खेती

खाद एवं उर्वरक –

ओल की अच्छी उपज हेतु खाद एवं उर्वक का इस्तेमाल करना बहुत ही आवश्यक है | इसके लिए 10 – 15 किवंटल गोबर की सड़ी खाद, नेत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाश 80:60:80 कि.ग्रा./हे. के अनुपात में प्रयोग करें | बुआई के पूर्व गोबर की सड़ी खाद को अंतिम जुताई के समय खेत में मिला दें | फास्फोरस की सम्पूर्ण मात्रा, नेत्रजन एवं पोटाश की 1/3 मात्रा बेसल ड्रेसिंग के रूप में तथा शेष बची नेत्रजन एवं पोटाश को दो बराबर भागों में बाँटकर कन्दों के रोपाई के 50 – 60 तथा 80 – 90 दिनों बाद गुडाई एवं मिटटी चढाते समय प्रयोग करें | उर्वरकों को व्यवहार तालिका -2 के अनुसार करें |

उर्वरक (कि.ग्रा./हे.) उर्वरक की मात्रा बुआई के समय (कि.ग्रा./हे.)
यूरिया 180 60
सिंगल सुपर फास्फेट 375 375
म्यूरेट आफ पोटाश 160 53.30

 

                             बुआई के बाद (कि.ग्रा./हे.)

उर्वरक 50 – 60 दिन 80 – 90 दिन
यूरिया 60 60
सिंगल सुपर फास्फेट
म्यूरेट आफ पोटाश 53.30 53.30

 

गड्ढों में ओल लगते समय प्रति गड्ढा 2 से 3 कि.ग्रा. गोबर की सड़ी खाद 18 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 15 ग्राम म्यूरेट आफ पोटाश एवं 5 ग्राम ब्लीचिंग पाउडर का प्रयोग करें | यूरिया की आधी मात्र 9 ग्राम एवं अन्य उर्वरकों की पूरी मात्रा को मिटटी में मिलाकर गड्ढों में भर दें | शेष आधी बची यूरिया को प्ररोह निकलने के 80 – 90 दिन बाद प्रति गड्ढा की दर से व्यवहार करें |

मल्चींग –

बुआई के बाद पुआल अथवा शीशम की पत्तियों से ढक देना चाहिए जिससे ओल का अंकुरण जल्दी होता है, खेत में नमी बनी रहती है तथा खर – पतवार कम होने के साथ ही अच्छी उपज प्राप्त होती है |

जल प्रबंधन –

यदि खेत में नमी की मात्रा कम हो तो एक या दो हल्की सिंचाई अवश्य कर दें | वर्षा आरम्भ होने तक खेत में नमी की मात्रा को बनाये रखें | बरसात में पौधों के पास जल जमाव न होने दें |

निकाई – गुडाई –

बुआई के 25 – 30 दिनों के अंदर पौधे उग जाते हैं | 50 – 60 दिनों बाद पहली तथा 80 -90 दिनों बाद दूसरी निकाई करें | निकाई के समय पौधों पर मिटटी भी चढ़ाते जायें |

फसल चक्र –

ओल – गेंहू, ओल – मटर, ओल – अदरक, ओल – प्याज |

अन्तर्वर्ती खेती –

चूंकि इस फसल का अंकुरण देर से होता है, इसलिए पौधों के प्रारंभिक विकास की अवधि में अन्तर्वर्ती फसलें जैसे भिण्डी, बोडा, मूंग, कलाई, मक्का, खीरा, कद्दू आदि फसलें सफलतापूर्वक ली जा सकती है | अनुसंधान द्वारा यह पाया गया है कि इसकी खेती लीची एवं अन्य फलों के बागों में अन्तर्वर्ती फसल के रूप में सफलतापूर्वक किया जा सकता है |

फसल सुरक्षा –

झुलसा रोग –

यह ओल का बैक्टीरिया जनित रोग है जिसका आक्रमण पौधों की पत्तियों पर सितम्बर – अक्तूबर माह में अधिक होता है | पत्तियों पर छोटे – छोटे वृताकार हल्के – भूरे रंग के धब्बे बनते हैं जो बाद में सूखकर काले पद जाते है एवं पत्तियां सुख कर झुलस जाती है | कंदों की वृद्धि नहीं हो पाती है |

रोग का लक्षण आटे ही बैभीस्टीन अथवा इंडोफिल एम – 45 का 2.5 मि.ली. प्रति ली. की दर से 2 – 3 छिड़काव 15 दिनों के अन्तराल पर करें |

तना गलन –

इस रोग का आक्रमण उन क्षेत्रों में अत्यधिक होता है जहां पानी का जमाव ज्यादा होता है तथा लगातार एक ही खेत में ओल की खेती की जा रही हो | इस रोग का प्रकोप अगस्त – सितम्बर माह में अधिक होता है | यह मृदा जनित रोग है | इस रोग का लक्षण कालर भाग पर दिखालाई पड़ता है तथा पौधा पिला पड़कर जमीन पर गिर जाता है |

इसके रोक थाम हेतु उचित फसल चक्र अपनायें | जल निकास की उचित व्यवस्था रखें | कन्द लगाने से पूर्व उसे बतायी गयी विधि द्वारा उपचारित कर लें कैप्टान दवा के 2% के घोल से 15 दिनों के अंतराल पर दो – तिन बार पौधे के आस – पास भूमि को भींगा दें |

खुदाई एवं भण्डारण –

बुआई के सैट से आठ माह के बाद जब पत्तियां पिली पद कर सूखने लगती है तब फसल खुदाई हेतु तैयार हो जाती है | खुदाई के पश्चात् कंदों की अच्छी तरह मिटटी साफ कर दो – तिन दिन धूप में रख कर सुखा लें | कटे या चोट ग्रस्त कन्द को किसी हवादार भण्डार गृह में लकड़ी के मचान पर रख कर भण्डारित करें | इस प्रकार ओल को पांच से छ: माह तक आसानी से भण्डारित किया जा सकता है |

लाभ –

यदि उपरोक्त बैटन को ध्यान में रखकर ओल की खेती किया जाए तो इससे रु. 1,25,000/- से 1,50,000/- तक शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता है तथा किसान अपनी आर्थिक स्थिति को सुधार सकते हैं |

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