एकीकृत मछली पालन

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एकीकृत मछली पालन

एकीकृत मछली पालन का मतलब है ‘फसल, मवेशी और मछलियों का एक साथ पालन करना’। एकीकृत पालन का मुख्य उद्देश्य है एकल पालन के अवशिष्ट पदार्थ का पुनर्चक्रण एवं संसाधनों का इष्टतम उपयोग करना। इस पालन में अवशिष्ट पदार्थों को फेंका नहीं जाता बल्कि उनका पुनर्चक्रण कर उपयोग किया जाता है। अतः यह जीविकोपार्जन एवं आय की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। एकीकृत पालन कई प्रकार से किया जाता है जैसे-कृषि सह जलकृषि, मछली सह मुर्गी पालन, मछली सह बतख पालन एवं मछली सह अनाज खेती।

मछली सह मवेशी खेती

इस तरह के पालन से बहुत सारी सम्भावनाएँ हैं। इसमें मछली के साथ, गाय, बैल, भैंस तथा बकरी पालन किया जा सकता है। साधारणतः एक गाय, बैल या भैंस से 6 कि.ग्रा. एवं बकरी से 0.5 कि.ग्रा. खाद प्राप्त होती है। अतः एक वर्ष में एक मवेशी से 9000 कि.ग्रा. अवशिष्ट निकलता है। अनुमानतः 6.4 किग्रा गोबर से एक किग्रा मछली उत्पादन होता है। आठ गायों से प्राप्त गोबर एक हेक्टेयर जल क्षेत्र के लिये पर्याप्त होता है और इससे बिना किसी सम्पूरक आहार के 3-5 टन मछली का उपज ली जा सकती है। साथ ही गाय का दूध भी प्राप्त होता है।

कृषि सह जलकृषि

इसमें उत्पाद का दीर्घकालिक तौर पर इष्टतम उपयोग होता है और वह भी स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों और तकनीकों के उपयोग से। यह पालन छोटे व गरीब किसानों के भरण-पोषण के लिये बहुत ही लाभकारी है। एकीकृत मत्स्य पालन से अतिरिक्त आय भी प्राप्त होती है। इस तरह के पालन के लिये विभिन्न तरह की फसल उपयुक्त होती है। फल (पपीता, केला, अमरूद, नींबू, सीताफल, अनानास, नारियल), सब्जियाँ (चुकन्दर, करेला, लौकी, बैंगन, बन्दगोभी, फूलगोभी, खीरा, ककड़ी, खरबूजा, मटर, आलू, कोहरा, मूली, टमाटर), दलहन (हरा चना, काला चना, अरहर, राजमा, मटर) तिलहन (मूँगफली, सरसों, तिल, रेडी) फूल (गेंदा, गुलाब, रजनीगंधा), औषधीय पौधे (धृतकुमारी, तुलसी, कालमेध, नीम) आदि। चौर के पानी वाले इलाके में 3 फीट चौड़ा ऊँचा बाँध बनाकर उस बाँध पर बागवानी (पपीता, केला, अमरूद, नारीयल इत्यादि) कर सकते हैं। ग्रास कार्प के भोजन के लिये नेपियर घास की खेती तालाब के किनारे की जाती है। चौर से प्राप्त गाद एवं जलीय अपतृणों को खाद के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस तरह से हम चौर के किनारे बेकार पड़े खेत को बिना पानी खर्च किये उपजाऊ भी बना सकते हैं।

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मछली सह मुर्गी पालन

इस पालन में मुर्गियों के अवशिष्ट को पुनः चक्रण कर खाद के रूप में उपयोग किया जाता है। एक मुर्गी के लिये 0.3-0.4 वर्ग मी. जगह की आवश्यकता होती है। 50-60 पक्षियों से एक टन उर्वरक प्राप्त होता है। ऐसे पालन में 500-600 पक्षियों से प्राप्त खाद एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिये पर्याप्त होती है। इस पालन द्वारा 4.5-5.0 टन मछली, 70000 अंडे और 1250 किग्रा मुर्गी के मांस का उत्पादन होता है। इसमें किसी अन्य सम्पूरक आहार और अतिरिक्त उर्वरक की आवश्यकता नहीं होती है। इस दृष्टिकोण से यह बहुत लाभदायक सिद्ध होता है।

मछली सह बतख पालन

इस पालन में मछली और बतख एक साथ पाली जाती है। जिस जल क्षेत्र में बतखों का पालन किया जाता है वह मछलियों के लिये आदर्श जलक्षेत्र होता है, क्योंकि पारिस्थतिकी रोगमुक्त होती है। बतख जल क्षेत्र में उपस्थित घोंघा, टैडपोल एवं पतंगों के लार्वा ग्रहण करती है। इसके अलावा बतखों के अवशिष्ट के सीधा तालाब में गिरने से मछलियों के लिये आवश्यक पोषक पदार्थ की पूर्ति होती है। प्रत्येक बतख से 40-50 किग्रा खाद प्राप्त होता है। जिससे लगभग 3 कि.ग्रा. मछली उत्पादन होता है। बतख की औसत पालन दर 4 बतख प्रति वर्ग मी. होती है। एक बतख औसतन 200 अंडे प्रतिवर्ष देती है।

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मछली सह अनाज खेती

इस पालन में मछली के साथ अनाज की खेती होती है। इस तरह के पालन में मछली के साथ धान की खेती सर्वाधिक उपयुक्त होती है। धान का खेत पानी से भरा रहता है इसलिये इसमें धान के साथ कम खर्च में मछली पालन किया जाता है।

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