भारत में भूमि शासन, नीति और विकास से जुड़े मुद्दों पर हर वर्ष एक कॉन्फ्रेंस आयोजित की जाती है। यह कॉन्फ्रेंस इंडिया लैंड एण्ड डेवलपमेंट कॉन्फ्रेंस (ILDC) के रूप में चर्चित है। ILDC इस कॉन्फ्रेंस के जरिए सरकारी निकाय, नागरिक संगठन और जमीनी कार्यकर्ताओं को एक साझा संवाद के लिए मंच प्रदान करता है।
बीते वर्ष 2025 में ILDC की यह 9वीं कॉन्फ्रेंस थी। जिसमें एक मुख्य और प्रबंधकीय भूमिका ‘लैंडस्टैक’ संस्था ने निभायी। इस कॉन्फ्रेंस का कार्यक्रम 18 से 20 नवंबर के बीच गुजरात के प्रमुख शहर अहमदाबाद में सम्पन्न हुआ। अहमदाबाद मेनेजमेंट एसोसिएशन (AMA) में सम्पन्न इस कॉन्फ्रेंस में 23 देशों के 492 प्रतिभागी शामिल हुए। जिसमें 281 पुरुष, 207 महिलायें और 3 अन्य प्रतिभागी थे।
इस विषय पर हुई ILDC कॉन्फ्रेंस
इस बार की कॉन्फ्रेंस का विषय ‘सतत विकास में भूमि की केन्द्रीय भूमिका: अतीत, वर्तमान और भविष्य से जुड़ी चुनौतियों का समाधान’ था। कॉन्फ्रेंस के अंतर्गत कार्यक्रमों में 73 विषयगत सत्र संचालित हुए। इन्हीं सत्रों में से दो सत्र ‘बदलते परिवेश- भूमि शासन की पुनर्कल्पना, भारत का नवीकरणीय ऊर्जा भविष्य’ और ‘भारत में भूमि उपयोग के लिए परस्पर विरोधी विकासात्मक और ऊर्जा संक्रमण संबंधी प्राथमिकताओं को हम कैसे संतुलित करें?’ का भी संचालन किया गया।
पहला सत्र मुख्य रूप से रिसर्च पर फ़ोकस था। जबकि दूसरा सेशन प्रैक्टिशनर्स और एक्टर्स के डेवलपमेंट एक्सपीरियंस पर ज्यादा फोकस्ड था। इन दोनों सत्रों में श्रीकान्त जलतरे, भार्गवी एस राव, सिमरन ग्रोवर, सुकन्या खार, गणेश हेगड़े जैसे अन्य वक्ताओं ने अपने अनुभव और विचार साझा किये।
प्रत्येक मेगावाट के लिए चाहिए 4 एकड़ भूमि
कार्यक्रम सत्र की शुरुआत में कुमार संभव श्रीवास्तव ने कहा कि, ‘आज के सत्र का लक्ष्य नवीकरणीय ऊर्जा की चुनौतियों की पहचान करके समाधान तलाशना हैं। ऐसे समाधान जो संरचनात्मनक, संस्थागत और समुदाय केंद्रित हो। भारत का 2030 तक 500 मेगावाट से अधिक नवीकरणीय ऊर्जा का लक्ष्य है। सरकार के अपने अनुमान के अनुसार, प्रत्येक मेगावाट के लिए लगभग 4 एकड़ भूमि की आवश्यकता होती है। भारत जैसे देश मे जहां भूमि दुर्लभ है और कई प्रतिस्पर्धी मांगें हैं। वहाँ नवीकरणीय ऊर्जा के लिए भूमि प्रबंधन में स्वाभाविक रूप से कई चुनौतियाँ हैं।
40 बड़े भूमि विवादों का किया गया दस्तावेजीकरण
कुमार संभव ने जानकारी देते हुए बताया कि देश भर के 40 बड़े भूमि विवादों का दस्तावेजीकरण किया है जो नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं से उत्पन्न हो रहे हैं। ये विवाद लगभग 50,000 लोगों को प्रभावित करते हैं। वहीं, लगभग 32,000 हेक्टेयर भूमि में फैले हुए हैं। लगभग 21 मेगावाट की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता इन विवादों से प्रभावित है। जबकि, भूमि विवादों के कारण 7.3 गैलन की परियोजना भी पहले से रुकी हुई है।
इसके बाद कुमार संभव कहते हैं कि, ‘यह ऊर्जा परियोजनाएं हमारी प्राथमिकता भी हैं।मगर, इन परियोजनाओं में सूचना की विषमताएं, सामाजिक प्रभाव आकलन की कमीं, भूमि अधिग्रहण अधिनियम, बुनियादी ढांचे की अनदेखी, मूल्यांकन, जानकारी, पारदर्शिता, परामर्श में कमीं, अदालती फैसलों के बाद भी संघर्ष की स्थिति जैसे विभिन्न चुनौतियां बनी हुई हैं। जिनका निराकरण अति आवश्यक है।’
नवीकरणीय ऊर्जा के लिए आवश्यक है भूमि
महाराष्ट्र के बिजली क्षेत्र के विशेषज्ञ श्रीकान्त जलतरे ने भारत के 2030 तक 500 गीगावाट (GW) नवीकरणीय ऊर्जा के लक्ष्य पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि सौर और पवन ऊर्जा जैसी परियोजनाओं की राह में सबसे बड़ी बाधा ‘भूमि की उपलब्धता’ है, जिससे कंपनियों और स्थानीय समुदायों के बीच जटिल विवाद उत्पन्न हो रहे हैं। महाराष्ट्र के संदर्भ में इस चुनौती को स्पष्ट करते हुए उन्होंने बताया कि राज्य में लगभग 10 मिलियन किसान और 45 लाख कृषि नेटवर्क हैं। इतनी विशाल कृषक आबादी को दिन के समय बिजली देना एक समय असंभव था, जिसके कारण सरकार को आधी रात को बिजली आपूर्ति करनी पड़ती थी।
इस संकट के समाधान हेतु जब 1600 मेगावाट की एक महत्वाकांक्षी परियोजना की योजना बनी, तो उसके लिए 60,000 एकड़ भूमि की आवश्यकता ने एक नया संकट खड़ा कर दिया। बढ़ती कीमतों के बीच इतनी बड़ी ज़मीन का अधिग्रहण करना न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक रूप से भी चुनौतीपूर्ण रहा। श्रीकान्त जलतरे के अनुसार, यह अनुभव सिखाता है कि कोई भी बड़ी ऊर्जा परियोजना अपने साथ विकास के साथ-साथ भूमि विवाद और सामुदायिक संघर्षों की एक लंबी कतार भी लेकर आती है, जिन्हें सुलझाना सरल नहीं है।
संवैधानिक उल्लंघन और विस्थापन का संकट
इस अवसर पर भार्गवी एस राव भी अपने विचार साझा करती हैं। वे स्वतंत्र रिसर्चर हैं। वह बतलाती हैं कि, ‘नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में जो परियोजनाएं लायी जा रही हैं वे 1992 में आये 73 वें संशोधन के नजरिये से असंवैधानिक दिखाई देती हैं। आज एक के बाद एक राज्य में भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है। जिसमें पंचायतों को दरकिनार किया जा रहा है। वहीं, जो 2010, 2013 और 2015 में जो कुछ संशोधन हुए वह ठंडे बस्ते में डाल दिये गए।
भार्गवी आगे जाहिर करती हैं कि, ‘आज जमीन हथियाने के हमने नए-नए तरीके खोज लिए हैं। जिसमें पट्टे की विधि, प्रत्यक्ष खरीदी यहाँ तक की हिंसा का इस्तेमाल करके सबसे गरीब लोगों से जमीन छीन लेना शामिल है। आज भूमि के कमजोर हिस्सों को मोड़ा जा रहा है। उनके सुरक्षा की व्यवस्था नहीं हैं। लेकिन, इन्हीं ज़मीनों पर लोगों का एक बड़ा समुदाय अपने जीवन और आजीविका के लिए निर्भर है। वे परामर्श के बिना विस्थापित हो रहे हैं।
लोग अपनी जमीन बचाने के लिए चला रहे हैं अभियान
सिमरन ग्रोवर ऊर्जा और पर्यावरण के क्षेत्र में कार्य करते हैं। वे कहते हैं कि, ‘परियोजनाओं में डेवलपर को दो भूमि का अधिकार मिलते है। जिसमें या तो सार्वजनिक भूमि होती है। जिसे सरकार हस्तांतरित करती है। या फिर, निजी भूमि होती है। जो की निजी पक्ष का लेन-देन बन जाता है। इस स्थति में परियोजनाओं में भूमि अन्य को लेकर जमीन स्तर पर जो भी विवाद होते हैं वे डेवलोपर्स और समुदाय के बीच होते हैं।
आगे सिमरन बयां करते हैं कि, ‘अभी एक परियोजना में 75,000 एकड़ भूमि की जरूरत है। लेकिन, भूमि को लेकर विवाद के हालात बन गए हैं। अब इस 75,000 एकड़ भूमि को बचाने के लिए एक बड़ा अभियान चलाया जा रहा है। लोग अपनी जमीन, घर, संसाधन बचाने के लिए चिंतनीय स्थिति में हैं। जबकि, ऐसी परियोजनाओं में राज्य नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसियों का कहना होता है कि, हमें कोई चिंता नहीं है। हम एकल खिड़की मंजूरी एजेंसी हैं।
पूरी व्यवस्था को जोड़ा जाए कार्बन क्रेडिट से
ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञ देवी प्रसाद मिश्रा ने इस चर्चा को एक नई दिशा देते हुए कृषि और पर्यावरण के अंतर्संबंधों पर ज़ोर दिया। उन्होंने आंकड़ों के माध्यम से बताया कि भारत की 60 प्रतिशत भूमि अभी भी कृषि योग्य है, जबकि 10 प्रतिशत हिस्सा बंजर है। मिट्टी की गुणवत्ता पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान में मृदा कार्बन (Soil Carbon) का स्तर 0.5 से भी कम हो गया है।
देवी प्रसाद ने एक व्यावहारिक समाधान पेश करते हुए कहा कि यदि हम कृषि भूमि पर साल में तीन फसलें उगाने की पद्धति अपनाएं, तो बिना किसी अतिरिक्त भूमि को बंजर बनाए इतना ‘कार्बन सिंक’ पैदा किया जा सकता है जो देश के कुल कार्बन उत्सर्जन की लगभग 20 प्रतिशत भरपाई करने में सक्षम होगा। उन्होंने सुझाव दिया कि हमें समुदाय के साथ मिलकर ‘बायोचार’ (Biochar) उत्पादन सुविधाओं का विकेंद्रीकरण करना चाहिए। उनके अनुसार, इस पूरी व्यवस्था को ‘कार्बन क्रेडिट तंत्र’ से जोड़कर न केवल पर्यावरण को बचाया जा सकता है, बल्कि यह निवेशकों के लिए भी एक बड़ा आर्थिक प्रोत्साहन साबित होगा।
भारत होगा सबसे अधिक सौर ऊर्जा पर निर्भर
शोधकर्ता गणेश हेगड़े ने भारत के ‘नेट जीरो’ (Net Zero) लक्ष्यों की विशालता और उससे जुड़ी नीतिगत कमियों को उजागर किया। उन्होंने रेखांकित किया कि भविष्य में भारत पूरी दुनिया में सौर ऊर्जा पर सर्वाधिक निर्भर रहने वाला देश होगा, जिसका अर्थ है कि हमें प्रतिदिन 100 मेगावाट क्षमता के संयंत्र स्थापित करने की आवश्यकता है। हालांकि, हेगड़े ने चिंता जताते हुए कहा कि हमारे पास अभी भी ऐसी कोई सुसंगत एकीकृत नीति नहीं है जो भूमि और ऊर्जा अवसंरचना के आपसी तालमेल को कवर करती हो, जिससे आने वाले समय में संघर्ष की स्थितियां और गंभीर हो सकती हैं।
उन्होंने आंकड़ों के माध्यम से बताया कि देश की ऊर्जा परियोजनाओं का एक बड़ा हिस्सा आदिवासी क्षेत्रों में स्थित है, जिससे वहां के समुदायों की भूमि सबसे अधिक प्रभावित हो रही है। उनके अनुसार:
- भारत को अपने ऊर्जा लक्ष्यों के लिए कुल 4.6 प्रतिशत भूमि की आवश्यकता है।
- वर्तमान में गुजरात 5.9 प्रतिशत भूमि का योगदान दे रहा है।
- उत्तर प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्य अपनी भूमि के 6 से 7 प्रतिशत से अधिक हिस्से का उपयोग इन परियोजनाओं के लिए कर रहे हैं।
गणेश हेगड़े ने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा कि वर्तमान में सबसे बड़ी चुनौती यह समझना है कि परियोजना क्षेत्रों में समुदायों की वास्तविक प्रतिक्रियाएं और प्राथमिकताएं क्या हैं। वे इस बात पर शोध कर रहे हैं कि स्थानीय लोग सरकारी संस्थाओं और अधिकारियों को किस नजरिए से देखते हैं, ताकि विकास और विश्वास के बीच की खाई को भरा जा सके।
किसानों को नहीं मिला उचित मुआवजा
आईआईटी दिल्ली की स्कॉलर सुकन्या खार ने नवीकरणीय ऊर्जा की तुलना ‘हरित क्रांति’ से करते हुए एक नया दृष्टिकोण पेश किया। उन्होंने कहा कि जिस तरह कृषि के क्षेत्र में हरित क्रांति आई थी, आज हम बिजली और ऊर्जा के क्षेत्र में वैसी ही क्रांति देख रहे हैं। केंद्र और राज्य सरकारें सौर परियोजनाओं को लेकर अत्यंत महत्वाकांक्षी हैं, जिसके परिणामस्वरूप 500 मेगावाट से अधिक क्षमता वाले संयंत्र हजारों एकड़ जमीन पर स्थापित किए जा रहे हैं। जिसमें हम संभवत: हरित क्रांति के रूप में बिजली, ऊर्जा के क्षेत्र को देख रहे हैं।
उन्होंने कहा कि आज नवीकरणीय ऊर्जा बहुत आवश्यक हैं लेकिन, दुनियाँभर में कई संघर्षों को जन्म भी दे रही है। जिससे यह चिंता बढ़ गयी हैं कि, ये परियोजनाएं कहाँ स्थापित की जाएं। परियोजनाओं के कारण आजीविका की सुरक्षा, जैव-विविधता, पर्यावरणीय नुकसान, लोगों के अधिकारों की सुरक्षा जैसी चुनौतियाँ आ रही हैं। जिससे सवाल उभरता है कि, ऊर्जा परियोजनाओं से किसे फायदा और किसे नुकसान होता है।
फिर इसके आगे वे व्यक्त करती हैं कि, ‘परियोजनाएं जिन लोगों की ज़मीनों को बंजर जमीन कहकर छीन रहीं है, असलियत में वे जमीने लोगों और पशुओं के भोजन, आवास का साधन हैं। मैंने 10000 से 14000 एकड़ जमीन तक में फैले व 1.5 से लेकर 2.2 गैलन वाट क्षमता वाले कई बड़े सौर पार्क का अध्ययन किया तब कई सामाजिक-आर्थिक चुनौतियाँ पायीं। अध्ययन में ज्ञात हुआ कि, लोगों को कृषि, चराई भूमि, आवास का उचित मुआवजा नहीं मिला।
नेपाल में क्या है मुआवजे की स्थिति
नेपाल सरकार के भूमि मंत्रालय में शामिल गणेश पी भट्टा ने नेपाल के तुलनात्मक अध्ययन पर जोर देते हुए कहते हैं कि, ‘भारत क्षेत्रफल के हिसाब से नेपाल से लगभग 22 या 23 गुना बड़ा है। जबकि, जनसंख्या के हिसाब से 40, 46 या 47 गुना बड़ा है। भारत तो 40 गैलन वाट का सोलर पार्क बना रहा है। जबकि, नेपाल सिर्फ सोच रहा है। नेपाल में सौर ऊर्जा के लिए हमारी भूमि आवश्यकता 1 हेक्टेयर प्रति मेगावाट है। जो आसान नहीं।, वे बताते हैं कि, ‘नेपाल में कई प्रकार की भूमि स्थितियाँ है।
जिनमें मुख्यत: दस्तावेज वाली भूमि (जिनके पास भूमि का दस्तावेज है) और दस्तावेज के लिए पात्र (जो भूमि दस्तावेज के लिए पात्र तो हैं पर दस्तावेज नहीं मिला हैं) शामिल है। इस स्थिति में कुछ सालों से सरकार सौर परियोजनाओं में दस्तावेज वाली भूमि और दस्तावेज के लिए पात्र भूमि के लिए भी मुआवजा दे रही है।
फिर, आगे वे बतलाते हैं कि, ‘सौर परियोजनाओं में दस्तावेज वाली भूमि को उचित मुआवजा मिल जाता है, जबकि गैर-दस्तावेज वाली भूमि को उचित मुआवजा नहीं मिल पाता है। ऐसे में मुआवजा में भारी अंतर नजर आता है। इस स्थिति से निपटने के लिए नेपाल के पास कोई कानून नहीं हैं। इस चुनौती के लिए लोग संघर्ष कर रहे हैं लेकिन, अभी तक समाधान नहीं निकला।
निष्कर्ष
इस संवाद के महत्वपूर्ण तथ्यों से यह समझा जा सकता है कि, ऊर्जा, बिजली अन्य की पूर्ति के लिए नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं की कितनी प्राथमिकता है। वहीं, इन परियोजनाओं के लिये भूमि की उपयोगिता की क्या भूमिका है। साथ में विभिन्न वक्तव्यों और विचार-विमर्श से इस तरफ भी गौर फरमाया जा सकता है कि, कैसे नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में पारदर्शिता, सामुदायिक परामर्श, भूमि, आवास मुआवजे संबंधी चुनौतियाँ लोगों के हक-अधिकार प्रभावित कर देती हैं। ऐसें में गरीब व संसाधनहीन लोग अपना अधिकार पाने के लिए एक आंदोलन रूपी जटिल संघर्ष का सामना करने के लिए विवश हो जाते हैं।
लेखक: सतीश भारतीय