गमारी या सफ़ेद सागौन की कृषि वानिकी

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गमारी या सफ़ेद सागोन की खेती 

परिचय

औषधीय गुणों से भरपूर गमारी का उपयोग और भी बहुत सारे उद्योंगों में किया जाता है | इसके बहुत से नाम हैं जैसे मैलाइना अरबोरिया (कुल वबिनेसी) सामान्य: गमार, खमेर, सफ़ेद सागौन अथवा येमन के नाम से प्रचलित यह मझौले से वृहत आकार का वृक्ष है, जो मध्यपूर्व एशिया से लेकर वृहत भारत में पाया जाता है | इसकी ऊँचाई लगभग 30 मीटर एवं गोलाई 41/2 मीटर होती है |

  • वनवर्धन गुण
  • प्रकाश : उच्च प्रकाश सहय
  • सुखा सहय : सुखा सहय
  • आग : आग के प्रति संवेदनशील
  • गुल्यवन क्षमा (कापिस पावर): उत्तम

पुर्नउत्पादन

इस प्रजाति को कृत्रिम एवं प्राकृतिक दोनों विधियों से पुर्नउत्पादित किया जा सकता है |

प्राकृतिक पुर्नउत्पादन : निम्न विधियों द्वारा किया जा सकता है |

बीज :

  • कापीज (गुल्म वन)
  • रूट सर्कस (मूल चूषक)
  • कृत्रिम पुर्नउत्पादन :
  • बीज रोपण द्वारा
  • ठूंठ रोपण द्वारा
  • सम्पूर्ण पौधा स्थानान्तरण द्वारा
  • वर्धी प्रजनन

बीजों का संक्रमण :

पुष्प सामान्यत: तीन से चार वर्षों में प्रारंभ होता है | यह प्रत्येक वर्ष प्रचुर मात्रा में फल देता है | पुष्पन सामान्यत: फ़रवरी माह से प्रारंभ होता है और परिपक्व फल अप्रैल से जून के माह तक प्राप्त होता है | बीज मई – जून माह में एकत्रित किया जाता है | फल एकत्रित करने के बाद गुदे को फल से पृथक कर देना चाहिए |

बीज सुखाना तथा संग्रहण :

गूदाविहीन बीज को सूर्य के तेज प्रकाश (धूप) में सुखाना चाहिए | सूखे हुये बीज को जूट के बोरों में संग्रहित करना चाहिए | ताजे बीजों का उपयोग पौधे के उत्पादन के लिये किया जाता है, जिनमें लगभग 90 प्रतिशत तक अंकुरण हो जाता है |

रोपणी तकनीक

बीज को 7.5 से.मी. × 7.5 से.मी. की दूरी पर तथा 1 से.मी. – 2.5 से.मी. की गहराई में उठे हुये बेड्स में धूप में लगते है | बीजों का अंकुरण 10 – 15 दिनों में प्रारम्भ होता है 15 से.मी. ऊँचाई वाले पौधे को पालीथीन बैग में स्थानान्तरित किया जाता है |

पौधरोपण तकनीक :

निम्नाकिंत तकनीकों द्वारा पौधरोपण किया जाता है |

सीधे बुवाई द्वारा :

व्यवसायिक रोपण तैयार करने की यह अत्यंत आसान विधि है, जिसमें बीजों की बुवाई चप्पों में करते है | प्रत्येक चप्पे, जिनका आकार 0.3 वर्ग मीटर होता है, में 1.8 मीटर × 1.8 मीटर का अंतराल होता है | इन चप्पों को 0.3 मीटर गहराई में खोदकर लगभग एक महीन तक छोड़ दिया जाता है, तत्पश्चात उर्वर मिटटी से भरकर इन चप्पों को भूतल से 7.5 से.मी. ऊँचाई उठा दिया जाता है | मानसून आने पर 3 – 4 बीज प्रत्येक चप्पे में 1 से.मी. से 2.5 से.मी. गहराई में बुआई दी जाती है | चप्पा बुआई में प्रति हेक्टेयर 14 कि.ग्रा. बीज की आवश्यकता होती है |

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रेखीय बुआई : इसमें 0.9 मीटर का अंतराल रखा जाता है |

ठूँठ रोपण –

ठूँठ रोपण में एक वर्ष आयु वर्ग के पौधे से ठूँठ एकत्रित कर रोपण किया जाता है | मई माह में तैयार पौधे का उपयोग अगले वर्ष जून माह में स्टम्प (ठूँठ) रोपण में किया जाता है |

पूर्ण स्थानान्तरण –

कृत्रिम पुनरुत्पाद्न की यह सर्वाधिक प्रचलित विधि है | इसमें बीज द्वारा तैयार पौधे को बिना जड़ काटे मिटटी सहित एकत्रित किया जाता है | मिटटी का गोला बनाकर मानसून के पहले रोपण किया जाता है यह विधि 95 प्रतिशत तक सफल होती है |

वर्धी प्रजनन :

वार्धि प्रजनन की विधि उ.व.अ.स. , जबलपुर द्वारा विकसित की गई है जो एस प्रजाति के वृहत प्रजनन की भुत सफल विधि है | यह दोनों विधियों सूक्ष्म एवं वृहत प्रजनन / कटिंग द्वारा किया जा सकता है सूक्ष्म प्रजनन की विधि का मानकी करण एस प्रकार है – एम एस बेसल मीडियम + 1 माइक्रोमोल BA + 4 मि.ग्रा. सिल्वर नाईट्रेट -/लिटर – तना (शूट) प्रवर्धन के लिये एवं WPM बेसल मीडियम + 10 माइक्रोमोल IBA जडोत्पादन के लिये | विभिन्न प्रकार की कलमों और उनके उपचार की विधियों में पल्लवित कलमों को 5 मिलिमोल IBA विलय से उपचारित करना एस प्रजाति के क्लोन्स (प्रतिरूप) के उत्पादन की बेहद सफल विधि है |

चक्रण (रोटेशन) –

सामान्यत: लुग्दी काष्ठ एवं शानवुड का चक्रण क्रमश: 6 एवं 10 वर्षों में किया जाता है | इंधन काष्ठ के लिये 5 – 10 वर्षों का चक्रण सामान्य होता है एक उपज जिसका चक्रण 10 वर्षों का है, उसके 5वें वर्ष में 50 प्रतिशत प्रथम विरलन (थिनिंग) एवं अन्य 50 प्रतिशत को सातवें वर्ष में विरलित किया जाता है | दूसराचक्रण गुल्मन द्वारा प्राप्त होता है | पौध एवं ठूँठ का रोपण तीसरे चक्रण के लिये किया जाता है |

आर्थिकी

इस प्रजाति में असाधारन रूप से तेज वृद्धि होती है और अच्छे स्थानों पर यह 5 वर्षों में 20 मीटर तक की ऊँचाई लगभग 30 मीटर एवं व्यास 60 से.मी. तक हो जाता है | एक सामान्य से अच्छे वृक्ष में 6 – 7 मी. तक का सीधा लट्ठा मिलता है | कुछ वृक्ष के रोपण के तीसरे वर्ष में 3 मी. एवं 4.5 वर्षों में 20 मी. की ऊँचाई तक पहुँच जाते है | गमार की उत्पादन क्षमता कमजोर बुलाई मिटटी में 12 वर्षों में 210 घन मी./हेक्टेयर और कछार या जलोद मिटटी में 10 वर्षों में 252 घन मी./ हेक्टेयर तक मिलती है | यह प्रजाति जलोद लोमी मिटटी में उचित नमी वाले क्षेत्र में औसत 25 घन मी./ हेक्टेयर / वर्ष परिमाप की काष्ठ उत्पन्न करती है |

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सुरक्षा

कल्ला या कोपल : पौध या बालवृक्ष को कई बार बकरी या अन्य जानवर चर जाते है | अत: इन्हें बचाने की उचित व्यवस्था करनी चाहिए |

नाशीजीव एवं कीट

यह प्रजाति पौध अवस्था के फ्यूजेरियम सोलेनी फफूंद द्वारा विल्टिंग (मुरझाना) बीमारी के प्रति अतिसंवेदनशील है | नासूर बनने एवं शिर्शरंभी क्षय (डाईबैक) बीमारी बागानों में होती है, जो कि कोर्टीशियम सालमोनिकोलर एवं ग्रिफोसफेरिया मेलिनी द्वारा की जाती है | कुछ रोगजनकों द्वारा पर्ण अगमारी और पर्ण धब्बा बीमारी फैलाई जाती है, जिनका उल्लेख भी मिलता है |

नश्वरता :

इसमें नश्वरता (मोर्टेलिटी) 30 – 80 प्रतिशत तक होती है जो की रोगजनों, वातावरण आद्रता विज्ञान / स्थल स्वभाव के कारणों से हो सकती है | बागानों में उत्तरजीविता बढ़ाने के लिये निम्न उपाय किये जा सकते हैं:-

  • मिश्रित कृषि
  • उचित स्थल का चयन
  • रोगी वृक्षों को हटाना
  • व्यवसायिक बागानों के लिये प्रतिरोधी क्लोन का चयन

उपयोग

इस प्रजाति की काष्ठ विभिन्न उपयोगिताओं के मद्देनजर उच्च महत्व की है |

  • प्लाईवुड, कागज एवं माचिस
  • कृषि उपकरण
  • निर्माण एवं साज सज्जा
  • घास या चारा

औषधीय गुण

इसकी जड़ों से एक कडवी बलवर्धन औषधी मिलती है, जो की पेट दर्द में उपयोगी है और इसमें एक महत्वपूर्ण घटक दशमूला नामक आयुर्वेदिक सूत्रीकरण का हिस्सा है | इसके फलों का उपयोग फोड़े, रक्ताल्पता, कुष्ठ रोग एवं मलबन्ध में होता है | इसका उपयोग उन्माद एवं मिर्गी के उपचार में स्नायु औषधी के निर्माण एवं प्रयोग में होता है |

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