छत्तीसगढ़ में किसानों की आय बढ़ाने और पारंपरिक खेती के साथ नई फसलों को बढ़ावा देने की दिशा में पचौली की खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है। सुगंधित एवं औषधीय गुणों वाले इस पौधे की पत्तियों से निकलने वाले तेल की देश-विदेश में मांग है। इसका इस्तेमाल इत्र, परफ्यूम, साबुन, कॉस्मेटिक्स, अरोमाथेरेपी और प्राकृतिक कीट-रोधक उत्पादों में किया जाता है।
राज्य में छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड (वन विभाग) की ओर से 8 एकड़ भूमि में पचौली की खेती का प्रायोगिक प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। इसके परिणाम बेहतर रहने पर किसानों को बड़े स्तर पर इसकी खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
एक बार पौधा तैयार होने के बाद कम हो जाती है लागत
पचौली की खेती की खासियत यह है कि खेत में पौधे स्थापित होने के बाद उन्हीं पुराने पौधों से आगे के लिए नए पौधे तैयार किए जा सकते हैं। इससे किसानों को बार-बार महंगे बीज खरीदने की आवश्यकता कम हो जाती है और उत्पादन लागत को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
पचौली की खेती में जैविक खाद का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। गोबर, गोमूत्र और गुड़ से तैयार जीवामृत जैसे प्राकृतिक इनपुट का इस्तेमाल पौधों की वृद्धि और मिट्टी की सेहत के लिए उपयोगी माना जाता है।
1 एकड़ से 1.5 लाख रुपए तक शुद्ध आय का दावा
पचौली की खेती को उच्च मूल्य वाली सुगंधित फसल के रूप में देखा जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार एक एकड़ में करीब 30 किलो तक तेल उत्पादन और बाजार में लगभग 6,000 रुपए प्रति लीटर तक कीमत मिलने की स्थिति में किसान अच्छी आय प्राप्त कर सकते हैं।
बताया गया है कि उचित प्रबंधन और बाजार मूल्य के आधार पर किसान पहले साल सभी खर्च निकालने के बाद करीब 1 लाख रुपए से लेकर 1.5 लाख रुपए तक शुद्ध मुनाफा प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि वास्तविक आय खेती के क्षेत्रफल, पौधों की गुणवत्ता, उत्पादन, तेल की रिकवरी, बाजार भाव और प्रसंस्करण लागत पर निर्भर करेगी।
साल में 2 से 3 बार कटाई
पचौली की एक अन्य खासियत इसकी कई बार कटाई है। सामान्य परिस्थितियों में एक वर्ष में 2 से 3 बार कटाई की जा सकती है। इससे किसानों को एक ही फसल से बार-बार आय प्राप्त करने का अवसर मिलता है।
इसकी खेती खुले खेत में करने के अलावा फलदार बगीचों, नारियल और सुपारी के बागानों के बीच उपलब्ध खाली स्थान में भी की जा सकती है। इस तरह किसान मौजूदा खेती के साथ पचौली को अतिरिक्त आय के विकल्प के रूप में अपना सकते हैं।
जुलाई-अगस्त में रोपाई का सही समय
पचौली की खेती के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु अनुकूल मानी जाती है। इसकी रोपाई के लिए जुलाई-अगस्त का समय उपयुक्त बताया गया है। उत्पादन और गुणवत्ता बेहतर करने के लिए किसान ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल कर सकते हैं। रोपाई के लगभग 4 से 6 महीने बाद पहली कटाई की जा सकती है।
कटाई के बाद पचौली की पत्तियों से भाप आसवन यानी स्टीम डिस्टिलेशन प्रक्रिया के माध्यम से सुगंधित तेल निकाला जाता है।
पचौली के तेल की कहां होती है मांग?
पचौली की पत्तियों से प्राप्त तेल का इस्तेमाल कई उद्योगों में किया जाता है। प्रमुख रूप से इसका उपयोग:
- इत्र और परफ्यूम बनाने में
- साबुन एवं कॉस्मेटिक उत्पादों में
- अरोमाथेरेपी में
- सुगंधित उत्पादों में
- प्राकृतिक कीट-रोधक उत्पादों में
होता है।
इसी औद्योगिक मांग के कारण पचौली किसानों के लिए पारंपरिक फसलों के मुकाबले एक संभावित उच्च मूल्य वाली फसल का विकल्प बन रही है।
30-40 एकड़ के क्लस्टर में खेती से बाजार का लाभ
पचौली की खेती को बड़े स्तर पर क्लस्टर मॉडल में करने से किसानों को बाजार से जोड़ने में मदद मिल सकती है। यदि किसान 30 से 40 एकड़ के समूह में इसकी खेती करते हैं तो बड़ी कंपनियों के सीधे खेतों से उपज खरीदने के लिए आगे आने की संभावना बढ़ती है।
इससे किसानों को सामूहिक रूप से बेहतर बाजार उपलब्ध कराने और उचित मूल्य प्राप्त करने में मदद मिल सकती है। औषधि पादप बोर्ड की ओर से किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और विपणन सहायता उपलब्ध कराने की बात कही गई है।
किसानों के लिए क्यों खास है पचौली की खेती?
पचौली किसानों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण हो सकती है क्योंकि इसमें एक साथ कई संभावनाएं जुड़ी हैं। कम लागत में पौध तैयार करना, एक वर्ष में कई बार कटाई, पत्तियों से मूल्यवान तेल निकालना और सुगंधित एवं कॉस्मेटिक उद्योगों में मांग इसे वैकल्पिक आय का अच्छा विकल्प बना सकती है।
छत्तीसगढ़ में शुरू किया गया 8 एकड़ का प्रायोगिक प्रोजेक्ट सफल रहता है तो आने वाले समय में राज्य के अन्य किसान भी पचौली की खेती को अपनाकर अपनी आमदनी के स्रोतों में विविधता ला सकते हैं।
किसानों के लिए जरूरी बात
पचौली की खेती शुरू करने से पहले किसान अपने क्षेत्र की जलवायु, मिट्टी, सिंचाई व्यवस्था, पौध सामग्री, तेल निकालने की सुविधा और बाजार की उपलब्धता की जानकारी जरूर लें। केवल अनुमानित बाजार भाव के आधार पर बड़े क्षेत्र में खेती शुरू करने के बजाय पहले प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन लेना बेहतर रहेगा।