हरियाणा में किसानों की खेती की लागत कम करने और आमदनी बढ़ाने के लिए कृषि विभाग नई रणनीति पर काम करेगा। प्रदेश में क्षेत्रवार जलवायु परिस्थितियों के आधार पर विशेष फसली कैलेंडर (Crop Calendar) तैयार करने की तैयारी है। इसके साथ ही गौशालाओं में गोबर और गोमूत्र से जीवामृत तैयार कर किसानों को निःशुल्क उपलब्ध कराने की संभावनाएं भी तलाशी जाएंगी।
हरियाणा के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्याम सिंह राणा ने चंडीगढ़ में आयोजित “मिशन फॉर आत्मनिर्भरता इन पलसीज” की उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में अधिकारियों को इस संबंध में निर्देश दिए। सरकार का जोर ऐसी खेती को बढ़ावा देने पर है जिसमें पानी और खाद की खपत कम हो, उत्पादन लागत घटे और किसानों को उपज का बेहतर मूल्य मिल सके।
हर क्षेत्र के लिए तैयार होगा विशेष फसली कैलेंडर
हरियाणा में अलग-अलग क्षेत्रों की जलवायु और कृषि परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए एक विशेष फसली कैलेंडर तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। इस कैलेंडर के माध्यम से किसानों को क्षेत्र और मौसम के अनुरूप फसल चयन में मार्गदर्शन देने की योजना है, ताकि उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करते हुए कम लागत में अधिक लाभ प्राप्त किया जा सके।
कृषि मंत्री ने अधिकारियों से कहा कि किसानों को ऐसी फसलों की बुवाई के लिए प्रोत्साहित किया जाए जिनमें खाद और पानी की जरूरत कम पड़ती हो। यह पहल राज्य में फसल विविधीकरण और संसाधन-कुशल खेती को बढ़ावा देने में भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
धान और दलहन की निर्यात योग्य किस्मों पर रहेगा फोकस
बैठक में धान और दलहनी फसलों की ऐसी उन्नत किस्मों की पहचान करने पर भी जोर दिया गया, जिनकी विदेशी बाजारों में मांग हो और जिनका निर्यात किया जा सके। इसके पीछे सरकार का उद्देश्य किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य दिलाने के साथ कृषि निर्यात को बढ़ावा देना है।
आगामी फसल सीजन के लिए उन्नत बीजों की उपलब्धता की भी समीक्षा की गई। कृषि मंत्री ने कहा कि किसी भी फसल के अच्छे उत्पादन में बीज की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, इसलिए किसानों को प्रमाणित एवं उन्नत किस्मों के बीज खरीदने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।
किसानों को मुफ्त जीवामृत देने की तैयारी
प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के लिए हरियाणा में एक नई पहल पर विचार किया जा रहा है। कृषि मंत्री ने अधिकारियों को राज्य की गौशालाओं में गाय के गोबर और गोमूत्र से जीवामृत तैयार करने की संभावनाओं का अध्ययन करने के निर्देश दिए हैं।
योजना यह है कि गौशालाओं में तैयार जीवामृत को किसानों को निःशुल्क उपलब्ध कराया जा सके, जिससे किसान प्राकृतिक खेती को आसानी से अपना सकें। इसके लिए अधिकारियों को एक समर्पित पायलट प्रोजेक्ट तैयार कर काम करने की सलाह दी गई है।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि अभी मुफ्त जीवामृत वितरण की व्यवस्था लागू होने की घोषणा नहीं हुई है। फिलहाल सरकार ने इसकी संभावनाएं तलाशने और पायलट प्रोजेक्ट तैयार करने के निर्देश दिए हैं।
प्राकृतिक खेती और कम लागत वाली कृषि को मिलेगा बढ़ावा
जीवामृत की प्रस्तावित पहल का उद्देश्य किसानों को प्राकृतिक खेती की ओर प्रोत्साहित करना और खेती में रासायनिक इनपुट पर निर्भरता घटाना है। यदि प्रस्तावित पायलट सफल रहता है तो गौशालाओं में उपलब्ध गोबर और गोमूत्र का कृषि में उपयोग बढ़ाने के साथ किसानों को प्राकृतिक खेती के लिए स्थानीय स्तर पर जरूरी इनपुट उपलब्ध कराने का रास्ता खुल सकता है। सरकार का फोकस प्राकृतिक खेती को केवल प्रोत्साहित करने के बजाय इसे किसानों के लिए व्यावहारिक और कम लागत वाला विकल्प बनाने पर है।
कपास और दलहन की कटाई-मड़ाई में बढ़ेगा मशीनीकरण
खेती में मजदूरी और अन्य लागत कम करने के लिए कपास और दलहनी फसलों की कटाई तथा मड़ाई में आधुनिक कृषि मशीनों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया है।
कृषि मंत्री ने बिजाई से लेकर कटाई तक वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाने के निर्देश दिए हैं। इसका उद्देश्य खेती के विभिन्न चरणों में श्रम और लागत को कम करते हुए कृषि कार्यों को अधिक कुशल बनाना है।
दलहन में आत्मनिर्भरता की दिशा में भी तैयारी
बैठक का प्रमुख विषय “मिशन फॉर आत्मनिर्भरता इन पलसीज” रहा। ऐसे में दलहनी फसलों का उत्पादन बढ़ाने के साथ कम पानी और कम कृषि इनपुट वाली फसलों को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया गया।
दलहन की उन्नत किस्में, प्रमाणित बीज और आधुनिक मशीनीकरण किसानों के लिए उत्पादन बढ़ाने और खेती को अधिक लाभकारी बनाने की रणनीति का हिस्सा होंगे।