बेर की व्यावसायिक खेती एवं उससे होने वाली आय

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बेर की व्यावसायिक खेती एवं उससे होने वाली आय

जलवायु एवं भूमि

बेर खेती ऊष्ण व उपोष्ण जलवायु में आसानी से की जा सकती है क्योकि इसमें कम पानी व सूखे से लड़ने की विशेष क्षमता होती है बेर में वानस्पतिक बढ़वार वर्षा ऋतु के दौरान व फूल वर्षा ऋतु के आखिर में आते हैं तथा फल वर्षा की भूमिगत नमी के कम होने तथा तापमान बढ़ने से पहले ही पक जाते हैं। गर्मियों में पौधे सुषुप्तावस्था में प्रवेश कर जाते हैं व उस समय पत्तियाँ अपने आप ही झड़ जाती हैं तब पानी की आवश्यकता नहीं के बराबर होती है। इस तरह बेर अधिक तापमान तो सहन कर लेता है लेकिन शीत ऋतु में पड़ने वाले पाले के प्रति अति संवेदनशील होता है। अतः ऐसे क्षेत्रों में जहां नियमित रूप से पाला पड़ने की सम्भावना रहती है, इसकी खेती नहीं करनी चाहिए। जहां तक मिट्‌टी का सवाल है, बलुई दोमट मिट्‌टी जिसमें जीवांश की मात्रा अधिक हो इसके लिए सर्वोत्तम मानी जाती है, हालाकि बलुई मिट्‌टी में भी समुचित मात्रा में देशी खाद का उपयोग करके इसकी खेती की जा सकती है। हल्की क्षारीय व हल्की लवणीय भूमि में भी इसको लगा सकते हैं।

उन्नत किस्में

अगेती किस्में

गोला, काजरी गोला-इनके फल दिसम्बर के अन्तिम सप्ताह में पकना शुरू होते हैं तथा पूरे जनवरी तक उपलब्ध रहते हैं।

मध्यम किस्में

सेव, कैथली, छुहारा, दण्डन, सेन्यूर-5, मुण्डिया, गोमा कीर्ति इत्यादि-जिनके फल मध्य जनवरी से मध्य फरवरी तक उपलब्ध रहते हैं।

पछेती किस्में

उमरान, काठा, टीकड़ी, इलायची-इन किस्मों के फल फरवरी-मार्च तक उपलब्ध रहते हैं।

बगीचे की स्थापना

सबसे पहले बगीचे के लिए चयनित खेत में से जंगली झाड़ियों इत्यादि हटाकर उसके चारों ओर कांटेदार झाड़ियों या कटीली तार से बाड़ बनाएं ताकि रोजड़े व अन्य जानवरों से पौधों को बचाया जा सके। खेत की तैयारी मई-जून महीने में 6-7 मीटर की दूरी पर वर्गाकार विधि से रेखांकन करके 2’*2’*2′ आकार के गढ़्‌ढ़े खोदने के साथ शुरू करें, इनको कुछ दिन धूप में खुला छोड़ने के बाद ऊपरी मिट्‌टी में 20-25 किलो देशी खाद व 10 ग्राम फिपरोनिल (0.03 प्रतिशत ग्रेन्यूल) प्रति गड्ढा मिला कर भराई करके मध्य बिन्दु पर एक खूटी गाड दें। इसके उपरान्त पहली वर्षा से जुलाई माह में जब गड्‌ढ़ों की Berमिट्‌टी जम जाए तो इसमें पहले से कलिकायन किए पौधों को प्रतिरोपित करें। प्रत्यारोपण करने के लिए पौलीथीन की थैली को एक तरफ से ब्लेड से काटकर जड़ों वाली मिट्‌टी को यथावत रखते हुए पोलीथीन को अलग करें तथा पौधों को मिट्‌टी के साथ गड्‌ढ़ों के मध्य बिन्दु पर स्थापित करके पौधों के चारों तरफ की मिट्‌टी अच्छी तरह दबाकर तुरन्त सिंचाई करें। अगले दिन करीब दस लीटर पानी प्रति पौधा फिर देवें। इसके बाद वर्षा की स्थिति को देखते हुए जरूरत के अनुसार 5-7 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करते रहें। सर्दी के मौसम तक पौधे यथावत स्थापित हो जाते हैं तब 15 दिन के अन्तराल पर सिंचाई कर सकते हैं। जबकि गर्मी के मौसम में रोपाई के पहले वर्ष में एक सप्ताह के अन्तर पर सिंचाई करनी चाहिए।

अंतरफसल

शुरू में तीन वर्ष तक पौधों की कतारों के बीच में कुष्माण्ड कुल की सब्जियों के अलावा मटर, मिर्च, चौला, बैंगन इत्यादि लगा सकते हैं। बारानी क्षेत्रों में मोठ, मूंग व ग्वार की खेती काफी लाभदायक रहती है।

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कटाई-छँटाई

बेर में कटाई-छँटाई का कार्य बहुत महत्वपूर्ण होता है। प्रारम्भिक वर्षों में मूलवृन्त से निकलने वाली शाखाओं को समय-समय पर काटते रहें ताकि कलिकायन किए हुए ऊपरी भाग की उचित बढ़ोत्तरी हो सके। शुरू के 2-3 वर्ष में पौधों को सशक्त रूप व सही आकार देने के लिए इनके मुख्य तने पर 3-4 प्राथमिक शाखाऍ यथोचित दूरी पर सभी दिशाओं में चुनते हैं। इसके बाद इसमें प्रति वर्ष कृन्तन करना अति आवश्यक होता है क्योंकि बेर में फूल व फल नयी शाखाओं पर ही बनते हैं। कटाई-छँटाई करने का सर्वोत्तम समय मई का महीना होता है। जब पौधे सुषुप्तावस्था में होते हैं। मुखय अक्ष की शाखाओं के चौथी से षष्टम्‌ द्वितीयक शाखाओं के स्तर (17-23 नोड) तक काटना चाहिए साथ ही सभी द्वितीयक शाखाओं को उनके निकलने के पोइन्ट से नजदीक से ही काटना चाहिए। इसके अतिरिक्त अनचाही, रोग ग्रस्त, सूखी तथा एक दूसरे के ऊपर से गुजरने वाली शाखाओं को उनके निकलने के स्थान से ही हर वर्ष काट देना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक

देशी खाद, सुपर फास्फेट व म्यूरेट आफ पोटाश की पूरी मात्रा व नत्रजन युक्त उर्वरक यूरिया की आधी मात्रा जुलाई माह में पेड़ों के फैलाव के हिसाब से अच्छी तरह मिलाकर सिंचाई करें। शेष बची नत्रजन की आधी मात्रा नवम्बर माह में फल लगने के पश्चात देनी चाहिए।

पौधों की आयु(वर्ष) कि.ग्रा प्रति

पौधा प्रति वर्ष

ग्राम प्रति पौधा प्रति वर्ष
गोबर की खाद सिंगल सुपर फास्फेट यूरिया म्यूरेट ऑफ पोटाश
1 10 300 220 80
2 15 600 440 160
3 20 900 660 250
4 25 1200 1100 350
5 व आगे 30 1500 1300 400

सिंचाई

बेर में एक बार अच्छी तरह स्थापित हो जाने के बाद बहुत ही कम सिंचाई की जरूरत पड़ती है। एक पूर्ण विकसित पेड़ में पानी की आवश्यकता को परम्परागत एवं बूंद-बूंद सिचाई विधि से तालिका संख्या 2 में दर्शाया गया है। गर्मी की सुषुप्तावस्था के बाद 15 जून तक अगर वर्षा नहीं हो तो सिंचाई आरम्भ करें ताकि नई बढ़वार समय पर शुरू हो सके। इसके बाद अगर मानसून की वर्षा का वितरण ठीक हो तो सितम्बर तक सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है, अन्यथा तालिका संख्या 2 में बताए गए तरीके से सिंचाई करें। सितम्बर में फूल आना शुरू होते हैं और 15 अक्टूबर तक फल लग जाते हैं इस दौरान हल्की सिंचाई करें। इसके बाद अगर सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो तो 15 दिन के अन्तर पर सिंचाई कर सकते हैं। किस्म विशेष के सम्भावित पकने के समय से 15 दिन पहले सिंचाई बन्द कर देनी चाहिए ताकि फलों में मिठास व अन्य गुणों का विकास अच्छा हो सके।

प्रमुख कीट, रोग एवं उनका नियंत्रण

फल मक्खी

यह कीट बेर को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाता है। इस मक्खी की वयस्क मादा फलों के लगने के तुरन्त बार उनमें अण्डे देती है। ये अण्डे लार्वा में बदल कर फल को अन्दर से नुकसान पहुँचाते हैं। इसके आक्रमण से फलों की गुठली के चारों ओर एक खाली स्थान हो जाता है तथा लटे अन्दर से फल खाने के बाद बाहर आ जाती हैं। इसके बाद में मिट्‌टी में प्यूपा के रूप में छिपी रहती हैं तथा कुछ दिन बाद वयस्क बनकर पुनः फलों पर अण्डे देती हैं। इसकी रोकथाम एवं नियंत्रण के लिए मई-जून में बाग की मिट्‌टी पलटें। फल लगने के बाद जब अधिकांश फल मटर के दाने के साइज के हो जाएं उस समय क्यूनालफास 25 ईसी 1मिलीलीटर प्रतिलीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। दूसरा छिड़काव पहले छिड़काव के 20-25 दिन बाद करें।

छालभक्षी कीट

यह कीट नई शाखाओं के जोड़ पर छाल के अन्दर घुस कर जोड़ को कमजोर कर देता है फलस्वरूप वह शाखा टूट जाती है, जिससे उस शाखा पर लगे फलों को सीधा नुकसान होता है। इसकी रोकथाम के लिए खेत को साफ सुथरा रखें, गर्मी में पेड़ों के बीच में गहरी जुताई करें। जुलाई-अगस्त में डाइक्लोरवास 76 ईसी 2 मिलीलीटर प्रतिलीटर पानी में घोल बनाकर नई शाखाओं के जोड़ों पर दो-तीन बार छिड़काव करना चाहिए।

चेफर बीटल

इसका प्रकोप जून-जुलाई में अधिक होता है यह पेड़ों की नई पत्तियों एवं प्ररोहों को नुकसान पहुँचाता है इससे पत्तियों में छिद्र हो जाते हैं। इसके नियंत्रण के लिए पहली वर्षा के तुरन्त बाद क्यूनालफास 25 ईसी 2 मिली या कार्बेरिल 50 डब्लूपी 4 ग्राम प्रतिलीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

छाछया (पाउडरी मिल्डयू या चूर्णी फफूँद): इस रोग का प्रकोप वर्षा ऋतु के बाद अक्टूबर-नवम्बर में दिखाई पड़ता है। इससे बेर की पत्तियों, टहनियों व फूलों पर सफेद पाउडर सा जमा हो जाता है तथा प्रभावित भागों की बढ़वार रूक जाती है और फल व पत्तियाँ गिर जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए केराथेन एल.सी. 1 मिलीलीटर या घुलनशील गंधक 2 ग्राम प्रतिलीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। 15 दिन के अन्तर पर दो-तीन छिड़काव पूर्ण सुरक्षा के लिए आवश्यक होते हैं।

सूटीमोल्ड

इस रोग से ग्रसित पत्तियों के नीचे की सतह पर काले धब्बे दिखाई देने लगते हैं जो कि बाद में पूरी सतह पर फैल जाते हैं और रोगी पत्तियाँ गिर भी जाती हैं। नियंत्रण के लिए रोग के लक्षण दिखाई देते ही मैन्कोजेब 3 ग्राम या कापर आक्सीक्लोराइड 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

पत्ती धब्बा/झुलसा रोग

इस रोग के लक्षण नवम्बर माह में शुरू होते हैं यह आल्टरनेरिया नामक फॅफूद के आक्रमण से होता है। रोग ग्रस्त पत्तियों पर छोटे-छोटे भूरे रंग के धब्बे बनते हैं तथा बाद में यह धब्बे गहरे भूरे रंग के तथा आकार में बढ़कर पूरी पत्ती पर फैल जाते हैं। जिससे पत्तियाँ सूख कर गिरने लगती हैं। नियंत्रण हेतु रोग दिखाई देते ही मेन्कोजेब 3 ग्राम या थायोफिनेट मिथाइल 1 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 15 दिन के अन्तर पर 2-3 छिड़काव करें।

आय/व्यय

वरण रुपये प्रति हेक्टेयर
सिंचित अवस्था बारानी अवस्था
व्यय

  1. 1 खाद एवं उर्वरक
  2. 2 श्रमिकों का खर्च
  3. 3 फलों की तुड़ाई का खर्च
  4. 4 पौध संरक्षण
  5. 5 सिंचाई

कुल

आय

फल 20 रुपये प्रति किलो

पत्ती चारा (सूखा)

जलाऊ लकड़ी(सूखी)

कुल

17655.00

48000.00

9972.00

2250.00

8310.00

—————-

86187.00

—————-

50 किलो/पेड़ 277000.00

4986.00

2077.00

————-

284063.00

12465.00

30000.00

4986.00

1125.00

48576

25 किलो/ पेड़138500.00

2493.00

1040.00

————

142033.00

शुद्ध आय 197876.00 93457.00
 स्त्रोत: केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान,जोधपुर, राजस्थान

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