भिंडी की कृषि

भिंडी की वैज्ञानिक खेती

भिंडी  Abelmoschus esculentus (L.) Moench एक लोकप्रिय सब्जी है। सब्जियों में भिंडी का प्रमुख स्थान है जिसे लोग लेडीज फिंगर या ओकरा के नाम से भी जानते हैं। भिंडी की अगेती फसल लगाकर किसान भाई अधिक लाभ अर्जित कर सकते है। भारत में भिंडी एक प्रमुख सब्जी है | इसकी खेती उष्ण तथा शुष्क दोनों क्षेत्रों में खेती होती हैं | देश में भिंडी की खेती वर्ष में दो बार होती है इसलिए लगभग वर्ष भर भिंडी उपलब्ध हो जाता है |

भिंडी में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, खनिज लवणों जैसे कैल्सियम, फास्फोरस के अतिरिक्त विटामिन ए, बी, सी, थाईमीन एवं रिबोफलेविन भी पाया जाता है | इसमें विटामिन ए तथा सी पर्याप्त मात्रा में पाये जाते है | आयोडीन की मात्रा भिंडी में अधिक होती है | भिंडी का उपयोग कई बीमारियों में होता है | ICAR- Indian Institute of Vegetable Research द्वारा बहुत सी प्रोद्योगिकी विकसित की गई है |

 

भूमि तथा खेत की तैयारी कैसे करें

भिंडी के बीज के अंकुरण के लिए 27 से 30 डिग्री से.ग्रे. तापमान उपयुक्त होता है | एक बात यह भी ध्यान देने की है की 17 डिग्री से.ग्रे. से कम तापमान पर अंकुरण नहीं होता है | अगर भूमि की बात किया जय तो जल निकासी वाली किसी भी भूमि में खेती किया जाता हैं | लेकिन भूमि का पी.एच.मान 7.0 से 7.8 होना उपयुक्त रहता है | खेत तैयार करने के लिए खेत को दो – तीन जुताई के बाद पाता चलालेना चाहिए | इससे मिट्टी भूर-भूरी हो जाती है |

भिंडी की नई प्रजातियाँ

पूसा ए – 4 

यह प्रजाति पतरोग यैलो वें मोजैक विषाणु रोधी है तथा एफिड तथा जैसिड के प्रति सहनशील है | इस प्रजाति को बोने के 15 दिन बाद से फल आना शुरू हो जाता है तथा पहली तुडाई 45 दिनों बाद शुरू हो जाती हैं | इसकी फल मध्यम आकार के गहरे, कम लॉस वाले, 12 – 15 से.मी. लंबे तथा आकर्षक होते हैं | इसकी औसत पैदावार ग्रीष्म में 10 टन व खरीफ में 15 टन प्रति हेक्टयर है |

परभनी क्रांति 

यह किस्म बुवाई के 50 दिन बाद फल को तोड़ सकते हैं इसकी फल गहरे हरे एवं 15 – 18 से.मी. लम्बे होते हैं | अगर रोग की बात करें तो पित – रोगरोधी है | परभनी क्रांति किस्म की पैदावार 9 – 12 टन प्रति हैक्टेयर है |

पंजाब – 7 

यह किस्म पंजाब तथा हरियाण के राज्यों में ज्यदा होता है | यह प्रजाति पित – रोगरोधी के लिए जाना जाता है | इसके फल हरे एवं मध्य आकार के होते है | बुवाई के लगभग 55 दिन बाद फल आने शुरू हो जाते हैं | इसकी पैदावार 8 – 12 टन / हैक्टेयर है |

अर्का अभय 

यह प्रजाति बेंगलौर के भारतीय अनुसंधान संस्थान के द्वारा तैयार किया गया है | इस प्रजाति के पौधें येलोवेन मोजेक विषाणु रोग रोधी है | इसकी पौधें 120 से 150 से.मी. सीधे तथा अच्छी शाखा युक्त होते हैं |

अर्का अनामिका 

 प्रजाति भी भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान बंगलौर के द्वारा तैयार किया गया है | तथा यह भी येलोवेन मोजेक विषाणु रोग रोधी है | इसकी फल रोम्र्हित मुलायम गहरे हरे तथा 5 – 6 धारियों वाले होते हैं | यह प्रजाति दोनों ऋतुओं में उगाई जा सकती है | इसकी पौधा 120 से 150 से.मी. सीधे होता है तथा 12 – 15 टन प्रति हेक्टयर पैदावार है |

 वर्षा उपहार 

इस प्रजाति की शुरुआत हरियाणा से हुई है तथा येलोवेन मोजेक विषाणु रोग रोधी है | इसकी पौधे माध्यम आकार 90 से 120 से.मी.की होती है तथा कई शाखाओं युक्त होती है | इस प्रजाति की पौधों में 40 दिन में फूल निकाल आती है तथा फल 7 दिनों बाद तोड़े जा सकते हैं | यह प्रजाति वर्ष के दोनों ऋतुओं में किया जाता है | इसकी पैदावार 9 – 10 टन प्रति हेक्टयर होती है |

हिसार उन्नत 

यह प्रजाति चौधरी चरण सिंह हरियाण कृषि विश्वविध्यालय, हिसार द्वारा तैयार किया गया है | यह मध्य ऊँचाई वाला पौधा है जिसकी ऊँचाई 90 से 120 से.मी. तक होती है | इसकी पौधे 4 से 5 शाखाओं वाली होती है | बुवाई के 45 दिन बाद फल तोड़ सकते हैं तथा पैदावार 12 से 13 टन / हैक्टेयर होता है | इसकी खेती दोनों ऋतू में कर सकते हैं | 

 वि.आर.ओ.- 6 

इस प्रजाति की शुरुआत 2003 में हुई है | इसकी खेती वर्ष तथा ग्रीष्म दोनों ऋतुओं में किया जाता है | इसकी पौधों में 35 से 38 दिनों में फूल निकाल आती है | इसकी पैदावा वर्षा ऋतू में 18 टन / हैक्टेयर तथा गर्मी के मौसम में 13.5 टन/ प्रति हेक्टयर है |

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बीज की मात्र एवं बुवाई की विधि 

अलग – अलग मौसम में अलग – अलग होती है | सिंचित क्षेत्र में 2.5 से 3 किलोग्राम तथा असिंचित क्षेत्र में 5 से 7 किलोग्राम प्रति हेक्टयर की आवश्यकता होती है | भिंडी के बीज बोने से पहले खेत को तैयार कर लें | इसके लिए खेत को 2 से 3 जुताई करने के बाद पाटा चला ले वर्षा कालीन भिंडी के लिए कतार से कतार दुरी 40 – 45 से.मी. एवं कतारों में पौधों की बीच की दुरी 25 – 30 से.मी. का अंतराल उचित रहता है | ग्रीष्मकालीन भिंडी का भी बुवाई कतारों में करना चाहिए |

बुवाई का सही समय क्या है ?

भिंडी की खेती वर्ष तथा ग्रीष्म दोनों मौसम में किया जाता है | ग्रीष्मकालीन भिंडी की बुवाई फ़रवरी – मार्च में तथा वर्षकालीन भिड़ी की बुवाई जून – जुलाई में की जाती है | अगर भिंडी की फसल लगातार लेनी है तो तिन सप्ताह के अंतराल पर फ़रवरी से जुलाई के मध्य अलग – अलग खेतों में भिंडी की बुवाई की जा सकती है |

खाद और उर्वरक 

अगर किसान के पास खाद है तो प्रति हेक्टयर 15 से 20 टन गोबर की खाद दे सकते हैं | रासायनिक खाद में 80 किलोग्राम नाईट्रोजन , 60 किलोग्राम फास्फोरस, तथा 60 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टयर देना चाहिए | नाईट्रोजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के पूर्व भूमि में देना चाहिए | नाईट्रोजन की शेष मात्रा को दो भागों में 30 से 40 दिनों के अंतराल पर देना चाहिए |

निंदाई तथा गुडाई

भिंडी की फसल में निराई तथा गुडाई बहुत जरुरी है | इससे खेत में खरपतवार नहीं होते हैं तथा उर्वरक देने में आसानी होता है | बुवाई के 15 से 20 दिन बाद प्रथम निंदाई – गुडाई करना चाहिए | कोशिश करें की खरपतवार के लिए कीटनाशक का प्रयोग नहीं करे | अगर कीटनाशक का प्रयोग करते हैं तो फ्ल्यूक्ल्रेलिन की 1.0 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व मात्रा को प्रति हैक्टेयर की दर से पर्याप्त नाम खेत में बीज बोने के पूर्व मिलाने से प्रभावी खरपतवार नियंत्रण किया जा सकता है |

सिंचाई कब करें ?

भिंडी की सिंचाई मौसम के आधार अपर करना चाहिए | मार्च महीने में 10 से 12 दिन, अप्रैल माह में 7 से 8 दिन और मई – जून में 4 से 5 दिन के अंतराल पर करें | अगर किसान वर्ष ऋतू में भिंडी की खेती करते हैं तो आप को सिंचाई करने की जरुरत नहीं हैं |

पौधों को रोग से बचने के उपाय

भिंडी की बीज खरीदते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए की बीज रोगरोधी होना चाहिए | एसे भिंडी में येलोवेन मोजैक वाईरस एवं चूर्णिल रोग लगता है | लेकिन मोयला, हरा तेला, सफ़ेद मक्खी प्ररोहे एवं फल छेदक कीट, रेड स्पाइडर माइट कीट पौधों को काफी नुकसान पहुंचाते हैं |

पीत शिरा रोग (यलो वेन मोजैक वाइरस)   

इस रोग की लक्षण यह है की पत्तियों की शिराएं पीली पडने लगती है। पूरी पत्तियाँ एवं फल भी पीले रंग के हो जाते है पौधे की बढवार रुक जाती है |

रोकथाम :- इसकी रोकथाम के लिए आक्सी मिथाइल डेमेटान 25 प्रतिशत ई.सी. अथवा डाइमिथोएट 30 प्रतिशत ई.सी. की 1.5 मिली प्रति लीटर पानी में अथवा इमिडाइक्लोप्रिड  17.8 प्रतिशत एस.एल. अथवा एसिटामिप्रिड 20 प्रतिशत एस. पी. की 5 मिली./ग्राम मात्रा प्रति 15 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें |

चूर्णिल आसिता 

इस रोग में भिंडी की पुरानी निचली पत्तियों पर सफेद चूर्ण युक्त हल्के पीले धब्बे पडने लगते है |

रोकथाम : इस रोग की रोकथाम के लिए ये सफेद चूर्ण वाले धब्बे काफी तेजी से फैलते है। इस रोग का नियंत्रण न करने पर पैदावार 30 प्रतिशत तक कम हो सकती है। इस रोग के नियंत्रण हेतु घुलनशील गंधक 2.5 ग्राम मात्रा अथवा  हेक्साकोनोजोल 5 प्रतिशत ई.सी. की 1.5 मिली. मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर 2 या 3 बार 12-15 दिनों के अंतराल पर छिडकाव करना चाहिए |

कीट से पौधों की बचाव

प्ररोह एवं फल छेदक :- इसकी लक्ष्ण यह है की इस कीट का प्रकोप वर्षा ऋतु में अधिक होता है। प्रारंभिक अवस्था में इल्ली कोमल तने में छेद करती है जिससे तना सूख जाता है। फूलों पर इसके आक्रमण से फल लगने के पूर्व फूल गिर जाते है। फल लगने पर इल्ली छेदकर उनको खाती है जिससे फल मुड जाते हैं एवं खाने योग्य नहीं रहते है |

रोकथाम :- रोकथाम हेतु क्विनॉलफॉस 25 प्रतिशत ई.सी., क्लोरपाइरोफॉस 20 प्रतिशत ई.सी. अथवा प्रोफेनफॉस 50 प्रतिशत ई.सी. की 2.5 मिली. मात्रा प्रति लीटर पानी के मान से छिडकाव करें तथा आवयकतानुसार छिडकाव को दोहराएं |

हरा तेला, मोयला एवं सफेद मक्खी:-  इस कीट का लक्षण यह है की ये सूक्ष्म आकार के कीट पत्तियों, कोमल तने एवं फल से रस चूसकर नुकसान पहुंचाते है |

रोकथाम :- रोकथाम हेतु आक्सी मिथाइल डेमेटान 25 प्रतिशत ई.सी. अथवा डाइमिथोएट 30 प्रतिशत ई.सी. की 1.5 मिली मात्रा प्रति लीटर पानी में अथवा इमिडाइक्लोप्रिड  17.8 प्रतिशत एस.एल. अथवा एसिटामिप्रिड 20 प्रतिशत एस. पी. की 5 मिली./ग्राम मात्रा प्रति 15 लीटर पानी में मिलाकर छिडकाव करें एवं आवश्यकतानुसार छिडकाव को दोहराए ।

रेड स्पाइडर माइट 

यह माइट पौधे की पत्तियों की निचली सतह पर भारी संख्या में कॉलोनी बनाकर रहता हैं। यह अपने मुखांग से पत्तियों की कोशिकाओं में छिद्र करता हैं । इसके फलस्वरुप जो  द्रव निकलता है उसे माइट चूसता हैं। क्षतिग्रस्त पत्तियां पीली पडकर टेढ़ी मेढ़ी हो  जाती हैं। अधिक प्रकोप हो ने पर संपूर्ण पौधे सूख कर नष्ट हो  जाता हैं।

रोकथाम :- इसकी रोकथाम हेतु डाइकोफॉल 18.5 ई. सी. की 2.0 मिली मात्रा प्रति लीटर अथवा घुलनशील गंधक 2.5 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिडकाव करें एवं आवश्यकतानुसार छिडकाव को दोहराए ।