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3 लाख से अधिक नए किसानों को दिया जायेगा ब्याज मुक्त फसली ऋण

ब्याज मुक्त फसली ऋण का वितरण

कृषि के क्षेत्र में निवेश के लिए केंद्र तथा राज्य सरकारें किसानों को सस्ता या ब्याज रहित ऋण उपलब्ध कराती है। जिसका उपयोग किसान फसल उत्पादन के लिए आवश्यक सामग्री जैसे खाद, बीज रासायनिक दवाएँ आदि खरीदने के लिए कर सकते हैं। इस कड़ी में कुछ राज्य सरकारों के द्वारा यह ऋण सहकारी बैंक के माध्यम से बिना किसी ब्याज के उपलब्ध कराया जाता है, इसमें राजस्थान शामिल है। इस वर्ष राजस्थान सरकार ने राज्य में सहकारी बैंक के माध्यम से मार्च, 2023 तक 3.71 लाख नए किसानों को सदस्य बनाकर फसली ऋण देने का फैसला लिया है।

राजस्थान प्रमुख शासन सचिव, सहकारिता श्रीमती श्रेया गुहा ने अपेक्स बैंक सभागार में सभी केन्द्रीय सहकारी बैंकों के प्रबंध निदेशकों को संबोधित किया। उन्होंने प्रबंध निदेशक अपेक्स बैंक को निर्देश दिए कि फसली ऋण वितरण एवं नए सदस्यों किसानों को ऋण से जोड़ने की साप्ताहिक समीक्षा की जाए। साथ ही सदस्य किसानों को समय पर ऋण वितरण हो, इसे सुनिश्चित किया जाए।

26 लाख से अधिक किसानों को दिया गया ब्याज मुक्त फसली ऋण

राजस्थान के प्रमुख शासन सचिव, सहकारिता श्रीमती श्रेया गुहा ने कहा कि राज्य में 1.29 लाख कृषकों को 233 करोड़ रूपये का ऋण वितरित किया गया है तथा मार्च 2023 तक 3.71 लाख नए किसानों को सदस्य बनाकर फसली ऋण वितरण से जोड़ा जाएगा। राज्य में इस वित्त वर्ष में 25 नवंबर तक 26.92 लाख किसानों को 12 हजार 811 करोड़ रूपये का ब्याज मुक्त फसली ऋण वितरित किया गया है। उन्होंने कहा कि कहा कि पात्र किसानों को मध्यकालीन कृषि एवं अकृषि ऋण वितरण पर भी फोकस किया जाए।

कम सिंचाई में अधिक पैदावार के लिए किसान लगाएँ गेहूं की नई विकसित किस्म DBW-296

कम सिंचाई में गेहूं की नई उन्नत किस्म डीबीडब्ल्यू–296

देश में रबी सीजन में मुख्यतः गेहूं की खेती की जाती है परंतु गेहूं ज़्यादातर पूरी तरह सिंचित परिस्थितियों में उगाया जाता है। देश के उत्तर पश्चिमी राज्यों के कई क्षेत्र जैसे पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पश्चिमी हरियाणा के क्षेत्र सिंचाई के लिए पानी की कमी का सामना कर रहे हैं। ऐसे में किसान काम सिंचाई में ही गेहूं की अच्छी पैदावार प्राप्त कर सकें इसके लिए भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र के द्वारा नई-नई उच्च उपज देने वाली एवं कीट रोगों के प्रति सहनशील क़िस्में विकसित की का रही हैं। 

भारत के उत्तर–पश्चिम मैदानी इलाकों के लिए विकसित किस्में उच्च उत्पादन क्षमता होने के अलावा, रोग प्रतिरोधी और अंतिम आवधिक गर्मी के प्रति सहनशील होनी चाहिए। गेहूं में अंतिम आवधिक हीट स्ट्रैस तब होता है, जब दाना भरने की अवस्था के दौरान औसत तापमान 31 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाता है। इसके अलावा गेहूं की किस्म को किसान के खेत में बेहतर प्रदर्शन करना चाहिए। गेहूं की डी.बी.डब्ल्यू.–296 किस्म एक ऐसी ही किस्म है जो कम पानी में भी अच्छी उपज देती है। यह किस्म (150 दिनों) देर से पकने वाली किस्मों में जाना जाता है तथा अन्य गेहूं से ज्यादा उत्पादन क्षमता भी दर्ज किया है।

किसान गेहूं किस्म DBW-296 की खेती कैसे करें?

गेहूं की यह किस्म भारत के उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र में सीमित सिंचाई के तहत समय पर बुआई के लिए उपयुक्त है। किसान इस किस्म की बुवाई 25 अक्टूबर से 5 नवंबर तक कर सकते हैं। गेहूं की बुवाई सीड ड्रिल से करने पर अच्छी उपज प्राप्त होती है। इसमें पंक्ति से पंक्ति की दूरी 20 से.मी. रखी जानी चाहिए। किसान इस किस्म की बुआई के लिए बीज दर 100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक रख सकते हैं। डीबीडब्ल्यू गेहूं की सिंचाई दो बार किया जाना जरुरी है। पहली सिंचाई बुवाई से पहले और एक सिंचाई बुआई के 45 से 50 दिनों बाद कर सकते हैं।

बीज उपचार एवं खाद का छिड़काव

गेहूं की यह किस्म कई प्रकार के रोगों के प्रति प्रतिरोधक है। इसके बावजूद  प्रणालीगत और संपर्क कवकनाशी के बचाव के लिए किसान गेहूं के बीज को (कार्बोक्सिन 37.5 प्रतिशत + थीरम 37.5 प्रतिशत) / 2 -3 ग्राम प्रति किलोग्राम से बीज दर से उपचार करें।

सिमित सिंचाई के अंतर्गत सर्वश्रेठ प्रदर्शन 90:60:40 किलोग्राम एनपीके/हेक्टेयर प्रयोग द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। नाइट्रोजन की आधी मात्रा बिजाई के समय तथा प्रथम नोड (45–50 दिन बाद) अवस्था पर देनी चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण 

फसल की अच्छे उत्पादन के लिए खरपतवार का नियंत्रण जरुरी है। खरपतवार के नियंत्रण के लिए यह जरुरी है कि उनकी पहचान समय पर की जाए । चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण के लिए 2,4-डी/500 ग्राम/हैक्टेयर या मेट्सल्फूराँन 4 ग्राम/हेक्टेयर या कारफेंट्राजोन/20 ग्राम/हेक्टेयर लगभग 300 लीटर पानी/हेक्टेयर का उपयोग करके छिडकाव किया जा सकता है।

संकरी पत्ती के घास के नियंत्रण के लिए आइसोप्रोट्यूराँन /1000 ग्राम/हेक्टेयर या क्लाँडिनाफाँस /60 ग्राम/हेक्टेयर, पिनेक्सोडेन/50 ग्राम/हेक्टेयर या फिनोक्साप्रोप/100 ग्राम/हेक्टेयर सल्फोसल्फ्यूराँन/25 ग्राम प्रति हेक्टेयर फिनोक्साप्रोप/100 ग्राम/हैक्टेयर का उपयोग किया जाना चाहिए। खरपतवार नियंत्रण के लिए बुवाई के 30 से 40 दिनों बाद पर्याप्त मृदा में नमी के बाद प्रयोग करना चाहिए।

कीट और रोग नियंत्रण 

गेहूं की यह किस्म कई प्रकार के कीट तथा रोगों के लिए प्रतिरोधक है। पीला, भूरा तना और रतुआ तथा कई अन्य रोगों के लिए प्रतिरोधी है। यद्धपि फफूंदी रोग जैसे – करनाल बंट और पाउडरी मिल्ड्यू की प्रारंभिक अवस्था दिखने पर रोगों के नियंत्रण के लिए प्रोपीकोनाजोल/ट्रायडेमेफोन/ टेबुकानाजोल/0.1 प्रतिशत (1 मिली./लीटर) की दर से छिड़काव करें।

DBW-296 से कितनी उपज प्राप्त होती है?

डीबीडब्ल्यू-296 ने उत्तर-पश्चिम भारत के विभिन्न स्थानों में समय पर बोई जाने वाली सीमित सिंचाई स्थितियों के तहत अखिल भारतीय समन्वित बहुस्थान, बहुवर्षीय गेहूं परीक्षण के तीन वर्षों में PBW-644, HD 3043, WH 1142, NIAW 3170 और  HI 1628 की तुलना में बेहतर और स्थिर उपज क्षमता दिखाई है। गेहूं की किस्म DBW 296 की अधिकतम उपज क्षमता 83.3 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है वही इस किस्म से समय पर बुआई करने एवं सीमित सिंचाई की स्थिति में 56.1 क्विंटल/हेक्टेयर की औसत उपज प्राप्त की जा सकती है। 

कृषि मंत्री ने किसानों के लिए जारी किया संदेश, डीएपी खाद की कमी होने पर किसान करें यह काम

डीएपी खाद की कमी होने पर वैकल्पिक उर्वरकों का करें प्रयोग

वर्तमान में देश के लगभग सभी राज्यों में रबी फसलों की बिजाई ज़ोरों पर चल रही है, जिसके चलते यूरिया, डीएपी एवं अन्य रासायनिक उर्वरकों की माँग में बहुत अधिक वृद्धि हुई है। ऐसे में कई स्थानों पर किसानों को डीएपी खाद नहीं मिल पा रही है जिसको देखते हुए हरियाणा के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री जेपी दलाल द्वारा किसानों के नाम  संदेश जारी किया गया है। जारी संदेश में कहा गया है कि प्रदेश सरकार द्वारा किसानों को गेंहू की बिजाई के लिए पर्याप्त डीएपी खाद उपलब्ध करवाने के लिए लगातार प्रयास किये जा रहे हैं । 

कृषि मंत्री जेपी दलाल ने अपने संदेश में कहा कि किसान गेंहू की बिजाई में डीएपी खाद के स्थान पर एसएसपी व एनपीके का प्रयोग भी कर सकते हैं । प्रदेश में वर्तमान में 23 हजार मीट्रिक टन डीएपी, 52 हजार मीट्रिक टन एसएसपी एवं 7 हजार मीट्रिक टन एनपीके स्टॉक के रूप में उपलब्ध है।

डीएपी के स्थान पर करें अन्य उर्वरकों का प्रयोग

कृषि मंत्री जेपी दलाल द्वारा जारी संदेश में कहा गया है कि डीएपी खाद के स्थान पर गेंहू की बिजाई में दूसरे उर्वरक भी प्रयोग किये जा सकते हैं । हिसार स्थित चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय की सिफारिश के अनुसार एक बैग डीएपी या 3 बैग एसएसपी या डेढ़ बैग एनपीके (12:32:16) का प्रयोग करके फास्फोरस की आपूर्ति पूर्ण कर सकते हैं। 

उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि पिछले वर्ष सितंबर से नवम्बर माह तक प्रदेश में 2 लाख 78 हजार मीट्रिक टन डीएपी बिक्री हुई थी, जबकि इस वर्ष सितंबर से नवम्बर माह (21 नवम्बर तक) प्रदेश में 3 लाख 6 हजार मीट्रिक टन डीएपी की बिक्री हो चुकी है। केंद्र सरकार द्वारा राज्य में प्रतिदिन 2 से 3 हजार मीट्रिक टन डीएपी/एनपीके उपलब्ध करवाया जा रहा है तथा खाद की बिक्री प्वाइंट ऑफ सेल (पीओएस) मशीन से की जानी सुनिश्चित की है। किसान संयम रखते हुए शांति पूर्वक खाद की खरीद करें ताकि किसी प्रकार की अव्यवस्था न फैले।

प्राकृतिक खेती के लिए खोले जाएँगे प्रशिक्षण केंद्र, किसानों को गाय पालन के लिए दिया जाएगा अनुदान

प्राकृतिक खेती के लिए प्रशिक्षण एवं अनुदान

किसान प्राकृतिक खेती से कम लागत के साथ जैविक पैदावार बढ़ावा सकते हैं और अपनी आय में भी वृद्धि कर सकते हैं। प्राकृतिक खेती का उद्देश्य रसायन मुक्त कृषि, प्रकृति के अनुरूप जलवायु खेती को बढ़ावा देना और पर्यावरण एवं जलवायु प्रदूषण में कमी लाते हुए इस पद्धति को स्थाई आजीविका के रूप में स्थापित करना है। इसके लिए किसानों को प्रशिक्षण एवं गाय पालन के लिए अनुदान दिया जा रहा है। इस कड़ी में हरियाणा सरकार प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने और अधिक से अधिक किसानों को इस ओर प्रोत्साहित करने के लिए प्रयास कर रही है। 

हरियाणा के मुख्य सचिव श्री संजीव कौशल ने कहा कि अभी तक कहीं भी प्राकृतिक खेती पर वैज्ञानिक रिसर्च पेपर उपलब्ध नहीं हैं। इसके लिए हरियाणा राज्य को इस दिशा में कदम बढ़ाने होंगे और प्राकृतिक खेती पर वैज्ञानिक रिसर्च पेपर तैयार करने होंगे, जिसमें इस पद्धति की पूरी प्रक्रिया, समयावधि और परिणामों की विस्तृत जानकारी उपलब्ध हो सके।

प्राकृतिक खेती के लिए बनाए जाएँगे नए प्रशिक्षण केंद्र

हरियाणा सरकार किसानों को जागरूक और प्रशिक्षित करने के लिए प्रशिक्षण दे रही है। वर्तमान में 2 प्रशिक्षण केन्द्रों गुरुकुल, कुरुक्षेत्र और घरौंडा, करनाल में प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है। इसके अलावा, जल्द ही तीन स्थानों चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार, हमेटी, जींद तथा मंगियाणा, सिरसा में 3 और प्रशिक्षण केंद्र स्था‌पित किये जाएंगे। किसानों को इसके प्रति जागरूक करने के लिए खंड में एक प्रदर्शनी खेत में प्राकृतिक खेती करवाई जाएगी। अब तक 5 जिलों में इस प्रकार के प्रदर्शनी खेत तैयार किये जा चुके हैं।

लगभग 3,000 किसानों ने प्राकृतिक खेती के लिए कराया पंजीयन 

हरियाणा सरकार ने प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए अप्रैल, 2022 में पोर्टल लॉन्च किया था, जिस पर प्राकृतिक खेती अपनाने के इच्छुक किसान अपना पंजीकरण करवा सकें। अब तक इस पोर्टल पर 2992 किसानों ने अपना पंजीकरण करवाया है। 1201 किसानों ने रबी सीजन के दौरान प्राकृतिक खेती करने के लिए अपनी सहमति प्रदान कर दी है। इसके अलावा, 3600 मृदा सैंपल भी एकत्रित किए गए हैं।

प्राकृतिक खेती के लिए अब तक 405 एटीएम, बीटीएम तथा 119 प्र‌गतिशील किसानों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। ये अब मास्टर ट्रेनर के रूप में अन्य किसानों को प्रशिक्षित करने का काम करेंगे। इतना ही नहीं, 151 युवाओं को भी इस खेती की पद्धति का प्रशिक्षण दिया गया है।

गाय पालन के लिए दिया जाएगा अनुदान

प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए हरियाणा सरकार देसी गाय की खरीद पर 25 हजार रूपये तक की सब्सिडी व प्राकृतिक खेती के लिए जीवामृत का घोल तैयार करने के लिए चार बड़े ड्रमों के लिए हर किसान को 3 हजार रूपये दिये जा रहे हैं। ऐसा करने वाला हरियाणा देश का पहला राज्य है। प्राकृतिक खेती के उत्पादनों की पैकिंग सीधे किसान के खेतों से ही, ऐसी योजना भी तैयार की गई है , ताकि बाजार में ग्राहकों को इस बात की शंका न रहे कि यह प्राकृतिक खेती का उत्पादन है या नहीं।

मसाला फसलों की खेती के लिए अनुदान हेतु आवेदन करें

मसाला फसलों की खेती पर अनुदान हेतु आवेदन

कृषि क्षेत्र के विभिन्न उत्पादों के चौमुखी विकास के लिए सरकार परम्परागत फसलों के अलावा बागवानी फसलों जैसे फल-फूल, सब्जी, औषधीय एवं मसाला फसलों की खेती को बढ़ावा दे रही है। किसानों को इसके लिए प्रोत्साहित करने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों के द्वारा कई योजनाएँ चलाई जा रही है। जिसके तहत किसानों को इन फसलों की खेती करने के लिए अनुदान दिया जाता है। इस कड़ी में मध्य प्रदेश उद्यानिकी विभाग मसाला फसलों की खेती के लिए किसानों को अनुदान देने हेतु लक्ष्य जारी हैं।

मध्य प्रदेश सरकार बीज वाली मसाला फसलें एवं कंद/प्रकंद वाली हल्दी एवं अदरक आदि मसाला फसलों के गुणवत्तायुक्त अधिक उत्पादन देने वाली किस्मों के माध्यम से चुनिंदा मसाला फसलों के क्षेत्र विस्तार एवं उत्पादन में वृद्धि करने के उद्देश्य से “मसाला क्षेत्र विस्तार योजना” चला रही है। उद्यानिकी विभाग ने योजना के तहत बीज वाली मसाला फसलों पर अनुदान हेतु चयनित ज़िलों के लिए लक्ष्य जारी किए हैं।

मसाला फसलों की खेती के लिए कितना अनुदान Subsidy दी जाएगी 

मध्य प्रदेश राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही मसाला क्षेत्र विस्तार योजना राज्य के तहत बीज वाली मसाला फसलों में बीज एवं प्लास्टिक क्रेट्स की लागत का 50 प्रतिशत अनुदान अधिकतम 10,000 रुपए प्रति हेक्टेयर की दर से सामान्य वर्ग के किसानों को, वहीं अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति वर्ग के किसानों को 70 प्रतिशत अनुदान 14,000 रुपए प्रति हेक्टेयर जो भी कम हो दिया जाएगा। 

अभी इन ज़िलों के किसान कर सकते हैं योजना के लिए आवेदन

मध्य प्रदेश उद्यानिकी विभाग ने अभी मसाला क्षेत्र विस्तार योजना राज्य के तहत 15 जिलों के अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति वर्ग के किसानों के लिए लक्ष्य जारी किए हैं। यह ज़िले इस प्रकार है :- ग्वालियर, निवाड़ी, शहडोल, अनुपपुर, शिवपुरी, भिंडी, मुरैना, श्योपुर, कटनी बालाघाट, सिवनी, उमरिया, गुना, झाबुआ, अलीराजपुर । जारी लक्ष्य के विरुद्ध किसान ऑनलाइन आवेदन कर योजना का लाभ ले सकते हैं। 

उद्यानिकी विभाग ने अभी 15 जिलों के लिए कुल 176.24 हेक्टेयर के लिए लक्ष्य जारी किए हैं। जिस पर 24.674 लाख रूपये का अनुदान दिया जाएगा। योजना के तहत अनुसूचित जनजाति के लिए भौतिक लक्ष्य 124.5 हेक्टेयर है जिस पर अनुदान 17.43 लाख रूपये हैं तथा अनुसूचित जातिके लिए भौतिक लक्ष्य 51.74 हेक्टेयर है इस पर 7.244 लाख रूपये का अनुदान दिया जाएगा।

मसाला क्षेत्र विस्तार योजना अंतर्गत जारी लक्ष्य की विस्तृत जानकारी के लिए क्लिक करें

मसाला फसलों की खेती पर अनुदान हेतु आवेदन कहाँ करें?

योजना का लाभ लेने के लिए राज्य के पात्र किसान उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग, मध्य प्रदेश के पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। किसानों को आवेदन करते समय अपने पास फ़ोटो, आधार, खसरा नम्बर/B1/ पट्टे की प्रति, बैंक पासबुक, जाति प्रमाण पत्र आदि आवश्यक दस्तावेज अपने पास रखना होगा। इसके अलावा किसान भाई यदि योजना के विषय में अधिक जानकारी चाहते हैं तो उद्यानिकी विभाग की वेबसाइट पर देख सकते हैं अथवा विकासखंड/जिला उद्यानिकी विभाग में संपर्क करें। किसानों को आवेदन करने के लिए ऑनलाइन पंजीयन उद्यानिकी विभाग मध्यप्रदेश फार्मर्स सब्सिडी ट्रैकिंग सिस्टम https://mpfsts.mp.gov.in/mphd/#/ पर जाकर करना होगा।

नई मछली पालन नीति: अब मछली पालन के लिए 10 वर्ष के पट्टे पर ले सकेंगे तालाब और जलाशय

मछली पालन को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने किया संशोधन

ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन एवं किसानों की आय बढ़ाने के लिए सरकार पशुपालन एवं मछली पालन को बढ़ावा दे रही है। इसके लिए सरकार द्वारा नई-नई नीतियाँ तैयार की जा रही है। इस कड़ी में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल की अध्यक्षता में आयोजित मंत्रिपरिषद की बैठक में छत्तीसगढ़ राज्य की नवीन मछली पालन नीति में मछुआरा के हितों को ध्यान में रखते हुए संशोधन को मंजूरी दी गई।

मछुआ समुदाय के लोगों की मांग और उनके हितों को संरक्षित करने के उद्देश्य से नवीन मछली पालन नीति में तालाब और जलाशयों को मछली पालन के लिए नीलामी करने के बजाय लीज पर देने के साथ ही वंशानुगत-परंपरागत मछुआ समुदाय के लोगों को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया गया है।

जलक्षेत्र आबंटन सीमा में की गई कमी

नवीन मछली पालन नीति में सरकार ने तालाबों एवं सिंचाई जलाशयों के जलक्षेत्र आबंटन सीमा में 50 फीसदी की कमी कर ज्यादा से ज्यादा मछुआरों को रोजी-रोजगार से जोड़ने का प्रावधान किया गया है। प्रति सदस्य के मान से आबंटित जलक्षेत्र सीमा शर्त घटाने से लाभान्वित मत्स्य पालकों की संख्या दोगुनी हो जाएगी।

मछुआ समूह एवं मत्स्य सहकारी समिति अथवा मछुआ व्यक्ति को ग्रामीण तालाब के मामले में अधिकतम एक हेक्टेयर के स्थान पर आधा हेक्टेयर जलक्षेत्र तथा सिंचाई जलाशय के मामले में चार हेक्टेयर के स्थान पर दो हेक्टेयर जलक्षेत्र प्रति सदस्य/प्रति व्यक्ति के मान से आबंटित किया जाएगा। 

10 साल के लिए पट्टे पर ले सकेंगे तालाब एवं जलाशय

संशोधित नवीन मछली पालन नीति के अनुसार मछली पालन के लिए तालाबों एवं सिंचाई जलाशयों की अब नीलामी नहीं की जाएगी, बल्कि 10 साल के पट्टे पर दिए जाएंगे। तालाब और जलाशय के आबंटन में सामान्य क्षेत्र में ढ़ीमर, निषाद, केंवट, कहार, कहरा, मल्लाह के मछुआ समूह एवं मत्स्य सहकारी समिति को तथा अनुसूचित जनजाति अधिसूचित क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति वर्ग के मछुआ समूह एवं मत्स्य सहकारी समिति को प्राथमिकता दी जाएगी।

नवीन मछली पालन नीति में त्रि-स्तरीय पंचायत व्यवस्था अंतर्गत शून्य से 10 हेक्टेयर औसत जलक्षेत्र के तालाब एवं सिंचाई जलाशय को 10 वर्ष के लिए पट्टे पर आबंटित करने का अधिकार ग्राम पंचायत का होगा। जनपद पंचायत 10 हेक्टेयर से अधिक एवं 100 हेक्टेयर तक, जिला पंचायत 100 हेक्टेयर से अधिक एवं 200 हेक्टेयर औसत जलक्षेत्र तक, मछली पालन विभाग द्वारा 200 हेक्टेयर से अधिक एवं 1000 हेक्टेयर औसत जलक्षेत्र के जलाशय, बैराज को मछुआ समूह एवं मत्स्य सहकारी समिति को पट्टे पर देगा। नगरीय निकाय अंतर्गत आने वाले समस्त जलक्षेत्र नगरीय निकाय के अधीन होंगे, जिसे शासन की नीति के अनुसार 10 वर्ष के लिए लीज पर आबंटित किया जाएगा।  

क्या है फसल लगाने की उतेरा विधि, इस विधि से खेती करने पर किसानों कौन से लाभ मिलते हैं?

फसल लगाने की उतेरा विधि

आज भी देश के कई हिस्से ऐसे हैं जहां फसल उत्पादन के लिए सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, वहाँ वर्षा आधारित खेती ही की जाती है। जिससे किसान एक वर्ष में एक फसल ही ले पाते हैं। ऐसे में किसानों के लिए अतिरिक्त आय में वृद्धि करने के लिए उतेरा खेती एक बेहतर विकल्प है। उतेरा खेती का मुख्य उद्देश्य खेतों में मौजूद नमी का उपयोग अगली फसल के अंकुरण तथा वृद्धि के लिए करना है।

उतेरा विधि से खेती करने के लिए किसानों को नई फसल लगाने के लिए फसल की बुआई खेत में पहले से लगी हुई फसल (जैसे: धान) की कटाई से पहले ही करना होता है। जिससे किसानों को फसल की बुआई से पहले की जाने वाली क्रियाएँ नहीं करनी होती जिससे समय एवं पैसों की बचत होती है। फसल की लागत कम होने से किसानों को लाभ भी अधिक होता है, तो आइए जानते हैं फसल लगाने की उतेरा विधि के बारे में:-

फसल लगाने की उतेरा विधि क्या है?

इस विधि का मुख्य उद्देश्य खेत में मौजूद नमी का उपयोग अगली फसल के अंकुरण तथा वृद्धि के लिए किया जाता है। उतेरा विधि से फसल लगाने की इस पद्धति में दूसरे फसल की बुवाई पहली फसल के कटने से पूर्व ही कर दी जाती है। इसके माध्यम से किसानों को धान के साथ-साथ दलहन, तिलहन और अतिरिक्त उपज मिल जाती है। दलहन फसलों से खेतों को नाईट्रोजन भी प्राप्त होता है। इस विधि से खेती करने से मिट्टी को नुकसान नही पहुंचता और जैव विविधिता व पर्यावरण का संरक्षण भी होता है तथा इस विधि से खेती करने से फसलों से डंठल व पुआल जलाने की जरूरत नही पड़ती।

उतेरा विधि से खेती सामान्यतः धान की फसल में ही की जाती है, जब धान की फसल कटाई के 15-20 दिन पहले जब पकने की अवस्था में हो अर्थात् मध्य अक्टूबर से नवंबर के बीच अगली फसल के बीज लगा दिए जाते हैं।  बुआई के समय मिट्टी में इतनी नमी होना चाहिए कि बीज गिली मिट्टी में चिपक जाए। 

किसान इन फसलों की खेती कर सकते हैं उतेरा विधि से 

किसान रबी सीजन की मुख्य फसलें जैसे अलसी, सरसों, उड़द, चना, तिवड़ा, गेंहू, मसूर, मटर आदि फसलों की खेती इस विधि से कर सकते हैं।

इस तरह की मिट्टी के लिए उपयुक्त है उतेरा विधि

उतेरा खेती के लिए मटियार दोमट जैसी भारी मृदा वाली भूमि उपयुक्त रहती है। अत: मध्यम तथा निचली भूमि का चुनाव करना चाहिए। भारी मृदा में जलधारण क्षमता अधिक होती है साथ ही काफी लम्बे समय तक इस मृदा में नमी बनी रहती है। टिकरा या उच्च भूमि उतेरा खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती है क्योंकि यह जल्दी सूख जाती है।

उतेरा विधि से खेती करने के लाभ

  • इस पद्धति से भूमि में मौजूद नमी का पूर्ण उपयोग हो जाता है एवं खेत ख़ाली नहीं रहता जिससे भूमि का सदुपयोग हो जाता है।
  • यह विधि अन्य फसल लगाने की विधियों से सस्ती एवं सरल है जिससे किसानों को लाभ भी अधिक मिलता है।
  • उतेरा खेती के अंतर्गत दलहनी फसलों के नत्रजन स्थिरीकरण के कारण खेत में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे किसानों को अन्य फसल की खेती में आपेक्षाकृत कम नाइट्रोजन खाद डालने के आवश्यकता होती है।
  • किसान एक वर्ष में एक से अधिक फसल ले सकते हैं जिससे किसानों को अतिरिक्त आमदनी प्राप्त होती है।

उच्च तकनीक से पान की खेती करने के लिए सरकार दे रही है अनुदान, किसान अभी करें आवेदन

पान की खेती के लिए अनुदान हेतु आवेदन

पान की खेती की लागत अधिक होती है, इसलिए सभी किसान पान की खेती नहीं कर सकते हैं। ऐसे में देश में पान के पत्तों का उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाने के लिए सरकार किसानों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराती है ताकि किसान पान की खेती के लिए आवश्यक निवेश कर सकें। इसके लिए पान की खेती के लिए अनुकूल विभिन्न ज़िलों का चयन किया गया है। जहां किसानों को राष्ट्रीय कृषि विकास योजना RKVY के तहत अनुदान दिया जाता है। 

इस कड़ी में मध्य प्रदेश उद्यानिकी विभाग ने राज्य के चयनित ज़िलों के किसानों को योजना का लाभ देने के लिए लक्ष्य जारी किए हैं। इच्छुक किसान जारी लक्ष्य के विरुद्ध “उच्च तकनीक से पान खेती” के लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। जिसके बाद चयनित किसानों को पान की खेती करने के लिए सरकार की ओर से अनुदान उपलब्ध कराया जाएगा।

इन जिलों के किसान कर सकते हैं पान की खेती के लिए आवेदन

मध्य प्रदेश उद्यानिकी विभाग ने अभी राज्य में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत उच्च तकनीक से पान की खेती परियोजना वर्ष 2022–23 हेतु 5 ज़िलों के लिए लक्ष्य जारी किए हैं, जो इस प्रकार है:- छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना, निवाड़ी तथा सागर। जारी लक्ष्य के विरुद्ध सामान्य, अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के किसान आवेदन कर योजना का लाभ उठा सकते हैं। 

पान की खेती के लिए उधानिकी विभाग ने सभी वर्गों के किसानों के लिए कुल 512 इकाई का लक्ष्य जारी किया है।जिसके लिए 132.608 लाख रूपये अनुदान दिए जाने का प्रावधान किया गया है। जिसमें सामान्य वर्ग के लिए 328, अनुसूचित जाति के लिए 82 तथा अनुसूचित जनजाति के लिए 102 इकाई का लक्ष्य जारी किया गया है।

पान की खेती के लिए दिया जाने वाला अनुदान Subsidy

उच्च तकनीक से पान की खेती के लिए मध्य प्रदेश उधानिकी विभाग किसानों को अनुदान उपलब्ध करा रही है। कृषक को 500 वर्ग मीटर में पान बरेजा की स्थापना हेतु बांस का उपयोग करने पर इकाई लागत राशि पर 35 प्रतिशत का अनुदान दिया जाएगा। जिसके लिए विभाग ने इकाई लागत 74,000 रूपये निश्चित की है, जिस पर 35 प्रतिशत अधिकतम राशि 25,900 रूपये दी जाएगी। पूर्व के लाभान्वित कृषक/सिकमी कृषक को योजना अंतर्गत पुन: लाभ देय नहीं होगा।

पान की खेती के लिए अनुदान योजना एवं लक्ष्य सम्बंधित विस्तृत जानकारी के लिए क्लिक करें

अनुदान पर पान की खेती हेतु आवेदन करने के लिए क्लिक करें

पान उत्पादन हेतु आवेदन उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग मध्यप्रदेश के द्वारा आमंत्रित किये गए हैं अत; किसान भाई यदि योजना के विषय में अधिक जानकारी चाहते हैं तो उद्यानिकी एवं विभाग मध्यप्रदेश पर देख सकते हैं। इसके अलावा किसान अपने ब्लॉक या ज़िले के उद्यानिकी विभाग में भी सम्पर्क कर सकते हैं। मध्यप्रदेश में किसानों को आवेदन करने के लिए ऑनलाइन पंजीयन उद्यानिकी विभाग मध्यप्रदेश फार्मर्स सब्सिडी ट्रैकिंग सिस्टम https://mpfsts.mp.gov.in/mphd/#/ पर जाकर कृषक पंजीयन कर सकते हैं।

सब्सिडी पर पान की खेती हेतु आवेदन करने के लिए क्लिक करें

फार्म पौण्ड बनाने के लिए सरकार दे रही है 70 प्रतिशत तक की सब्सिडी, किसान इस तरह लें योजना का लाभ

फार्म पौण्ड निर्माण हेतु अनुदान Subsidy योजना

फसलों की अच्छी पैदावार के लिए सिंचाई का सुनिश्चित साधन का होना आवश्यक है। ऐसे में सरकार द्वारा अधिक से अधिक किसानों को सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए कई योजनाएँ चला रही है ताकि किसान के पास वर्ष भर सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो सके। इस कड़ी में राजस्थान सरकार राज्य में किसानों को फार्म पौण्ड निर्माण (खेत तलाई) के लिए अनुदान उपलब्ध करा रही है। इस योजना से ना सिर्फ फसलों को पानी उपलब्ध हो रहा है बल्कि इससे वर्षा जल के संचय से भू-जल स्तर को सुधारने में भी बढ़ावा मिल रहा है।

राजस्थान सरकार खेतों में फार्म पौण्ड निर्माण कर वर्षा जल का संचय करने के लिए किसानों को 70 प्रतिशत तक की सब्सिडी उपलब्ध करा रही है। जिसका लाभ राज्य के 18 हजार से अधिक किसानों ने लिया है। सरकार की यह योजना बंजर भूमि को खेतिहर भूमि बनाने में उपयोगी कदम साबित हो रही है।

फार्म पौण्ड निर्माण के लिए किसान को कितना अनुदान Subsidy दिया जाएगा?

राजस्थान कृषि विभाग के आयुक्त श्री कानाराम ने बताया कि कच्चा फार्म पौण्ड निर्माण के लिए लघु एवं सीमांत कृषक को लागत का 70 प्रतिशत या अधिकतम राशि 73 हजार 500 रुपये, जो भी कम हो दिया जा रहा है। वहीं अन्य कृषक के लिए लागत का 60 प्रतिशत अधिकतम 63 हजार रुपये, जो भी कम हो का अनुदान दिया जा रहा है।

वहीं प्लास्टिक लाइनिंग फार्म पौण्ड के लिए लघु एवं सीमांत कृषक को लागत का 70 प्रतिशत या अधिकतम राशि एक लाख 5 हजार रुपये जो भी कम हो दिया जा रहा है। वहीं अन्य कृषक के लिए लागत का 60 प्रतिशत अधिकतम 90 हजार रुपये, जो भी कम हो का अनुदान दिया जा रहा है।

फार्म पौण्ड निर्माण योजनांतर्गत न्यूनतम 40 प्रतिशत लघु एवं सीमांत कृषकों को लाभान्वित किया जा रहा है। लघु एवं सीमांत कृषकों को 10 प्रतिशत अतिरिक्त अनुदान राशि योजना के अंतर्गत मुख्यमंत्री कृषक साथी योजना से दी जा रही हैं।

18 हजार से अधिक किसानों ने लिया योजना का लाभ

कृषि आयुक्त ने बताया कि मुख्यमंत्री कृषक साथी योजना के तहत फार्म पौण्ड निर्माण में पिछले 4 वर्षों में 18 हजार 394 किसानों को 101 करोड़ 96 लाख 49 हजार रुपये का भुगतान किया गया है। कृषि बजट घोषणा 2022-23 में राजस्थान सूक्ष्म सिंचाई मिशन के तहत आगामी तीन वर्षों में 45 हजार किसानों को 375 करोड़ रुपये का अनुदान दिया जाना प्रस्तावित है।

यह किसान कर सकते हैं अनुदान पर फार्म पौण्ड निर्माण हेतु आवेदन

किसानों को फार्म पौण्ड निर्माण में अनुदान देने के लिए पात्रता निर्धारित की गई है, जिसके तहत इस योजना में वही किसान आवेदन कर सकते हैं, जिनके पास न्यूनतम 0.3 हेक्टेयर सिंचित कृषि योग्य भूमि है। वहीं किसानों को फार्म पौण्ड बनाने के पहले उसमें सिंचाई के लिए फव्वारा और ड्रिप सिंचाई सयंत्र स्थापित करना होगा। इसके बाद ही राज्य सरकार की तरफ से किसानों को फार्म पौण्ड निर्माण के लिए निर्धारित अनुदान देय होगा।

अनुदान पर फार्म पौण्ड बनाने हेतु आवेदन के लिए आवश्यक दस्तावेज

योजना का लाभ लेने के लिए आवेदन हेतु किसानों के पास कुछ आवश्यक दस्तावेज होना आवश्यक है। आवेदन करते समय किसानों को स्वयं की फोटो के साथ ही नवीनतम जमाबंदी की नकल जो कि 6 माह से अधिक पुरानी न हो तथा सादा पेपर पर अपनी कृषि कार्य में सिंचित एवं असिंचित भूमि का शपथ पत्र देना होगा। राजस्व विभाग द्वारा प्रदत्त स्वामित्व की पासबुक की प्रमाणित छाया प्रति और अनुसूचित जाति एवं जनजाति प्रमाण पत्र, राशन कार्ड की सत्यापित छाया प्रति के साथ किसान को अपना जन आधार कार्ड भी लगाना होगा।

अनुदान पर फार्म पौण्ड निर्माण हेतु आवेदन कहाँ करें?

राजस्थान राज्य के किसान योजना का लाभ लेने के लिए कृषि विभाग की आधिकारिक बेवसाइट राज किसान साथी पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। आवेदन पत्र में किसानों को आवश्यक रूप से अपना आधार नंबर दर्ज करना होगा। योजना अथवा आवेदन के संबंध में अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए किसान निकटतम कृषि कार्यालय में संपर्क कर सकते है या किसान कॉल सेंटर के निशुल्क दूरभाष नंबर 1800-180-1551 पर बात कर सकते हैं।

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सब्सिडी पर मल्टी क्रॉप थ्रेशर, पैडी थ्रेशर एवं चिसल प्लाऊ लेने के लिए आवेदन करें

मल्टी क्रॉप थ्रेशर, पैडी थ्रेशर एवं चिसल प्लाऊ पर अनुदान हेतु आवेदन

सरकार द्वारा किसानों फसलों की खेती के लिए भूमि की तैयारी से लेकर फसलों की कटाई, गहाई एवं उनके प्रसंस्करण तक उपयोग में आने वाले कृषि यंत्रों की खरीद पर सब्सिडी उपलब्ध कराई जाती है। इस कड़ी में मध्यप्रदेश कृषि अभियांत्रिकी विभाग द्वारा राज्य में किसानों को मल्टी क्रॉप थ्रेशर/एक्सियल फ्लो पैडी थ्रेशर एवं चिसल प्लाऊ पर अनुदान हेतु लक्ष्य जारी किए है।

मध्य प्रदेश राज्य के इच्छुक किसान जारी लक्ष्य के विरुद्ध ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। योजना का लाभ लेने के लिए किसानों को 22 नवंबर 2022 दोपहर 12 बजे से 29 नवंबर 2022 के दौरान ऑनलाइन आवेदन करना होगा। प्राप्त आवेदनों में से लक्ष्यों के विरूद्ध लॉटरी दिनांक 30 नवंबर 2022 को सम्पादित की जायेगी। लॉटरी उपरांत चयनित कृषकों की सूची एवं प्रतीक्षा सूची पोर्टल पर दोपहर 03 बजे प्रदर्शित की जाएगी।

थ्रेशर एवं चिसल प्लाऊ पर कितना अनुदान Subsidy मिलेगा

मध्यप्रदेश में किसानों को अलग-अलग योजनाओं के तहत कृषि यंत्रों पर किसान वर्ग एवं जोत श्रेणी के अनुसार अलग-अलग सब्सिडी दिए जाने का प्रावधान है, जो 40 से 50 प्रतिशत तक है। इसमें  किसान जो कृषि यंत्र लेना चाहते हैं वह किसान ई- कृषि यंत्र अनुदान पोर्टल पर उपलब्ध सब्सिडी कैलकुलेटर पर कृषि यंत्र की लागत के अनुसार उनको मिलने वाली सब्सिडी की जानकारी देख सकते हैं।

किसानों को देना होगा डिमांड ड्राफ्ट (डीडी)

राज्य में किसानों को योजना का लाभ लेने के लिए धरोहर राशि का डिमांड ड्राफ्ट (डीडी) सम्बंधित जिले के सहायक कृषि यंत्री के नाम से बनवाना होगा। इसमें अभी कृषि यंत्र चिसल प्लाऊ के आवेदन हेतु डिमांड ड्राफ्ट (डीडी) की आवश्यकता नहीं है। वहीं मल्टीक्रॉप थ्रेसर/एक्सियल फ्लो पैडी थ्रेसर के लिए 5,000 रूपये का डिमांड ड्राफ्ट जमा करना होगा। यह डिमांड ड्राफ्ट जिले के सहायक कृषि यंत्री के नाम से होना चाहिए।

जिले के अनुसार डिमांड ड्राफ्ट के लिए किसान क्लिक करें

अनुदान पर मल्टी क्रॉप थ्रेशर एवं प्लाउ लेने के लिए आवेदन कहाँ करें

कृषि यंत्रों के लिए किसानों को ऑनलाइन आवेदन करना होगा, आवेदन के बाद ही जारी लक्ष्य के अनुसार किसानों का चयन किया जायेगा। मध्यप्रदेश में सभी प्रकार के कृषि यंत्रों के लिए आवेदन किसान भाई ऑनलाइन e-कृषि यंत्र अनुदान पोर्टल पर कर सकते हैं परन्तु किसान भाइयों को यह बात ध्यान में रखना होगा की आवेदन के समय उनके पंजीकृत मोबाइल नम्बर पर OTP वन टाइम पासवर्ड प्राप्त होगा इसलिए किसान अपना मोबाइल अपने पास रखें। किसान अधिक जानकारी के लिए अपने ज़िले के कृषि विभाग या कृषि यंत्री कार्यालय में सम्पर्क कर सकते हैं या कृषि अभियांत्रिकी संचानलाय के पोर्टल https://dbt.mpdage.org/ पर जाकर देख सकते हैं।

सब्सिडी पर मल्टी क्रॉप थ्रेशर एवं चिसल प्लाउ लेने हेतु आवेदन करने के लिए क्लिक करें