किसान कपास की खेती में क्या करें एवं क्या न करें

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kisaan kapaas kee khetee mein kya karen evan kya na karen

कपास की खेती करने वाले किसान इन बातों का ध्यान रखे

कपास की खेती में भारत एक प्रमुख देश है इसकी खेती भारत में उत्तर से दक्षिण तक होती है | यह किसानों के लिए आय का प्रमुख फसल है | कीट तथा रोग से बचाव करना बहुत जरुरी रहता है | कभी – कभी किसान खेती में उस कीटनाशक या पद्धति का उपयोग करते हैं जिसकी जरुरत नहीं होती है | इससे कपास को नुकसान तो होता ही है इसके साथ किसानों का लागत भी बढ़ जाता है |

किसान समाधान कपास की खेती में किये जाने वाले सभी कामों तथा नहीं किये जाने वाले कार्यों की पूरी जानकारी लेकर आया है | जिसे किसान कपास की खेती में जरुर अपनाये तथा उत्पादन को बढायें |

कपास की खेती में किसान यह करें

  • रस चूसक कीटों के लिए किस्मों का चुनाव समेकित नाशीकीट प्रबंधन में महत्वपूर्ण – रस चूसक कीटों के लिए प्रतिरोधी किस्मों/संकरों का चुनाव करने से फसल के प्रारम्भिक 2 – 3 महीनों के दौरान जब कपास के खेतों में नैसर्गिक नाशी कीट नियंत्रण पम्प रहा होता है तब रासायनिक कीटनाशकों के प्रयोग से बचना संभव हो पाया है | प्रारंभिक फसल काल में रासायनिक कीटनाशकों का छिड़काव करने से नाशीकीटों के नैसर्गिक रूप में पाए जाने वाले पर्जीव्याम और परभक्षी मर जाते हैं | इससे परितंत्र इतना विच्छिन्न हो जाता है की उसकी पुन:स्थापना नहीं हो पाती है | इसके फलस्वरूप फसल पर पुरे फसलकाल में कीट नियंत्रण के लिए लगातार कीटनाशकों के छिड़काव पर निर्भर रहना पड़ता है |
  • रसचूसक कीटों के परभक्षियों की संख्या को बढ़ावा देने के लिए ग्वार/ लोबिया / ज्वार / सोयाबीन अथवा उड़द की अन्त: फसल लगाएं |
  • इमिडेक्लोप्रिडा (8ग्रा.), विटावेक्स या भायरम (3 ग्रा.) प्रति किया | बीज की दर से बीजोपचार करना किस्मों को रसचूसक कीटों और रोगों से बचाता है |
  • विशेषरूप से रस चूषक कीटों के लिए संवेदनशील किस्मों में नत्रयुक्त उर्वरकों का प्रयोग न्यूनतम करें |
  • खेत को स्वच्छ अर्थात खरपतवार मुक्त रखें |
  • मिलीबग से ग्रसित पौधों को सावधानीपूर्वक निकाल कर नष्ट कर दें |
  • नीम से निर्मित कीटनाशकों तथा जैवनियंत्रण विकल्पों का प्रयोग कम से कम छेड़छाड़ के साथ नशीकीट प्रबंधन के लिए करें |
  • गूलर की गुलाबी सुंडी के प्रबोधन के लिए काम गंध ट्रैप प्रभावी है |
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कपास की खेती में किसान यह न करें 

  • उत्तरी भारत में कपास पर्णकुंचन विषाणु रोग की वृद्धि रोकने के लिए देर से बुआई अर्थात 15 मई के बाद न करें |
  • फसल के पहले दो महीनों में यथासंभव रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग न करें | इससे रासायनिक हस्तक्षेप की अनुपस्थिति में नैसर्गिक जैव नियंत्रण का संरक्षण होगा और कपास के खेतों में यह स्थापित हो जाएगा | नैसर्गिक नियंत्रण में सोंपंक्षी व्यस्क तथा भृंगक (ग्रव) तथा सरफिड मक्खी, जीकोरिस भृंगक, एनासियस जाति, एफिलीनस भृंगक (ग्रव) तथा ततैया मिरिड मत्कुण तथा मकड़ियाँ यह सभी एफिड , जैसिड, फुलकीट (थ्रिप्स), मिरिड, सफ़ेद मक्खी तथा मिलिबग का प्रभावी नियंत्रण करते हैं |
  • लेपिड़ोपटेरा गन के गौण कीटों के विरुद्ध छिड़काव न करें, जैसे – कपास पत्ती लपेटक, सायलेप्टा डेरोगेता तथा कपास की अर्धकुंडलक इल्ली एनोमिस फ्लेवा / इनकी इल्लियाँ कपास को नाम मात्र हानि पहुँचाती है लेकिन एच. आर्मीजेर तथा दूसरी गूलर की सुंडियों पर आक्रमण करने वाले ट्रायको ग्रामा जाति, एपेंटेलिस जाति तथा सायसिरोपा फार्मोसा जैसे पार्जिव्याभों के लिए पोषक का कार्य करती है |
  • बीटी कपास पर बीती सुत्रणों का छिड़काव न करें | इससे आगे होने वाले वर्ण दवाब से बचा जा सकेगा |
  • निओनिकोटीनाइड कीटनाशकों के फसल पर छिड़काव से बचें, जैसे – एसीतामीप्रीड, इमीदेक्लोप्रीड, क्लोथाएनिडिन तथा थायोमेंथोक्जाम जो कीट प्रतिरोधिता को और गंभीर बना रहे हैं क्योंकि कपास का बीजोपचार इमीदेकलोप्रिड से होता है |
  • डब्लूएचओ वर्ग – 1 (अत्यधिक जोखिम युक्त वर्ग) के कीटनाशकों का प्रयोग न करें, जैसे फास्फामिडान, मिथाइल पैराथिआन, फोरेट, मोनोक्रोटोफास, डायक्लोरवास, कार्बोफ्यूरान, मिथोमिल, ट्रायेजोफास तथा मेटासीस्टाक्स |
  • बुवाई के पश्चात् प्रथम 4 – 5 महीनों के दौरान पायरेथ्राइड के प्रयोग से बचें तथा सम्पूर्ण फसल स्तर में सफेद मक्खी तथा दुसरे नाशीकीटों की संख्या – प्रस्फोट से बचने के लिए कीटनाशक मिश्रण का प्रयोग न करें |
  • फसल काल के अंतिम दिनों में गूलर की गुलाबी सुंडी के नियंत्रण के लिए एक अथवा अधिकतम दो छिड़काव पायरेथ्राइड के कर सकते हैं |
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