क्या है फसल लगाने की उतेरा विधि, इस विधि से खेती करने पर किसानों कौन से लाभ मिलते हैं?

फसल लगाने की उतेरा विधि

आज भी देश के कई हिस्से ऐसे हैं जहां फसल उत्पादन के लिए सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, वहाँ वर्षा आधारित खेती ही की जाती है। जिससे किसान एक वर्ष में एक फसल ही ले पाते हैं। ऐसे में किसानों के लिए अतिरिक्त आय में वृद्धि करने के लिए उतेरा खेती एक बेहतर विकल्प है। उतेरा खेती का मुख्य उद्देश्य खेतों में मौजूद नमी का उपयोग अगली फसल के अंकुरण तथा वृद्धि के लिए करना है।

उतेरा विधि से खेती करने के लिए किसानों को नई फसल लगाने के लिए फसल की बुआई खेत में पहले से लगी हुई फसल (जैसे: धान) की कटाई से पहले ही करना होता है। जिससे किसानों को फसल की बुआई से पहले की जाने वाली क्रियाएँ नहीं करनी होती जिससे समय एवं पैसों की बचत होती है। फसल की लागत कम होने से किसानों को लाभ भी अधिक होता है, तो आइए जानते हैं फसल लगाने की उतेरा विधि के बारे में:-

फसल लगाने की उतेरा विधि क्या है?

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इस विधि का मुख्य उद्देश्य खेत में मौजूद नमी का उपयोग अगली फसल के अंकुरण तथा वृद्धि के लिए किया जाता है। उतेरा विधि से फसल लगाने की इस पद्धति में दूसरे फसल की बुवाई पहली फसल के कटने से पूर्व ही कर दी जाती है। इसके माध्यम से किसानों को धान के साथ-साथ दलहन, तिलहन और अतिरिक्त उपज मिल जाती है। दलहन फसलों से खेतों को नाईट्रोजन भी प्राप्त होता है। इस विधि से खेती करने से मिट्टी को नुकसान नही पहुंचता और जैव विविधिता व पर्यावरण का संरक्षण भी होता है तथा इस विधि से खेती करने से फसलों से डंठल व पुआल जलाने की जरूरत नही पड़ती।

उतेरा विधि से खेती सामान्यतः धान की फसल में ही की जाती है, जब धान की फसल कटाई के 15-20 दिन पहले जब पकने की अवस्था में हो अर्थात् मध्य अक्टूबर से नवंबर के बीच अगली फसल के बीज लगा दिए जाते हैं।  बुआई के समय मिट्टी में इतनी नमी होना चाहिए कि बीज गिली मिट्टी में चिपक जाए। 

किसान इन फसलों की खेती कर सकते हैं उतेरा विधि से 

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किसान रबी सीजन की मुख्य फसलें जैसे अलसी, सरसों, उड़द, चना, तिवड़ा, गेंहू, मसूर, मटर आदि फसलों की खेती इस विधि से कर सकते हैं।

इस तरह की मिट्टी के लिए उपयुक्त है उतेरा विधि

उतेरा खेती के लिए मटियार दोमट जैसी भारी मृदा वाली भूमि उपयुक्त रहती है। अत: मध्यम तथा निचली भूमि का चुनाव करना चाहिए। भारी मृदा में जलधारण क्षमता अधिक होती है साथ ही काफी लम्बे समय तक इस मृदा में नमी बनी रहती है। टिकरा या उच्च भूमि उतेरा खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती है क्योंकि यह जल्दी सूख जाती है।

उतेरा विधि से खेती करने के लाभ

  • इस पद्धति से भूमि में मौजूद नमी का पूर्ण उपयोग हो जाता है एवं खेत ख़ाली नहीं रहता जिससे भूमि का सदुपयोग हो जाता है।
  • यह विधि अन्य फसल लगाने की विधियों से सस्ती एवं सरल है जिससे किसानों को लाभ भी अधिक मिलता है।
  • उतेरा खेती के अंतर्गत दलहनी फसलों के नत्रजन स्थिरीकरण के कारण खेत में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे किसानों को अन्य फसल की खेती में आपेक्षाकृत कम नाइट्रोजन खाद डालने के आवश्यकता होती है।
  • किसान एक वर्ष में एक से अधिक फसल ले सकते हैं जिससे किसानों को अतिरिक्त आमदनी प्राप्त होती है।
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