दीमक से फसल तथा पौधों को इस तरह बचायें

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दीमक एवं उसका नियंत्रण

दीमक बीजों , फलदार पौधें और वृक्ष पर आक्रमण करती है खेतों में पौधे जब छते होते है तब जमीन के नीचे दीमक पौधों की जड़ों को काट देती है | जिससे कि पौधे कमजोर हो जाते व बाद में सुख भी जाते है , पौधों की बाहरी पत्तियां सर्वप्रथम सूखती है फिर धीरे – धीरे अन्दर की व अन्त: में पूरा पौधा सुख जाता है |

कई बार दीमक पौधों की पूरी जड़ों को नहीं कटनी कुछ ही जड़ों को कटी है जिससे पौधे सूखते नहीं लेकिन जल व तत्व भूमि से कम मात्रा में ले पाते हैं | जिससे उपज पर विपरीत असर पड़ता है दीमक प्राय रात के समय सक्रिय रहती है और दिन में प्रकाश के कारण अपने घरों में चली जाती है | जिस स्थान की मिटटी बलुई हल्की ओर सुखी होती है तथा सिंचाई के साधनों की समुचित व्यवस्था नहीं होती है | वहां दीमक का प्रकोप अधिक होता देखा गया है |

दीमक परिवार :-

दीमक एक सामाजिक कीट है यह हमेशा लाखों की संख्या में झुंडों में एक परिवार के रूप में रहती है दीमक के एक परिवार में कई रूप पाये जाते है जो कि एक विशेष प्रकार का ही कार्य करते हैं | एक परिवार में निम्न प्रकार के सदस्य पाये जाते हैं |

जैसे – रजा , रानी तथा श्रमिक 

Termite Family

  1. रानी – एक परिवार में एक ही रानी होती है जो कि आकार में सबसे बड़ी होती है रानी का सर व वक्ष बहुत छोटे और उदर भुत और मोटा होता है इसके श्वेत उदर पर गोल धारिया होती है इसका कार्य सिर्फ अंडे देना होता है यह भूमि में बने दीमक गृह में 2 से 3 फुट गहराई पर शाही कमरे में रहती है |
  2. राजा – यह आकार में रानी से छोटा होता है और हमेशा रानी के साथ समय – समय पर मैथुन कर प्रजनन में सहयोग देता है |
  3. श्रमिक – एक परिवार में सबसे ज्यादा संख्या इन्ही की होती है जो कुल दीमक का 80 से 90 प्रतिशत होती है | कमेरे न्र व मादा के जननांग अविकसित होते हैं इनका कार्य पुरे परिवार के लिए भोजन इकट्ठा करना व घर बनाना होता है वास्तव में ए ही फसलों को हानि पहुंचाते हैं इनका आकार छोटा होता है |
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जीवन चक्र :-

जब पहली भरी वर्षा जुलाई के महीने में होती है तब पंखधारी नर तथा मादा जो कि भविष्य में राजा रानी बनेगें, घरों से निकलकर उडान के समय आपस में मैथुन करते हैं यह अपने पंख गिरा देते है और इनमे से जो चिड़ियों, मेढकों, छिपकलियाँ आदि से जीवित बच जाते हैं | वे जोड़ी में साथ – साथ रहकर समय – समय पर मैथुन करते हैं और मादा अंडे देती है मादा रानी व न्र रजा कहलाता है अण्डों की अधिकता के कारण मादा का उदर फूल जाता है और लगभग 2 से 3 इंच लम्बा और आधा इंच मोटा हो जाता है |

रानी तीन से पन्द्रह वर्ष तक जीवित रहती है तथा अंडे देती रहती है अंडा पिला चमकदार व बुव्क के आकार का होता है अंडाकार 20 से 90 दिन का होता है | अंडा फूटने पर निम्फ (शिशु) निकलता है जो लगभग क मिली होता है | निकलते ही भोजन की तलाश में निकल पड़ता है | शिशु को प्रौढ़ बनने में लगभग 6 से 13 महीने लगते हैं | कुछ शिशु पंख वाले नर मादा बन जाते हैं और कुछ सैनिक शेष 80 से 90 प्रतिशत शिशु श्रमिक बनते हैं इस प्रकार एक भुत बड़ा परिवार बन जाता है |

नियंत्रण के उपाय :-

  1. खेतों के आसपास बने हुये गृह (बमीठों) को तोड़कर रानी दीमक को उसके पुरे परिवार शीत नष्ट करें तथा उस स्थान पर क्लोरपायरीफास 15 प्रतिशत चूर्ण का भरकाव करें |
  2. पूरी तरह से पक्की हुई गोबर की खाद या क्म्पोष्ट का प्रयोग करें क्योंकि अघपकी खाद में सेल्यूलोज की अधिकता से इसका प्रकोप ज्यादा होता है
  3. धान के बाद गेहूं की फसल लेने पर दीमक का प्रकोप अधिक होता है अत: फसल चक्र को अपनाकर भी दीमक का नियंत्रण किया जा सकता है |
  4. गन्ना एवं गेहूं में पानी की कमी से दीमक द्वारा नुकसान होता है अत: सिंचाई करके दीमक से होने वाली हानि कम की जा सकती है यदि पानी की उपलब्धता है तो दीमक गृह में पानी भर कर इसका नियंत्रण संभव है |
  5. नीम की खली 150 किवंटल / हेक्टयर की दर से प्रयोग करके दीमक का नियंत्रण किया जा सकता है क्योंकि नीम की खली में उपस्थित रसायन दीमक की वृद्धि को रोक देते हैं |
  6. फसल की कटाई के बाद फसल के अवशेषों को नहीं छोड़ना चाहिये क्योंकि दीमक उन्हें खाकर जीवित बनी रहती है | अत: उन्हें इकट्ठा करके जला देना चाहिए |
  1. धान के बाद गेंहू की फसल लेने पर दीमक का प्रकोप अधिक होता है अत: फसल चक्र को अपनाकर भी दीमक का नियंत्रण किया जा सकता है |
  2. गुनना एवं गेहूं में पानी की कमी से दीमक द्वारा नुकसान होता है अत: सिंचाई करके दीमक से होने वाली हानि कम की जा सकती है यदि पानी की उपलब्धता है तो दीमक गृह में पानी भर कर इसका नियंत्रण संभव है |
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अन्य उपाय

  • नीम की खली 150 किवंटल / हैक्टेयर की दर से प्रयोग करके दीमक का नियंत्रण किया जा सकता है क्योंकि नीम की खली में उपस्थित रसायन दीमक की वृद्दि को रोक देते हैं |
  • फसल की कटाई के बाद फसल के अवशेषों को नहीं छड़ना चाहिए क्योंकि दीमक उन्हें खाकर जीवित बनी रहती है | अत: उन्हें इकट्ठा करके जला देना चाहिए |
  • दीमक के प्राकृतिक शत्रुओं जैसे – कौआ, तितर, बटर, मेढक, छिपकली, लोमड़ी, चमकादाड, चीटियाँ एवं तिलचट्टा को बढ़ावा दें |
  • क्लोरपायरीफास 1.5 प्रतिशत चूर्ण 20 – 25 किलोग्राम / हैक्टेयर की अंतिम तैयारी के समय भूमि में मिलाएं |
  • क्लोरपायरीफास 20 ई.सी. की 400 मी.ली. मात्रा (80 ग्राम सक्रिय तत्व) 3 लीटर पानी में घोलकर प्रति किवंटल बीज के हिसाब से बीजोपचार करके बुवाई करें |
  • पानी के अभाव वाले क्षेत्रों में खड़ी फसल पर प्रकोप होने की दशा में क्लोरपायरीफास 20 ई.सी. की 4 लीटर मात्रा 3 – 4 ली. पानी में घोल लें तथा उसे 50 किलोग्राम बारीक़ मिटटी या बालू में मिलाकर खेत में भुरकाव प्रति हेक्टयर करें तथा सिंचाई करे |
  • सिंचाई जल के साथ बूंद – बूंद कर क्लोरपायरीफास 20 ई.सी. की 3 से 4 लीटर मात्रा / हे. की दर से प्रयोग करें |
  • बाइफेनथिन 10 ई.सी. की एक लीटर मात्रा प्रति हेक्टयर के प्रयोग से दीमक का प्रभाव नियंत्रण किया जा सकता है |

के द्वारा:-

Dr. G. S. Chundawat

वैज्ञानिक :पौध सरंक्षक,मंदसौर, एग्रीकल्चर कॉलेज  

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