जैविक खाद तैयार करने की विधियाँ

कम्पोस्ट बनाने की चार गद्दा विधि

चार गड्डे के चक्रिये तंत्र की संरचना

इस विधि में एक बड़ा गद्दा/टांका जिसका आकार करीब 12 इंच लम्बाई , 12 इंच चौडाई, 2.5 इंच गहराई बनाया जाता है | उसे ईट के दीवारों से चार बराबर भागों में बांट दिया जाता है | इस प्रकार चार गड्डे बनते है | प्रतेक गड्डे टांके का आकार लगभग 5.5 इंच लम्बाई, 5.5 इंच चौडाई, 2.5 इंच गहराई होता है | पुरे गड्डे के चारो तरफ अन्दर से एक ईट की दीवार की विभाजन दीवार 2 ईंटो (9 इंच) की होती है ताकि मजबूत रहे, इन विभाजक दीवारों पर समान दुरी पर हवा के वहन एवं केंचुओं के घुमने हेतु छिद्र छोड़े जावे |

यदि रोज एकत्र होने वाले कचरे की मात्रा 40 किलो से अधिक हो तब मुख्य बड़े गड्डे की लम्बाई 20 इंच तक अधिकतम बढ़ाई जा सकती है परंतु चौडाई 5 व गहराई 2.5 इंच रखना अनिवार्य है ताकि पूरे गड्डे में हवा का वहन ठीक प्रकार से हो सके | तब एक छोटा गद्दा/ टांका 10 इंच लम्बाई 5 इंच चौडाई, 2.5 इंच गहराई के आकार का होगा चार गड्डे के इस तंत्र को संरचना हेतु लगने वाली सामग्री इस प्रकार है |

आकर 12 इंच लम्बाई, 12 इंच चौडाई, 2.5 इंच गहराई |
क्रमांक सामग्री मात्रा
1 ईंट 1000
2 सीमेंट 3 बेग
3 रेत 50 सीएफटी
4 मुगार्जाली (यदि आवश्यक हो तो )
5 मिस्त्री 1, दिन
6 मजदूर 2, एक दिन

यदि बरसात के दिनों में गड्डे पानी जमा हो तो (सीपेज हो) तब गड्ढों में खाद नही बनाना चाहिए एसी अवस्था में दूसरी जगह जमीन के ऊपर 2.5 फुट ऊँचे और टैंक बनाये जाते है | इसमे करीब एक हजार ईंट का खर्च बढ़ जाता है |

यदि यह चरों गड्डे पेड़ की छावं में बनाये गए है तब अतिरिक्त शेड की जरुरत नही अन्यथा धूप एवं वर्षा के सीधे प्रभाव से बचने के लिए इसके ऊपर कच्चा शेड बनाया जावे | एक बार चार गड्डे बन जाने के बाद कई वर्षों तक प्रति वर्ष में करीब 3 – 4 टन खाद प्राप्त किया जा सकता है |

चार गड्डे/ टांके भरने की पद्धति

फोरपिट (चक्रिये) तंत्र :

  • इस तंत्र में प्रतेक गड्डे/ टांके को एक के बाद एक भरते है अर्थात पहले एक महीने तक पहला गद्दा भरे | यह भर जाने के बाद पुरे कचरे को गोबर पानी से अच्छी तरह भिगोकर काले पालीथीन से ढंक देवें ताकि उसके विघटन की प्रक्रिया शुरू हो जाये | इसके बाद कचरा दुसरे गड्डे में एकत्र करना शुरू कर देवें | दुसरे माह बाद जब दूसरा गद्दा भर जाता है तब इस पर भी उसी प्रकार काला पालीथीन ढक देते है और कचरा तीसरे गड्ढे में एकत्र करना आरंभ करे |
  •       इस समय तक पहले गड्डे का कचरा अपघटित हो जाता है | एक दो दिन बाद पहले गड्डे की गर्मी काम हो जाए, तब उसमें 500 – 1000 केंचुएँ छोड़ दिए जावे और पुरे गड्डे को घास की पतली थर से ढंक दिया जाए | उसमें नमी बनाए रखना आवश्यक है अत: चार – पांच दिन के अंतर पर इसमें थोड़ा पानी देवें |
  •                इसी प्रकार तिन माह बाद जब तीसरा गद्दा/ टांका कचरे से भर जाता है तब इसमे भी पानी से भिगोकर पालीथीन से ढंक देवें एवं चौथे गड्डे / टाँके की गर्मी काम होती है तब उसमें पहले गड्डे के केंचुएँ अर्थात वर्मी कम्पोस्ट बनना आरंभ हो जाता है | चार माह बाद जब चौता गड्डे / टाँके भी कचरे व गोबर से भर जाये, तब उसे भी उसी प्रकार पानी से भिगोकर पालीथीन से ढंक देवें –
  •    इस प्रकार चार माह में एक के बाद एक चारों गड्डे / टांके भर जाते है | इस समय तक पहले गड्डे / टांके में जिसे भरकर तिन माह हो चुके है वर्मी कम्पोस्ट तैयार हो जाता है और उसके सारे केंचुएं दुसरे एवं तीसरे गड्डे में धीरे – धीरे बीच की दीवारों के छिद्रों द्वारा प्रवेश कर जाते है |
  •       अब पहले गड्डे से खाद निकलने की प्रक्रिया आरंभ की जा सकती है और खाद निकालने के बाद उसमें पुन: कचरा एकत्र करना शुरू करें इसके एक माह बाद दुसरे गड्डे से फिर तीसरे और चौथे इस प्रकार क्रमश: हर एक माह बाद एक गड्डे से खाद निकला जा सकता है व साथ – साथ कचरा भी एकत्र किया जा सकता है |
  •       इस चक्रिये पद्धति में चौथे महीने से बारहवे महिनी तक हर महीने करीब 500 किलो खाद , इस प्रकार 8 महीने में 4000 किलो खाद रोज एकत्रित होने वाले थोड़े – थोड़े कचरे के उपयोग से बनाया जा सकता है |
    इस चक्रिय तंत्र में गड्ढे / टाँके की भराई व खाद को निकलने का नियोजन इस प्रकार किया जाता है |
अवधि गड्ढा प्रक्रिया
0 – 30 दिन पहला कचरा / गोबर एकत्र करना
30 – 60 दिन पहला

दूसरा

  • कचरे व गोबर को पानी से भिगोकर काले पालीथीन से ढकना (बयोंडग बनाना)
  • कचरा, गोबर एकत्र करना
60 – 90 दिन पहला

दूसरा

तीसरा

  • केंचुएं छोड़ना
  • बयोडंग बनाना
  • कचरा गोबर एकत्र करना
90 – 120 दिन पहला

दूरा

तीसरा

चौथा

  • केंचुएं खाद तैयार, केंचुएं का दुसरे गड्डे में जाना
  • केंचुआं खाद की प्रक्रिया आरंभ
  • बयोडंग बनाना
  • कचरा गोबर एकत्र करना
120 –150 दिन पहला

दूसरा

तीसरा

चौथा

  • खाद निकालना एवं कचरा गोबर पुन: एकत्र करने की प्रक्रिया आरंभ
  • केंचुआं खाद तैयार , केंचुओं का तीसरे गड्डे में जाना
  • केंचुआं खाद की प्रक्रिया आरंभ
  • बयोडंग बनाना आरंभ
150 –180 दिन पहला

दूसरा

तीसरा

चौथा

  • बयोडंग बनाना
  • केंचुए खाद निकालना व कचरा गोबर एकत्र करना आरंभ
  • केंचुआं खाद तैर केंचुओं का चौथे गड्ढे में जाना
  • केंचुआं खाद की प्रक्रिया आरंभ

इस प्रकार यह तंत्र सतत चलता रहता है |

चक्रिये तंत्र की विशेषताएं

  1. यह एक आसान व सतत चलने वाली प्रक्रिया है | इसमे खाद बनाने के लिए किसान को कोई अतिरिक्त श्रम अथवा समय देने की जरुरत नही है | यह उसके रोजमर्रा के काम का एक छोटा सा हिस्सा बा सकता है |
  2. केंचुओं के एक गड्ढे से दुसरे गड्ढे में स्वचलन करने से खाद से केंचुएं निकलने व दुसरे टैंक में डालने का श्रम बच जाता है , खाद को पलटने की भी आवश्यकता नही है |
  3. चार माह बाद हर माह थोड़ा – थोड़ा (करीब 500 किलो) खाद मलता रहता है | जिसको उपयोग तत्काल किया जा सकता है अथवा उसका संग्रहण अगले वर्ष की फसल के लिए भी किया जा सकता है |
  4. रोज जानवरों के कोठे से निकलने वाले गोबर एवं खेती से निकलने वाले थोड़े – थोड़े कचरे का बहुत अच्छा उपयोग इस पद्धति में हमेशा है |
  5. इस खाद में पोषक तत्वों व कार्बनिक पदार्थो के अलावा मिट्टी को उर्वरित करने वाले सूक्ष्म जीवाणु भी बहुतायत में होते है | अत: यह खाद डालने से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वराशक्ति बढ़ती है |

वर्मी कम्पोस्ट

केंचुए से खाद

केंचुआ कृषकों का मित्र एवं भूमि की आंत कहा जाता है | यह सेन्द्रिय पदार्थ, ह्यूमस व मिट्टी को एकसार करके जमीं के अंदर अन्य परतों में फैलाता है | इससे जमीन पोली होती है व हवा का आवागमन बढ़ जाता है, तथा जलधारण की क्षमता भी बढ़ जाती है |

केंचुए के पेट में जो रासायनिक क्रिया व सूक्ष्म जीवाणुओं की क्रिया होती है, उससे भूमि में पाये जाने वाले नत्रजन, स्फुर, पोटाश, कैल्शियम व अन्य सूक्षम तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है | येसा पाया गया है की मिटटी में नत्रजन 7 गुना, फास्फोरस 11 गुना और पोटाश 14 गुना बढ़ता है |

केंचुए के पेट में मिट्टी व सेन्द्रिय पदार्थ अनेक बार अंदर बाहर आते जाते है इससे जमीन में ह्यूमस की मात्रा बढ़ती है तथा यह ह्यूमस केंचुए के माध्यम से मिट्टी में सब दूर फैलता है | इस क्रिया से जमीन प्राकृतिक रूप से तैयार हो जाती है जमीन का पीएच भी सही प्रमाण में रहता है |

केंचुए अकेले जमीन को सुधरने एवं उत्पादकता वृद्धि में सहायक नही होते बल्कि इनके साथ सूक्ष्म जीवाणु, सेन्द्रित पदार्थ, ह्यूमस इनका कार्य भी महत्वपूर्ण है | अगर किसी कारण इनकी उपलब्धता कम रहती है तो केंचुए की कार्यक्षमता में कमी आ जाती है |

केंचुए सेन्द्रित पदार्थ एवं मिट्टी खाने वाले जीव है जो सेप्रोफेगास वर्ग में आते है | इस वर्ग में दो प्रकार के केंचुए होते है |

  1.  डेट्रीटीव्होरस
  2.  जीओफेगस
  1. डेट्रीटीव्होरस जमीन के ऊपरी सतह पर पाये जाते है , ये लाल चाकलेटी रंग, चपटी पूंछ के होते है इनका मुख्य उपयोग खाद बनाने में होता है | ए ह्यूमस फारमर केंचुए कहे जाते है |

ब. जीओ फेगस केंचुए जमीन के अंदर पाये जाते है, ये रंगहीन सुस्त रहते है ये ह्यूमस एवं मिट्टी का मिश्रिण बनाकर जमीन पोली करते है |

   केंचुए खाद की विशेषताएँ :-

इस खाद में बदबू नही होती है तथा मक्खी मच्छर भी नही बढ़ते है जिससे वातावरण स्वस्थ रहता है, इससे सूक्ष्म पोषक तत्वों के साथ – साथ नाइट्रोजन 2 से 3 प्रतिशत, फास्फोरस 1 से 1 %, पोटाश 1 से 2 प्रतिशत मिलता है |

  • इस खाद को तैयार करने में प्रक्रिया स्थापित हो जाने के बाद एक से डेढ़ माह  का समय लगता है |
  •  केंचुआ पूर्णत: तैयार होने पर 21 दिन में खाद तैयार कर देता है |
  • प्रत्येक माह एक टन खाद प्राप्त करने हेतु 100 वर्गफुट आकार की नर्सरी बेड पर्याप्त होती है |
  • केंचुआ खाद की केवल 2 टन मात्र प्रति हेक्टेयर आवश्यक है |

केंचुआ खाद तैयार करने की विधि :-

जिस कचरे से खाद तैयार की जनी है उसमें से कांच, पत्थर धातु के टुकड़े अलग करना आवश्यक है |

  • केंचुओं को आधा अपघटित सेन्द्रित पदार्थ खाने को दिया जाता है |

भूमि के ऊपर नर्सरी बेड तैयार करें, बेड की लकड़ी से हलके से पीटकर पक्का व समतल बना लें |

  • इस तह पर 6 – 7 से.मी. (2 – 3 इंच) मोटी बालू रेत या बजरी की तह बिछाए |

बालू रेत की इस तह पर 6 इंच मोटी दोमट मिट्टी की तह बिछाए | दोमट मिट्टी न मिलने पर काली मिट्टी में रॉक पावडर पत्थर की खदान का बारीक़ चूरा मिलाकर बिछाएं |

  • इस पर आसानी से अपघटित हो सकने वाले सेन्द्रित पदार्थ की (नारियल की बूछ गन्ने के पत्ते, ज्वार के डंठल एवं अन्य) दो इंच मोटी सतह बनाई जावे |
  • इसकी ऊपर 2 – 3 इंच पकी हुई गोबर खाद डाली जावे |

100 वर्गफुट नर्सरी बेड के लिए 4 से 5 हजार केंचुओं की आवश्यकता होती है | केंचुओं को पकी हुई गोबर खाद की सतह पर फैलावे जावे |

* केंचुओं को डालने के उपरांत इसके ऊपर गोबर, पत्ती आदि की 6 से 8 इंच की सतह बनाई जावे | अब इसे मोटी टाट – पट्टी से ढांक दिया जावे |

* झारे से टाटपट्टी पर आवश्यकतानुसार प्रतिदिन पानी छिडकते रहे, ताकि 40 से 50 प्रतिशत नमी बनी रहे | अधिक नमी / गीलापन रहने से हवा अवरुद्ध हो जावेगी और सूक्ष्म जीवाणु तथा केंचुए कार्य नहीं कर पाएंगे और केंचुए मर भी सकते है |

  • नर्सरी बेड का तापमान 25 से 30 डिग्री सेंटीग्रेड होना चाहिए |
  • नर्सरी बेड में गोबर की खाद कडक हो गई हो अ ढ़ेले बन गए हो तो इसे हाथ से तोड़ते रहना चाहिए , सप्ताह में एक बार नर्सरी बेड का कचरा ऊपर नीचे करना चाहिए |
  • 30 दिन बाद छोटे – छोटे केंचुए दिखना शुरू हो जावेंगे |
  • 31 वें दिन इस बेड पर कूड़े – कचरे की 2 इंच मोटी तह बिछाएं और उसे नम करें |

* इसके बाद हर सप्ताह दो बार कूड़े – कचरे की तह पर  तह बिछाएं बांयोमस की तह पर पानी छिड़क कर नम करते रहे |

* 3 – 4 तह बिछाने के 2 -3 दिन बाद उसे हल्के से ऊपर नीचे कर देवें और नमी बनाएं रखे |

* 42 वें दिन बाद पानी छिड़कना बंद कर दें |

इस पद्धति से डेढ़ माह में खाद तैयार हो जाता है यह चाय के पाउडर जैसा दिखता है तथा इसमें मिट्टी के समान सोंधी गंध होती है |

*खाद निकालें तथा खाद के छोटे – छोटे ढेर बना देवे | जिससे केंचुए, खाद की निचली सतह में रह जावे |

*खाद हाथ से अलग करें | गैती, कुदाली, खुरपी आदि का प्रयोग न करे |

*केंचुए पर्याप्त बढ़ गए होंगे आधे केंचुओं से पुन: वही प्रक्रिया दोहरायें और शेष आधे से नया नर्सरी बेड बनाकर खाद बनाएं |

*इस प्रकार हर 50 – 60 दिन बाद केंचुए की संख्या के अनुसार एक दो नये बेड बनाए जा सकते हैं और खाद आवश्यक मात्रा में बनाया जा सकता है |

*नर्सरी को तेज धूप एवं वर्षा से बचाने के लिए घास – फूस का शेड बनाना आवश्यक है |

केंचुआ एवं केंचुए खाद का उपयोग :-

मिट्टी की दृष्टि से

  • *केंचुए से भूमि की गुणवत्ता में सुधार आता है |
  • *भूमि की जलधारा क्षमता बढ़ती है |
  • *भूमि का उपयुक्त तापक्रम बनाये रखने में सहायक |
  • *भूमि से पानी का वाष्पीकरण कम होगा | अत: सिंचाई जल की बचत होगी |
  • *केंचुए निचे के मिट्टी ऊपर लाकर उसे उत्तम प्रकार की बनाते है |
  • *केंचुआ खाद में ह्यूमस भरपूर मात्रा में होने से नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश एवं अन्य   सूक्ष्म द्रव्य पौधों को भरपूर मात्रा में व जल्दी उपलब्ध होते है |
  • *भूमि में उपोगी जीवाणुओं की संख्या में बृद्धि होती है |

कृषकों के दृष्टि से लाभ :-

  • भूमि की उपजाऊ क्षमता में बृद्धि होती है |
  • सिंचाई के अंतराल में बृद्धि होती है |
  • रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होने के साथ काश्त लागत में कमी आती है |
  • पर्यावरण की दृष्टि से :-
  • भूमि के जल स्तर में बृद्धि होती है |
  • मिट्टी, खाद पदार्थ और जमीन में पानी के माध्यम से होने वाले प्रदुषण में न्कामी आती है |
  • कचरे का उपयोग खाद बनाने में होने से बीमारियों में कमी होती है |

अन्य उपयोग :-

  • केंचुए से प्राप्त कीमती अमीनों एसिडस एवं एनजाइम्स से दवाएं तैयार की जाती है |
  • पक्षी, पालतू जानवर, मुर्गियां तथा मछलियों के लिए केंचुए का उपयोग खाद सामग्री के रूप में किया जाता है |
  • आयुर्वेदिक औशधियाँ तैयार करने में इसका उपयोग होता है |
  • पावडर, लिपस्टिक, मलहम इस तरह के कीमती प्रसाधन तैयार करने हेतु केंचुए का उपयोग होता है |
  • केंचुए के सूखे पाउडर में 60 से 65 % प्रोटीन होता है | जिसका उपयोग खाने में किया जाता है |

केंचुआ खाद उपयोग की सावधानियां :-

  • जमीन में केंचुआ खाद का उपयोग करने के बाद रासायनिक खाद व कीटनाशक दवा का उपयोग न करें |
  • केंचुओं को नियमित अच्छी किस्म का सन्द्रिय पदार्थ देते रहना चाहिए |
  • उचित मात्रा में भोजन एवं नमी मिलने से केंचुए क्रियाशील रहते है |

केंचुआ खाद से कम्पोस्ट खाद की तुलना

केंचुआ खाद                          कम्पोस्ट खाद

पकने की अवधि
  • माह
4 माह
पोषक तत्व
2.5 – 3.0 प्रतिशत 0.5 – 1.5 प्रतिशत
1.5 – 2.0 प्रतिशत 0.5 – 0.9 प्रतिशत
1.5 – 2.0 प्रतिशत 1.2 – 1.4 प्रतिशत
सूक्ष्म एवं अन्य पदार्थ अपेक्षाकृत मात्रा अधिक मात्रा कम
प्रति एकड़ आवश्यकता 2 टन 5 टन
वातावरण पर प्रभाव खाद में बदबू नहीं होती है |

मक्खी, मच्छर आदि भी वातावरण दूषित नही होता है |

तापमान नियंत्रित रहने से जीवाणु क्रियाशील / सक्रिय रहते है |

खाद बनाते समय प्रारंभिक अवस्था में बदबू होती है और मक्खी, मच्छर आदि बढ़ जाते है जिससे वातावरण दूषित होता है |

तापमान नियंत्रित नही रहने से जीवाणुओं की क्रियाशील / सक्रियता कम हो जाता है |

अन्य शीघ्र खादें

भभूत अमृत पानी

फसलें :-

खरीफ में सोयाबीन, ज्वार, मक्का, मूंगफली, कपास, मूंग, उड़द आदि रबी में गेंहू, चना, मटर, गन्ना, आदि |

बोवनी के पूर्व खेत में बड के पेड़ के नीचे की 15 – 20 किलोग्राम नमी युक्त मिट्टी (भभूत) प्रति एकड़ छिडक कर बिखेरें | अमृत पानी निम्नानुसार तैयार कर बीज संस्कार भी करें और खेत में छ्द्कें | देशी गाय के 10 किलोग्राम ताजे गोबर में देशी गाय के ही दूध से बना नोनिया घी 250 ग्राम अच्छी तरह फेंटे | पश्चात उसमें 500 ग्राम शहद मिलाकर फेटें | इस मिश्रण में से आधा किलोग्राम मिश्रण लेकर बड के पेड़ के नीचेकी आधा किलोग्राम मिट्टी अच्छी तरह मिला लें | अब इस एक किलोग्राम मिश्रण को पतला कर बोये जाने वाले बीज पर छिडककर अच्छी तरह संस्कारित करें जिससे बीज पर मिश्रण की हलकी से परतचढ़ जाये | उसे छ्या में सुखाकर बोनी करे | बोवनी के बाद अमृत पानी का छिड़काव करना है जो इस प्रकार करे | बीज संस्कार के बाद बचा 10 किलो राबडा दो सौ लीटर पानी में घोलकर एक एकड़ खेत में छिड़के | रबी के मौसम में भभूत (बड़ के नीचे की मिट्टी) खेत तैयार करते समय भुरक कर अच्छी तरह मिला दे और अमृत पानी या तो बोवनी के पूर्व की सिंचाई के साथ या बोवनी के बाद की प्रथम सिंचाई के साथ दें |

किसी प्रकार का रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, खरपतवार नाशक उपयोग नही करें | फसल सुरक्षा के लिए जैविक विधि से रोग एवं कीट का नियंत्रण करें | खरपतवार नियंत्रण के लिए हाथ से निंदाई करे तथा निंदा (खरपतवार) उखारकर वहीँ खेत में विछा देवें | एक या तो दो बार पुराना खराब हुआ बग्दा, खेत के आसपास उगने वाली झाड़ियों की पत्तियां – सागवान, लैटना (जर्मनी), पलाश, कडुआ नीम, आयपोमिया, आंकड़ा आदि की पत्तियाँ बिछावें | यह पलवार खरपतवार नियंत्रण करेगी और नमी संधारण भी करेगी | अधिक वर्षा से फसल सुरक्षा होगी |

अमृत संजीवनी

एक एकड़ या 0.4 हेक्टेयर क्षेत्र के लिए अमृत संजीवनी इस प्रकार तैयार करें | मोबिल आइल की खली 200 लीटर वाली ढक्कनदार कोठी लेवें | जिसमें दो रींग से तिन समान भाग होते है | इस ड्रम में देशी गाय, बैल, बछड़े, बछिया का तजा 60 किलो गोबर डालें, जिसमें दो रिंग तक अर्थात 2/3 भाग भर जावेगा | गोबर तोलने की गरज नही है यह प्रमाण सही है | इस गोबर पर तिन किलो ग्राम यूरिया, तिन किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट तथा एक किलोग्राम म्यूरेट आफ पोटाश कुल 7 किलोग्राम | रासायनिक उर्वरक तथा दो किलोग्राम मूंगफली की खली डालें | अब इस टंकी में पानी भर दे और ढक्कन बंद कर के 48 घंटे यानि दो दिन रखे | पश्चात् तत्काल फसल में दे | 48 घंटे में उपयोगी सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या में अत्यधिक वृद्धि होती है |

उपयोग विधि :-

अपने खेत में एक एकड़ में कितनी फसल कतारें है यह गिने | हर कतार में यह 200 लीटर का मिश्रण समान रूप से देना है | अत: 200 लीटर की कतारों की संख्या में भाग देवें | मन की हमारा खेत 218 फीट द्ध 200 फीट का है और हमने एक फीट के अन्तर से 200 कतारें 218 फीट लंबी बोयी है | तब प्रति कतार हमें 200/200 = एक लीटर अमृत संजीवनी का मिश्रण देना है | हम देखते है कि 15 लीटर स्प्रे पंप की योजना निकाल  कर उसमें पानी भर कर 218 फीट जाकर और 218 फीट वापस आकर कुल दो कतारों में 15 लीटर पानी समानरूप से छिड़क सकते है | तब हम स्प्रे पंप से पहले दो लीटर रबडा मिश्रण डालकर शेष पानी मिलाकर टंकी भर ले | मिश्रण हाथ से मसलकर महीन कर लेना चाहिए | कोई गुठली न रह जाएं | टंकी पर जाली या छलनी रखकर 24 लीटर राबड़ी अच्छी तरह छान लेवें और उसमें पानी भरकर अच्छी तरह मिला लें | अब मिश्रण से 12 बार स्प्रे पंप भरे जा सकते है | अर्थात 12 + 12 = 24 कतारों से आसानी ऐ सामान रूप से मिश्रिण छिड़का जा सकेगा | जितनी कतारें स्प्रे पंप से आसानी से छिडक सकते है उसी अनुपात में मिश्रण पंप में डालना होगा | अत: प्रथम एक या दो बार खली पानी छिड़क कर कतारे निर्धारित कर लेवें |

पहले छिड़काव के 7 दिन बाद फसल में बदलाव दिखने लगेगा | सोयाबीन, ज्वार, मक्का, मूंगफली मूंग, गेहूं, चना फसलों के लिए 3 – 4 खुराक इस प्रकार देनी होगी | मिर्च, कपास की फसल की फसल में 5 – 6 डोज, हरी पत्तियों की सब्जियों में 2 – 3 तथा गन्ना फसल में प्रति सप्ताह एक डोज देने पर लगभग 30 – 32 खुराक देनी पड़ती है |

मटका खाद (नीमच गोशाला विधि)

15 किलोग्राम तजा गोबर, देशी गाय का 15 लीटर तत्जा गोमूत्र तथा 15 लीटर पानी मिट्टी के घड़े में घोल लें | उसमें 250 ग्राम गुड़ भी मिला दें | इस घोल को मिट्टी के बर्तन में ऊपर से कपड़ा या टाट मिट्टी से पैक कर दें | 4 – 5 दिन बाद इस घोल में 200 लीटर पानी मिलाकर एक एकड़ खेत में समानरूप से छिड़क दें | यह छिड़काव बोनी के 15 दिन बाद करें | पुन – सात दिन बाद दोहराएँ , सामान्य फसल में 3 – 4 बार और लंबी अवधी की फसल में जैसे गन्ना, केला, हल्दी में 8 बार छिडकें |

बायोगैस स्लरी

बायोगैस संयंत्र में गोबर की पाचन क्रिया के बाद 25% ठोस पदार्थ का रूपांतर गैस के रूप में होता है और 75% ठोस पदार्थ का रूपांतर खाद के रूप में होता है | 2 घन मीटर के गैस संयंत्र में जिसमें करीब 50 किलो गोबर रोज या 18.25 टन गोबर एक वर्ष में डाला जाता है उस गोबर से 80% नमीयुक्त करीब 10 टन बायोगैस स्लरी का खाद प्राप्त होता है |यह खेती के लिए अति उत्तम खाद होता है इसमें नाइट्रोजन 1.5 से 2% फास्फोरस 1.0% एवं पोटाश 1.0% तक होता है | बायोगैस संयंत्र  से जब स्लरी के रूप में खाद बाहर आता है तब जितना नाइट्रोजन गोबर में होता है उतना ही नाइट्रोजन ही स्लरी में होता है , परंतु संयंत्र में पाचन क्रिया के दौरान कार्बन का रूपांतर गैस में होने से कार्बन का प्रमाण कम होने से कार्बन नाइट्रोजन अनुपात कम हो जाता है व इससे नाइट्रोजन का प्रमाण बढ़ा हुआ प्रतीत होता है |

बायोगैस संयंत्र से निकली पतली स्लरी में 20% नेट्रोजन अमो. निकल नाइट्रोजन के रूप में होता है अत: यदि इसका तुरंत उपयोग खेत में नालियां बनाकर अथवा सिंचाई के पानी में मिलाकर खेत में छोड़कर दिया जाए तो इसका लाभ रासायनिक खाद की तरफ से फसल पर तुरंत होता है और उत्पादन में 10 से 20% तक बढ़त हो सकती है | स्लरी खाद को सुखाने के बाद उसमें नाइट्रोजन का कुछ भाग हवा में उड़ जाता है | यह खाद सिंचाई रहित खेती में एक हेक्टेयर में करीब 5 टन व सिंचाई वाली खेती में 10 टन प्रति हेक्टेयर के प्रमाण में डाला जाता है | बायोगैस स्लरी के खाद में एनपीके मुख्य तत्वों के अतरिक्त सूक्षम पोषक तत्व एवं हयूमस भी होता है जिससे मिट्टी का पोत सुधरता है, जलधारण क्षमता बढ़ती है और सूक्ष्म जीवाणु बढ़ते है | इस खाद के उपयोग से अन्य जैविक खाद की तरह 3 वर्षों तक पोषक तत्व फसलों को धीरे – धीरे उपलब्ध होते रहते है |

बायोगैस स्लरी को सुखा कर उसका संग्रहण करना :-

यदि गोबर गैस संयंत्र घर के पास व खेत से दूर है तब पतली सैलरी को संग्रह करने के लिए बहुत जगह लगती है व पतली स्लरी का स्थांतरण भी कठिन होता है एसी अवस्था में सलरी को सुखाना आवश्यक है | इसके लिए ग्रामोपयोगी विज्ञान केन्द्र वर्धा द्वारा फिल्ट्रेशन टैंक पद्धति विकसित की गई है | इसमें बायोगैस के निकास कक्ष से जोड़कर 2 घनमीटर के संयंत्र के लिए 1.65 मीटर – 0.6 मीटर – 0.5 मीटर के दो सिमेंट के टैंक बनाये जाते है | इसके दुसरे तरफ छना हुआ पानी एकत्र करने हेतु एक पक्का गड्ढा बनाया जाता है | फिल्ट्रेसन टेंक में नीचे 15 से.मी. मोती का कारी कचरा, सूखा कचरा, हर कचरा इत्यादी डाला जाता है |इस पर निकास कक्ष से जब द्रबरूप की स्लरी गिरती है तब स्लरी का पानी कचरे के थर से छन कर नीचे गड्ढे में एकत्र हो जाता है उसका 2/3 हिस्सा गद्दे में पुन: एकत्र हो जाता है |इसे गोबर के साथ मिलाकर पुन: संयंत्र में डालने से गैस उत्पादन बढ़ जाता है | इसके अलावा इसमें सभी पोषक तत्व घुलनशील अवस्था में होते है | अत: पौधों पर छिड़काव करने से पौधों का विकास अच्छा होता है , कीड़े मरते है एवं फसलों में बृद्धि होती है | करीब 15 – 20 दिनों में टैंक भर जाता है तब इस टैंक को ढक कर स्लरी का निकास दुसरे टैंक में खोल दिया जाता है , इसका भंडारण अलग से गद्दों में किया जा सकता है अथवा इसे बैलगाड़ी में भारकर खेत तक पहुँचाना असान होता है | फिल्ट्रेसन टैंक की मद्द से कम जगह में अधिक बायोगैस की स्लरी का संग्रह किया जा सकता है व फिल्टर्ड पानी के बाहरनिकलने व उसका संयंत्र में पुन: उपयोग करने से पानी की भी बचत होता है | इस प्रकार बायोगैस संयंत्र से बायोगैस द्वारा इंधन जकी समस्या का समाधान तो होता ही है साथ में स्लरी के रूप में उत्तम खाद भी खेती के लिए प्राप्त होता है | अत: बायोगैस संयंत्र को बायोडंग स्लरी खाद संयंत्र भी कहा जाना उचित होगा |

हरी खाद

मिट्टी की उर्वरा शक्ति जीवाणुओं की मात्रा एवं क्रियाशीलता पर निर्भर रहती है क्यों की बहुत सी रासायनिक क्रियाओं के लिए सूक्ष्म जीवाणुओं की आवश्यकता रहती है , जीवित व सक्रीय मृदा वही कहलाती है जिसमें अधिक से अधिक जीवांश हों | जीवाणुओं का भोजन प्राय: कार्बनिक पदार्थ ही होते है  | इनकी अधिकता से मिट्टी की उर्वरा शक्ति का प्रभाव पड़ता है | केवल कार्बनिक खादों, जैसे गोबर खाद, हरी खाद, जीवाणु खाद द्वारा ही स्थाई रूप से मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ाया जा सकता है | मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ानेकी क्रियाओं में हरी खाद प्रमुख है | इस क्रिया में वानस्पति सामग्री को अधिकांशत: हरे दलहनी पौधों को उसी खेत में उगाकर जुताई कर मिट्टी में मिला देते है |

  1. फसले अधिक डाल पात वाली एवं तेजी से बढ़ने वाली हों
  2. फसलों की डाल पात मुलायम हो और बिना रेशे वाली हो ताकि जल्दी से मिट्टी में मिल जावे |
  3. फसलों की जड़े गहरी हो ताकि नीचे की मिट्टी को भुरभुरी बना सकें और नीचे की मिट्टी से पोषक तत्व ऊपरी सतह पर इकठा हों |
  4. फसल की जड़ों में अधिक ग्रंथियां हो ताकि वायु के नाइट्रोजन को अधिक मात्रा में स्थिरीकरण कर सकें |
       फसलें बुवाई का समय बीज दर किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हरे पदार्थ की मात्रा टन / हेक्टेयर नत्रजन का प्रतिशत प्राप्त किलोग्राम / हेक्टेयर
           सनई     अप्रैल–जुलाई 80 – 100       0.43 60 – 100
  • ढेंचा
    अप्रैल–जुलाई 80 – 100       0.42 84 – 105
  • लोबिया
    अप्रैल–जुलाई 45 – 55       0.49 74 – 88
  • उड़द
     जून–जुलाई 20 – 22       0.41 40 – 49
  • मूंग
     जून–जुलाई 20 – 22
Source :किसान कल्याण तथा किसान विकास विभाग मध्यप्रदेश
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