गन्ने की लाभकारी जैविक खेती किस प्रकार करें ?

गन्ने की लाभकारी जैविक खेती किस प्रकार करें ? 

मृदा में कार्बनिक पदार्थों का क्या महत्व है?

मृदा में कार्बनिक पदार्थ मृदा की बेहतर आकृति बनाने मददगार होते हैं और पानी तथा हवा के अति लाभदायक हालात उपलब्ध कराने में सहायक होते हैं। यह पौधे के पोषक तत्वों का स्त्रोत हैं, जिसमें सूक्ष्म पोषक तत्व भी शामिल हैं, जो खनिज रूपान्त्रण के दौरान उपलब्ध रूप में स्वतंत्र हो जाते हैं। इनकी उपस्थिति से मृदा की जल धारण क्षमता, बफर और आयन अदान-प्रदान क्षमता और सूक्ष्म जीव गतिविधियों में वृद्धि हो जाती है। अतः मृदा कार्बनिक पदार्थ को मृदा उत्पादक्ता का अमृत समझा जाता है।

क्या गन्ने की खेती को केवल कार्बनिक खादों के साथ किया जा सकता है?

हां, यह सम्भव है, गन्ने की खेती को केवल कार्बनिक खादों के साथ किया जा सकता है। कार्बनिक खादों की मात्रा इतनी होनी चाहिये जिससे एक फसल के लिये सभी आवश्यक तत्वों की सिफारिश की गई मात्रा उपलब्ध हो सके। आमतौर पर यह मात्रा 50 टन/है0 से अधिक आवश्यक होगी मगर इतनी अधिक मात्रा में कार्बनिक पदार्थों की उपलब्धत्ता और उनकी उच्च कीमत इसके अपनाये जाने के रास्ते का सबसे बड़ा अवरोधक है।

गन्ने की खेती के लिये कौन्न से जैविक खादों की आवश्यक्ता है?

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गन्ने की फसल के लिये 10.0 किलोग्राम एज़ोसपिरिल्लम या गलुकोनएसिटोबैक्टर के साथ 10.0 किलोग्राम फासफोबैक्टीरिया प्रति है0 की मात्रा मिलाकर प्रयोग करने की सिफारिश की गई है। यह मात्रा दो बराबर हिस्सों में बांटकर दी जाती है। गन्ने के खेत में जब रसायनिक खादों को 45 और 90 दिनों पर देना होता है तब जैविक खादों, एज़ोसपिरिल्लम या गलुकोनएसिटोबैक्टर के साथ फासफोबैक्टीरिया, की आधी आधी मात्रा 30 और 60 दिनों पर दी जाती है। उन गन्ने के खेतों में, जहां रसानिक खाद तीन हिस्सों में 30, 60 और 90 दिन पर दी जाती है वहां जैविक खाद 45 और 75 दिनों पर दो बराबर हिस्सों में दी जाती है।

जैविक खादों, एज़ोसपिरिल्लम या गलुकोनएसिटोबैक्टर व फासफोबैक्टीरिया की आवश्यक मात्रा को 500 ग्राम खलिहान खाद के साथ अच्छी तरंह से मिलाकर गन्ने के पौधों के उदगम स्थलों के पास डालकर हल्कि मिट्टी चढ़ाकर सिंचाई कर दी जाती है। दूसरा विकल्प है जैविक खादों को पानी में मिलाकर पौधों के उदगम स्थलों के पास गीली मृदा के हालातों में डालना।

समड में पोषक तत्व संघटकों की मात्रा क्या है?

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प्रैसमड में औसतन 20 से 24% कार्बनिक कार्बन, 1.26% नेत्रजन, 3.85% पी.2ओ.5, 1.46% के.2ओ.,11.0% कैलश्यिम आक्साईड, 1.6% मैगनीश्यिम, 0.23% गंधक, 2,000 पीपीएम लोहा, 898 पीपीएम मैंगनीज़़, 59 पीपीएम जि़ंक और 52 पीपीएम ताम्बा पाया जाता है।

प्रैसमड और गन्ने के अवशेषों की तीव्र कम्पोस्टिंग के लिये किन सूक्ष्मजीवों का प्रयोग किया जाता है?

प्रैसमड और गन्ने के अवशेषों की तीव्र कम्पोस्टिंग के लिये ट्राइकोडर्मा विरिडी और प्लुटोरस का प्रयोग किया जाता है।

गन्ने के अवशेषों से कम्पोस्ट कैसे तैयार की जाती है?

गन्ने के अवशेषों के अपघटन के लिये गन्ना प्रजनन संस्थान ने एक तीव्र कम्पोस्टिंग प्रक्रिया विकसित की है। गन्ने के खेत के किनारों पर आसान लम्बाई चोढ़ाई के गड्ढे बनाये जाते हैं। गन्ने की पुरानी पत्तियों को उतारकर और गन्ना कटाई के समय पत्तियों और गन्ने के ऊपरी हिस्सों को गड्ढों में तहें बनाकर रख दिया जाता है। ट्राइकोडर्मा विरिडी और प्लुटोरस के संवर्धनों की एक किलोग्राम मात्रा को 7.5 किलोग्राम यूरिया और 50-75 किलोग्राम गाय के ताज़े गोबर के साथ पानी में मिलाकर, प्रत्येक एक टन गन्ने के अवशेषों के हिसाब से, तहों पर डालते रहें। समय समय पर पानी डालते रहें ताकि उपयुक्त नमी बनी रहे। इस विधि से 10-12 सप्ताह में कम्पोस्ट बनकर तैयार हो जाती है। इस कम्पोस्टिंग प्रक्रिया को गड्ढों की बजाय ढेर लगाकर भी सम्पन्न किया जा सकता है। गन्ने के अवशेषों से तैयार कम्पोस्ट में 0.8% नेत्रजन, 0.25% फासफोरस और 0.7% पोटाश की मात्रा के साथ कार्बनःनेत्रजन का अनुपात 22:1 को पाया जाता है। गन्ने के अवशेषों को प्रैसमड के साथ मिलाकर भी कम्पोस्ट तैयार की जा सकती है।

प्रैसमड से कम्पोस्ट कैसे तैयार की जा सकती है?

ताज़ी प्रैसमड को 3 मीटर लम्बाई, 1 मीटर चोढ़ाई व 15 सेंटीमीटर ऊँचाई तक फैलाया जाता है। ट्राइकोडर्मा विरिडी और प्लुटोरस के संवर्धनों की एक किलोग्राम मात्रा को 7.5 किलोग्राम यूरिया और 50-75 किलोग्राम गाय के ताज़े गोबर के साथ पानी में मिलाकर इसे छिड़़का जाता है। फिर इसके ऊपर 30 सेंटीमीटर की मोटाई की तह जमाई जाती है और उस पर फिर जैविक संवर्धन मिश्रण को छिड़़का जाता है। इस प्रकार करीब एक मीटर मोटी परत तैयार की जाती है। सबसे ऊपर मिट्टी की परत जमाई जाती है जिसपर इतना पानी छिड़का जाता है ताकि मृदा 50% जल धारण क्षमता तक गीली हो जाये। नमी को कम्पोस्टिंग के दौरान बनाये रखा जाता है। अपघटन की यह प्रक्रिया 6 से 8 सप्ताह में पूरी हो जाती है। कम्पोस्ट की पोषक्ता को बढ़ानें के लिये इसमें राॅक फास्फेट, फैरस सल्फेट, जि़ंक सल्फेट, इत्यादि को मिलाया जा सकता है। प्रैसमड से बनी कम्पोस्ट गहरे रंग की होती है और इसकी कार्बनःनेत्रजन का अनुपात 12:1 का होता है। इसमें करीब 22.38% कार्बनिक कार्बन, 2.08% नेत्रजन, 3.63% पी.2ओ.5, 1.40% के.2ओ. की मात्रा पाई जाती है।

वर्मीकम्पोस्ट कैसे बनाई जाती है?

वर्मीकम्पोस्ट को खड्ढा विधि (5 मीटर x 4 मीटर x 0.5 मीटर) द्वारा भी तैयार किया जा सकता है। वर्मीकम्पोस्ट को फसलों व फार्म के अवशेषों, जैसेकि गन्ने के अवशेष, तूड़ी, प्रैसमड और गाय के गोबर, को प्रयोग कर बनाया जा सकता है। सूक्ष्मजीवों (ट्राइकोडर्मा विरिडी और प्लुटोरस), गाय के गोबर और यूरिया (जैसेकि प्रैसमड व गन्ने के अवशेषों की कम्पोस्टिंग के लिये ऊपर बताया गया है) का प्रयोग किसी हद कार्बनिक पदार्थों के अपघटन के लिये किया जाता है। इस थोड़े अपघटित पदार्थ में केंचुओं (Lambido marutii, Eudrilus eugeniae, Eisenia fetida and Perionyx excavatus) को 2,000/टन के हिसाब से छोड़ा जाता है और उस पर पानी को छिड़का जाता है। वर्मीकम्पोस्टिंग के लिये उपयुक्त तापमान और 40% से अधिक नमी बनाये रखना अतिआवश्यक है। वर्मीकम्पोस्ट के खड्ढे के ऊपर एक इंच मोटी मिट्टी की परत चढ़ा दी जाती है। यह कम्पोस्ट प्रयोग के लिये करीब 120 दिन में तैयार हो जाती है। दोबारा प्रयोग के लिये तैयार कम्पोस्ट से केंचुओं को अलग कर लिया जाता है। वर्मीकम्पोस्टिंग प्रक्रिया को गड्ढों की बजाय ढेर लगाकर भी सम्पन्न किया जा सकता है।

यह भी पढ़ें: गन्ना उत्पादन की उन्नत तकनीक

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