दुनिया की सबसे विनाशकारी कीट सफेद मक्खी से बचाव के लिए कपास की नई किस्म विकसित

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सफेद मक्खी कीट प्रतिरोधी कपास की नई विकसित किस्म

देश में सरकार लगातार किसानों की आय बढ़ाने के लिए काम कर रही है इसके लिए देश में स्थित कृषि विश्वविद्यालय नई-नई तकनीक एवं फसलों की नई-नई किस्में विकसित कर रहे हैं | जिससे किसानों कम लागत में अधिक उत्पादन एवं अधिक लाभ प्राप्त हो सके | अभी हाल ही में वैज्ञानिकों के द्वारा कपास की एक ऐसी किस्म विकसित की जा रही है जिसपर सफ़ेद मक्खी का असर नहीं होगा |

क्या है कपास की सफ़ेद मक्खी

सफेद मक्खी छोटा सा तेज उडऩे वाला पीले शरीर और सफेद पंख का कीड़ा है। छोटा एवं हल्के होने के कारण ये कीट हवा द्वारा एक दूसरे से स्थान तक आसानी से चले जाते हैं। इसके अंडाकार शिशु पतों की निचली सतह पर चिपके रहकर रस चूसते रहते हैं। भूरे रंग के शिशु अवस्था पूरी होने के बाद वहीं पर यह प्यूपा में बदल जाते हैं। ग्रसित पौधे पीले व तैलीय दिखाई देते हैं। जिन काली फंफूदी लग जाती है। यह कीड़े न कवेल रस चूसकर फसल को नुकसान करते हैं।

कपास की सफेद मक्खी से बचाएगी यह किस्म

वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के वैज्ञानिकों ने टेक्टेरिया मैक्रोडोंटा फर्न के जीन्स के उपयोग से कपास की एक कीट-प्रतिरोधी ट्राँसजेनिक किस्म विकसित की है। यह किस्म सफेद मक्खी के हमले से कपास की फसल को बचाने में मददगार हो सकती है। जल्दी ही कपास की इस किस्म का परीक्षण शुरू किया जाएगा। यह जानकारी सीएसआईआर के महानिदेशक डॉ शेखर सी. मांडे ने हाल में मैसूर में एक कार्यक्रम के दौरान दी है। कपास की यह किस्म लखनऊ स्थित सीएसआईआर-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआई) के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई है। एनबीआरआई के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ पी.के. सिंह ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना के फरीदकोट केंद्र में अप्रैल से अक्टूबर के दौरान कपास की इस किस्म का परीक्षण किया जाएगा।” 

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इस तरह विकिसत की गई यह किस्म

यह कीट-प्रतिरोधी किस्म विकसित करने के लिए शोधकर्ताओं ने पौधों की जैव विविधता से 250 पौधों की पहचान की है, जिनमें ऐसे प्रोटीन अणुओं का पता लगाया जा सके, जो सफेद मक्खी के लिए विषैले होते हैं। सभी पौधों के पत्तों के अर्क को अलग-अलग तैयार किया गया था, और सफेद मक्खी को उन पत्तों को खाने के लिए दिया गया। इन पौधों में से, एक खाद्य फर्न टेक्टेरिया मैक्रोडोंटा का पत्ती अर्क सफेद मक्खी में विषाक्तता पैदा करते हुए पाया गया है।” इसी आधार पर टेक्टेरिया मैक्रोडोंटा के जीन्स के उपयोग से कपास की यह ट्रांसजेनिक प्रजाति विकसित की गई है।

टेक्टेरिया मैक्रोडोंटा संवहनी पादप (ट्रैकेओफाइट) समूह का हिस्सा है। इस पौधे को नेपाल में सलाद के रूप में उपयोग किया जाता है। एशिया के कई क्षेत्रों में गैस्ट्रिक विकारों को दूर करने के लिए भी इस समूह के पौधों का उपयोग होता है, जो इनमें कीटनाशक प्रोटीन के मौजूद होने की संभावना को दर्शाते हैं।इस समूह के पौधों में लिगिनत ऊतक (जाइलम) पाए जाते हैं, जो भूमि से प्राप्त जल एवं खनिज पदार्थों को पौधे के विभिन्न अंगों तक पहुँचाने का कार्य करते हैं।

सफेद मक्खियों को जब कीटनाशक प्रोटीन की सीमित मात्रा के संपर्क में रखा गया तो उनके जीवन-चक्र में कई महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले हैं। इन बदलावों में सफेद मक्खी द्वारा खराब एवं असामान्य अंडे देना औरनिम्फ, लार्वा तथा मक्खियों का असाधारण विकास शामिल है। हालाँकि, दूसरे कीटों पर इस प्रोटीन को प्रभावी नहीं पाया गया है। डॉ सिंह ने कहा – “इससे पता चलता है कि यह प्रोटीन विशेष रूप से सफेद मक्खी पर अपना असर दिखाता है। प्रोटीन की विषाक्तता का परीक्षण चूहों पर करने पर इसे स्तनधारी जीवों के लिए भी सुरक्षित पाया गया है।”

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10 सबसे विनाशकारी कीटों में शामिल है सफेद मक्खी

सफेद मक्खी न केवल कपास, बल्कि अन्य फसलों को भी नुकसान पहुँचाने के लिए जानी जाती है। यह दुनिया के शीर्ष दस विनाशकारी कीटों में शामिल है, जो दो हजार से अधिक पौधों की प्रजातियों को नुकसान पहुँचाते हैं और 200 से अधिक पादप वायरसों के वेक्टर के रूप में भी कार्य करते हैं। वर्ष 2015 में सफेद मक्खी के प्रकोप सेपंजाब मेंकपास की दो तिहाई फसल नष्ट हो गई थी, जिसके कारण किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा और वे कपास की खेती से मुँह मोड़ने लगे थे।

वैज्ञानिकों का कहना यह भी है कि बीटी (बेलिस थ्यूरेनजिनेसिस) कपास मुख्य रूप से बॉलवर्म जैसे कीटों से निपटने के लिए विकसित की गई थी, जो फसल को सफेद मक्खी के प्रकोप से बचाने में कारगर नहीं है। फसलों पर इसके प्रकोप को देखते हुए वर्ष 2007 में एनबीआरआई के वैज्ञानिकों ने सफेद मक्खी से निपटने के लिए कार्य करना शुरू किया था।

अभी वज्ञानिकों द्वारा इस किस्म पर परीक्षण किया जा रहा है | प्रयोगशाला में अच्छे परिणाम मिलने के बाद अब फिल्ड पर भी प्रशिक्षण किया जा रहा है | यदि फील्ड में किए गए परीक्षणों में भी उन्हें प्रभावी पाया जाता है, तो इस किस्म को किसानों को कपास की खेती के लिए दिया जा सकता है। इससे पहले हमें यह देखना होगा कि क्या यह विशेषता कृषि वातावरण में भी उसी तरह देखने को मिलती है, जैसा कि प्रयोगशाला के परीक्षणों में देखी गई है।

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2 COMMENTS

  1. सर,
    वराइटी का नाम क्या है। इसके बारे में बताए। ये वराइटी हरियाणा में उपलब्ध है। इसे बोने का सही समय और किस मिटी , जल, वातावरण की आवश्यकता होती हैं। ये हरियाणा में कामयाब है या नही । कृप्या पूरी व सही जानकारी दे ।

    • जी हरियाणा में भी होगी इस वर्ष कर्नल के वैज्ञानिक इस वर्ष वहां लगाकर टेस्ट करने वाले हैं |

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