प्राकृतिक खेती शून्य लागत वाली खेती है, जिसकी खाद की फैक्ट्री है देशी गाय: गुजरात के राज्यपाल श्री आचार्य देवव्रत

शून्य बजट प्राकृतिक कृषि पद्धति पर राज्यपाल श्री आचार्य देवव्रत

देश में कृषि की लागत को कम करने और किसानों की आय बढ़ाने के लिए प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। मध्य प्रदेश में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए 13 अप्रैल 2022 को शून्य बजट प्राकृतिक कृषि पद्धति पर पर एक दिन की कार्यशाला का आयोजन किया गया। कुशाभाऊ ठाकरे इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर भोपाल में हुई कार्यशाला में मध्यप्रदेश के राज्यपाल श्री मंगुभाई पटेल, मुख्यमंत्री श्री चौहान ने भी सहभागिता की। केंद्रीय कृषि एवं किसान-कल्याण मंत्री श्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कार्यशाला में दिल्ली से वर्चुअली सहभागिता की। किसान-कल्याण तथा कृषि विकास मंत्री श्री कमल पटेल उपस्थित थे।

रासायनिक खाद और कीटनाशक पर आधारित कृषि की दशा और दिशा बदलने के उद्देश्य से प्राकृतिक खेती और प्राकृतिक चिकित्सा के प्रकाण्ड विद्वान गुजरात के राज्यपाल श्री आचार्य देवव्रत ने प्राकृतिक कृषि पद्धति पर अपने विचार रखे। 

जैविक खेती और प्राकृतिक खेती में है अंतर 

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गुजरात के राज्यपाल श्री आचार्य देवव्रत ने कहा कि प्राकृतिक खेती शून्य लागत वाली खेती है, जिसकी खाद की “फैक्ट्री देशी गाय और दिन-रात काम करने वाला मित्र केंचुआ” है। उन्होंने जैविक और प्राकृतिक खेती के बीच अंतर बताया। साथ ही प्राकृतिक खेती की विधि को विज्ञान आधारित उदाहरणों और स्वयं के खेती के अनुभवों के आधार पर समझाया। उन्होंने बताया कि रासायनिक तत्वों का खेत में उपयोग, मिट्टी की उर्वरा शक्ति को समाप्त कर देता है। जैविक खेती की उत्पादकता धीमी गति से बढ़ती है। साथ ही आवश्यक खाद के लिए गोबर की बहुत अधिक मात्रा की आवश्यकता होती है, जिसके लिए प्रति एकड़ बहुत अधिक पशुओं की जरूरत और अधिक श्रम लगता है।

रासायनिक खाद से फसलें होती हैं ज़हरीली 

राज्यपाल श्री आचार्य देवव्रत ने बताया कि भूमि की उर्वरा शक्ति आर्गेनिक कार्बन पर निर्भर करती है। हरित क्रांति के सूत्रपात केंद्र, पंत नगर की भूमि में वर्ष 1960 में आर्गेनिक कार्बन की मात्रा 2.5 प्रतिशत थी, जो आज घटकर 0.6 प्रतिशत रह गई है। इसकी मात्रा 0.5 प्रतिशत से कम होने पर भूमि बंजर हो जाती है। रासायनिक खाद और कीटनाशक का अंधाधुंध उपयोग फसलों को जहरीला बनाता है। इसी कारण कैंसर जैसे गंभीर रोग के मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। 

इस तरह बनते हैं प्राकृतिक खेती में खाद और जैविक कीटनाशक

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राज्यपाल श्री आचार्य देवव्रत ने कहा कि भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने और जहरीले तत्वों से मानव जाति को बचाने के लिए गो-आधारित प्राकृतिक खेती ही सबसे प्रभावी समाधान है। गो-आधारित प्राकृतिक खेती के लिए खाद और कीटनाशक देसी गाय के गोबर और मूत्र से बनते हैं। इनमें दाल का बेसन, गुड़, मुट्ठी भर मिट्टी और 200 लीटर पानी मिलाना पड़ता है। किसान यह जीवामृत स्वयं तैयार कर सकते हैं। 

जीवामृत खेत की उर्वरा शक्ति को उसी तरह बढ़ाता है, जैसे दही की अल्प मात्रा दूध को दही बना देती है। एक एकड़ भूमि के लिए जीवामृत, देसी गाय के एक दिन के गो-मूत्र और गोबर से तैयार हो सकता है। उन्होंने कहा कि एक गाय से 30 एकड़ भूमि में प्राकृतिक खेती की जा सकती है। जीवामृत से उत्पन्न होने वाले जीवाणु किसान के सबसे बड़े मित्र हैं। केचुएँ की सक्रियता भूमि में गहरे तक जल रिसाव को बढ़ाती है, इससे जल संचयन क्षमता भी बढ़ती है।

प्राकृतिक खेती से किसानों की आय में वृद्धि भी संभव

राज्यपाल श्री देवव्रत ने बताया कि प्राकृतिक खेती में भूमि को ढँक कर रखना (मलचिंग) भी जरूरी है। इससे तीन वर्षों में 70 प्रतिशत तक जल की बचत होती है। जीवाणुओं को बढ़ने के लिए भोजन मिलता है, आर्गेनिक कार्बन बचता और खरपतवार भी नहीं उगते हैं। उन्होंने कहा कि एक बार में अनेक फसलें लेने से मिट्टी की उर्वरा क्षमता बढ़ती है तथा अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है। इससे किसानों की आय में वृद्धि होती है।

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