मुंजा घास एक ऐसी खरपतवार है जिसकी खेती कर आप लाखों रुपयें कमा सकते हैं

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munja ghas ke utpad

औषधीय गुणों वाली मुंजा घास की खेती

मुंजा नदियों के किनारे, सड़कों , हाईवे, रेलवे लाइनों और तालबों के पास जहाँ खाली जगह हो, वहां पर प्राकृतिक रूप से उग जाती है | इसके पौधे, पत्तियां , जड़ व तने सभी औषधीय या अन्य किसी न किसी प्रकार उपयोग में लाए जाते हैं | इसकी हरी पत्तियां पशुओं के चारे के लिए प्रयोग में आती हैं | जब अकाल पड़ता है उस समय इसकी पत्तियों को शुष्क क्षेत्रों में गाय व भैंस को हरे चारे के रूप में खिलाया जाता है | पत्तियों की कुट्टी करके पशुओं को खिलने से हरे चारे की पूर्ति हो जाती है | यह बहुवर्षीय घास भारत, पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान के सुखा क्षेत्रों में पायी जाती है | इसकी जड़ों से औषधीयां भी बनाई जाती है | राष्ट्रीय स्तर पर इनकी और खपत बढने की प्रबल संभावनाएं हैं |

पुराने समय में जब अंग्रेजी दवाईयों का प्रचलन नहीं था तो औषधीय पौधों को वैध और हकीम विभिन्न बीमारियों के उपचार के लिए प्रयोग में लाते थे | हमारे कई ग्रंथों में बहुत सी बहुमूल्य जीवनरक्षक दवाइयां बनाने वाली बूटियों का विस्तृत वर्णन किया गया है | इसमें सरकंडा (मुंजा) की जड़ों का औषधीय उपयोग का भी उल्लेख है | आधुनिक युग में औषधीय पौधों का प्रचार व उपयोग अत्यधिक बढ़ गया है | इसका सीधा असर इनकी उपलब्धता व गुणवत्ता पर पडा है |

मुंजा की खेती कैसे करें ?

यह ढलानदार, रेतीली , नालों के किनारे व हल्की मिटटी वाले क्षेत्रों में आसानी से उगाया जा सकता है | यह मुख्यत: जड़ों द्वारा रोपित किया जाता है | एक मुख्य पौधे (मदर प्लांट) से तैयार होने वाली 25 से 40 छोटी जड़ों द्वारा इसे लगाया जाता है | जुलाई में जब पौधों से नए सर्कस निकलने लगें तब उन्हें मेड़ों, टिब्बों और ढलान वाले क्षेत्रों में रोपित करना चाहिए | नई जड़ों से पौधे दो महीने में पुर्न तैयार हो जाते हैं | इसकी 30 × 30 ×30 से.मी. आकार के गड्ढों में 75 × 60 से.मी. की दुरी पर लगाना चाहिए | इसकी 30,000 से 35,000 जड़ें या सकर्स प्रति हैक्टेयर लगाई जा सकती है |

पहाड़ों और रेतीले तिब्बोब पर ढलान की ओर इसकी फसल लेने पर मृदा कटव रुक जाता है | जब पोधे खेत में लगा देते हैं तो दो महीने बाद पशुओं से बचना चाहिए | सूखे क्षेत्रों में लगाने के तुरन्त बाद पानी अवश्य देना चाहिए | इससे पौधे हरे व स्वस्थ रहते हैं तथा जड़ों का विकास अच्छी तरह से होता है |

पानी का जमाव पौधे की जड़ों के लिए हानिकारक होता है तथा जड़ों का विकास कम हो जाता है | इसकी खेती सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लिए काफी उपयोगी हो सकती है | पहली बार लगभग 12 महीने के बाद मुंजा को जड़ों से 30 से.मी. ऊपर से काटना चाहिए | इससे दुबारा फुटान अधिक होती है | यदि देखा जाये तो एक पुर्न विकसित पौधे से जड़ों का गुच्छा बन जाता है | इससे लगभग 30 – 50 कल्लों (सरकंडों) का गुच्चा बन जाता है | जो 30 से 35 वर्षों तक उत्पादन देता रहता है | पुर्न विकसित मुंजा के गुच्छे से प्रति वर्ष कटाई करते रहना चाहिए |

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इससे मिलने वाले उत्पादों से अधिक लाभ कमाया जा सकता है | इसे बाजार में 4 – 5 रूपये किलोग्राम की दर से ताजा भी बेचा जा सकता है | मुंजा को रासायनिक खाद की आवश्यकता नहीं पड़ती फिर भी यदि आवश्यकता हो तो 15 से 20 टन प्रति हैक्टेयर देसी खाद डालनी चाहिए  इसकी औसत पैदावार 350 – 400 किवंटल प्रति हैक्टेयर प्राप्त की जा सकती है |

मुंजा घास के उपयोग

ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बहुत अधिक प्रयोग में लाया जाता है | इसकी जड़ों और पत्तियों का प्रयोग विभिन्न  प्रयोग की औषधीयां बनाने में किया जाता है | मुंजा एक लाभदायक खरपतवार है | इसके लाभ ज्यादा हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में इससे भूमिहीन कृषकों और ग्रामिणों को रोजगार मिलता है | भारत, पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान आदि देशों में मुंजा से ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 33 प्रतिशत रोजगार मिलता है |

आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में शादी – पार्टियों में इससे बने उत्पाद काम में लिए जाते हैं | वैज्ञानिक टूर पर देखें तो पाया गया है कि इसकी रस्सी से बनी चारपाई बीमार व्यक्तियों के स्वास्थ्य के लिए भुत उपयोगी है | मुंजा की रस्सियों से बनी चारपाई पर सोने से कमर दर्द और हाथ – पैर में दर्द नहीं होता है | पशुओं के पैर में हड्डियां टूट जाने पर इसके सरकंडों को मुंजा की रस्सी से चरों तरफ बंधने पर आराम मिलता है | पशुओं व मनुष्यों में इससे बने छप्पर के नीचे सोने पर गर्म लू का प्रभाव कम हो जाता है |

मुंजा घास की कटाई और उपज

 कटाई प्रतिवर्ष अक्तूबर से नवम्बर में करनी चाहिए | कटाई उस समय उचित मणि जाती है , जब इसकी ऊँचाई 10 से 12 फीट हो जाये तथा पत्तियां सूखने लगें व पीले रंग में परिवर्तित हो जाएँ | कटाई के बाद सरकंडों को सूखने के लिए 5 से 8 दिनों तक खेत में इकट्ठा करके फूल वाला भाग ऊपर तथा जड़ वाला भाग नीचे करके खेत में मेड़ों के पास खड़ा करके सुखाना चाहिए | सूखने के बाद कल्लों से फूल वाला भाग अलग कर लेना चाहिए और बाजार में बेचने के लिए भेजना चाहिए | सूखे हुये सरकंडों से पत्तियां, कल्ले और फूल वाला भाग अलग कर लेना चाहिए | इस प्रकार प्रति हैक्टेयर 350 से 400 किवंटल उपज प्राप्त की जा सकती है | एक अनुमान के अनुसार मुंजा घास प्रति हैक्टेयर औसतन 85,000 से 1,00,000 रूपये आय प्राप्त की जा सकती है |

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मुंजा के विभिन्न उपयोग

  • घरेलू जरूरत की बस्तुएं बनाने में अधिक प्रयोग में लाया जाता है | जैसे – मचला, चारपाई, बीज साफ करने के लिए छज , रस्सी , बच्चों का झुला , छप्पर , बैठने का मुधा आदि सजावटी समान |
  • रेगिस्तान क्षेत्र जहाँ पर रेतीली मृदा हो, उन क्षेत्रों में हवा द्वारा मृदा एक बड़ी समस्या है | एसे स्थानों पर मुंजा एक सफल पौधा है , जो मृदा कटाव को 75 प्रतिशत तक कम करता है |
  • बड़े – बड़े खेतों के चरों ओर मेड़ों पर मुंजा लगाने से बाहरी तेज व गर्म हवाओं से फसल को लू के प्रकोप से बचाया जा सकता है |
  • गर्मी में खिरावर्गीय सब्जियों की रोपाई के बाद तेज धूप से बचाव के लिए मुंजा के सरकंडों का प्रयोग छाया के लिए किया जाता है | इससे लू का प्रकोप लताओं पर नहीं पड़ता तथा लताएँ स्वस्थ्य रहती है |
  • गाँव में गर्मी के मौसम में जब काम नहीं हो, उस मुंजा के कल्लों से मूंझ निकालकर उसकी रस्सी व कई प्रकार की घरेलू आवश्यकता वाली वस्तुएं बनायी जाती है |
  • इसके सरकंडों का प्रयोग छप्पर बनाने में किया जाता है | बड़े – बड़े राष्ट्रीय मार्गों पर होटलों एवं रेस्तरां में विभिन्न प्रकार के आकर्षक छप्पर बनाने में भी इसका प्रयोग किया जाता है | यह गर्मी में बहुत ठंडी रहती है |
  • रेतीले क्षेत्रों में वर्षा के समय जब पानी का भाव ज्यादा हो, उस वक्त इसका प्रयोग मृदा कटव रोकने में किया जाता है |
  • ग्रामीण महिलायें इसकी फूल वाली डंडी से विभिन्न प्रकार की आकर्षक बस्तुयें जैसे – छबड़ी, चटाई, पंखी, ईंडी का घेरा आदि बनाती है |
  • सरकंडों का प्रयोग ज्यादातर पौधशाला एवं वर्मीक्म्पोष्ट बनाने वाली इकाईयों को छायादार बनाने में किया जाता है |
  • इसका उपयोग जैविक पलवार के रूप में भी किया जाता है |
  • मुंजा का प्रयोग ग्रीसिंग पेपर बनाने में किया जाता है |
  • इसकी जड़ों के पास से निकाली नई सकर्स का उपयोग चावल के साथ उबालकर कहने में किया जाता है |
  • कम वर्षा वाले क्षेत्रों में इसके सरकंडों से चारा संग्रहण के लिए एक गोल आकार की संरचना बनाकर किसान सूखे चारे व बीजों को स्टोर करते हैं जो 10 – 12 वर्षों तक खराब नहीं होता है |
  • यह पशुओं के लिए बिछावन बनाने में काम आता है |
  • फसलों को पाले से बचाने के किसान इसका उपयोग करते हैं |
  • भेड़ – बकरियों का बड़ा बनाने में इसके सरकंडों का इस्तेमाल किया जाता है |
  • इसकी रख से कीटनाशक जैविक उत्पाद बनाया जाता है |
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