मिट्टी में जिंक की कमी से धान में लग सकता है खैरा रोग, जानिए कैसे बचाएं फसल को इस रोग से

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paddy khaira rog

धान की फसल में खैरा रोग एवं उसका नियंत्रण

भारत चीन के बाद विश्व में सबसे बड़ा धान का उत्पादक देश है | यहाँ प्रति वर्ष 117 मिलियन टन धान का उत्पादन करता है | अधिकांश राज्यों में किसान की आजीविका का मुख्य साधन ही धान की खेती है | ऐसे में धान की फसल में कीट-रोग के प्रकोप के चलते किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है | इस तरह के नुकसान से बचने के लिए जरुरी है कि किसान समय पर कीट रोग की पहचान कर उनका नियंत्रण करें अन्यथा उन्हें अधिक हानि हो सकती है | धान की फसल में एक ऐसा ही रोग सूक्ष्म पोषक तत्व जिंक की कमी से लगता है जिसे खैरा रोग कहते हैं |

धान के फसल में विभिन्न प्रकार के रोगों में से खैरा रोग से काफी फसल को नुकसान होता है | रोगी पोधों में दाने नहीं बनते जिससे कभी कभी उपज की हानि 25-30 प्रतिशत हो जाती है | जिससे समय पर इस रोग का नियंत्रण करना अति आवश्यक है |

धान की फसल में खैरा रोग के लक्षण एवं उसकी पहचान

यह रोग मृदा में जिंक की कमी के कारण होता है, जिसे आसानी से पहचाना जा सकता है |  खैरा रोग के कारण नर्सरी या मुख्य खेत में पौधों में छोटे–छोटे पैच में दिखाई देते है | इसके कारण पत्तियों पर हल्के पीले रंगे के धब्बे बनते हैं, जो बाद में कत्थई रंग के हो जाते हैं | पत्तियां मुरझा जाती है और इनके मध्य भाग क्लोरोटिक हो जाते हैं | पौधा बौना रह जाता है और पैदावार कम होती है |

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प्रभावित पौधों की जड़ें भी कत्थई रंग की हो जाती हैं | पहले खेत के एक कोने में दिखने वाले धब्बे देखते ही देखते पूरी फसल में फैल जाते हैं | तेज धुप में दिनों में लक्षण अधिक गंभीर हो जाते हैं | रोगग्रस्त पौधों पर कोई स्पाइक नहीं बनता है या अगर स्पाइक बनता भी है , तो दाना नहीं बनता | इस रोग के कारण धान की फसल में उपज हानि 25–30 प्रतिशत तक हो सकती है |

रोग का क्या कारण है ?

धान में जिंक की कमी सबसे व्यापक सूक्ष्म पोषक तत्व की कमी के कारण होता है | इसकी कमी की घटना आधुनिक किस्मों फसल गहनता, चावल के मोनोकल्चर आदि की शुरुआत के साथ बढ़ी है |

पौधे में पोषक तत्व जिंक/जस्ता की आवश्कता

जिंक 8 आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों में से एक है | यह पौधों के लिए कम मात्रा में आवश्यक है, लेकिन पौधे के विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है | धान के पौधों में कई जैव रासायनिक प्रक्रियाओं के लिए जस्ता/जिंक एक आवश्यक पोषक तत्व है | यह क्लोरोफिल उत्पादन में मदद करता है और झिल्ली अखंडता प्रदान करता है |

यह एंजाइमों को सक्रिय करता है, जो कुछ प्रोटीन के संश्लेष्ण के लिए जिम्मेदार होते हैं | जिंक की कमी पौधे के रंग और मरोड़ (टरगर) को प्रभावित करती है | जस्ता पौधे को ठंडे तापमान का सामना करने में मदद करता है साथ ही पौधों के रक्षा तंत्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है |

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खैरा रोग का नियंत्रण कैसे करें ?

धान की फसल में खैरा रोग से फसल को काफी क्षति होती है | इसके लिए किसान को इस रोग पर नियंत्रण करना जरुरी है | इस रोग के नियंत्रण के लिए किसान यह सभी उपाय करें |

  • रोपाई से पहले या भूमि तैयारी के समय 25 किलोग्राम जिंक प्रति हैक्टेयर का प्रयोग करें | ऐसी किस्में लगायें जो खैरा रोग प्रतिरोधी हो |
  • यदि फसल संक्रमित है, तो प्रति हैक्टेयर 600–700 लीटर पानी में 5 किलोग्राम जिंक सल्फेट + 25 किलोग्राम चुने का प्रयोग करें |
  • नर्सरी में बुआई के 10 दिनों बाद प्रथम छिडकाव, बुआई के 20 दिनों बाद दूसरा छिडकाव और रोपाई के 15 – 30 दिनों बाद तीसरा छिडकाव करना चाहिए |
  • बुझा हुआ चुना उपलब्ध न होने पर 2 प्रतिशत यूरिया तथा जिंक सल्फेट का छिडकाव करना चाहिए |
  • खेत में बार–बार एक ही फसल नहीं लेना चाहिए | ऐसा करने से जिंक की कमी हो जाती है | धान वाले खेत में उड़द या अरहर की खेती करने से जिंक की कमी दूर हो जाती है |
  • उर्वरकों का उपयोग करें, जो अम्लता उत्पन्न करते हैं (जैसे–यूरिया को अमोनियम सल्फेट से बदले) | रोपाई से पहले जैविक खाद का उपयोग करना चाहिए |

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