जानिए क्यों RCEP समझौता किसानों को बर्बादी की और ले जा सकता है ?

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rcep samjhote se bhartiya kisano par kya asar hoga

RCEP समझौते का भारतीय किसानों पर प्रभाव

थाईलैंड के राजधानी बैंकाक में RCEP का वैठक कि शुरुआत आज से होने वाली है | RCEP (Regional Comprehensive Economic Partnership) 16 देशों एक बीच मुक्त व्यापर को बढ़ावा देने के लिए गठित किया गया है | इसका मतलब यह हुआ कि 16 देशों का एक एकल बाजार जहाँ किसी भी तरह की बाधा के व्यापर किया जा सके | इस संगठन के अन्दर ASEAN (एसोसिएशन आफ साउथ एसिया नेशन) के 10 देश के अलावा, FT (फ्री ट्रेड) के 6 देश शामिल हैं | ASEAN के अंतर्गत ब्रूनेई, कम्बोडिया, इंडोनेशिया, लाओं , मलेशिया, म्यांमार, फिलिपिन्स, सिंगापूर, थाईलैंड और वियतनाम है | इसके अलावा FT के अंतर्गत भारत, चीन, जापान, साउथ कोरिया, ऑस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैंड है | इन सभी देशों को मिलाकर RCEP का गठन किया गया है |

अब बात आती है कि अभी RCEP को लेकर क्यों हंगामा मचा हुआ है | इसकी पूरी जानकारी किसान समाधान लेकर आया है |

भारत की RCEP समझौते में भूमिका

ASEAN का गठन 1976 ई. में हुआ है और इसका मुख्यालय इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में है | लेकिन भारत कभी भी इसका सदस्य नहीं रहा है | भारत को अलग से आसियान देशों के समूह में 1992 में अस्थाई रूप से शामिल किया गया है जो बाद में 1996 में पुर्न सदस्यता दे दी गई है | जिसे लेकर ASEAN को ASEAN+1 कहा जाता है |

4 नवम्बरRCEP की बैठक होना है इसमें 16 देश एक मुक्त व्यापर पर हस्ताक्षर करने वाले हैं | जिससे 16 देशों के बीच बिना किसी आयत शुल्क का या बहुत ही कम शुल्क पर व्यापर कर सकते हैं | इस समझौते में या तो आयत शुल्क बहुत कम होगा या फिर किसी बजी तरह का कोई आयत शुल्क नहीं रहेगा | अगर यह समझोता होता है तो यह विश्व का सबसे बड़ा एक बाजार होगा | जनसँख्या कि दृष्टि से 3.4 अरब लोग का बाजार रहेगा तो आर्थिक दृष्टि से यह विश्व की  कुल जी.डी.पी. का एक तिहाई हो जायेगा |

RCEP समझोते से भारत पर असर

भारत में इस समझौते का विरोध हो रहा है | इसका कारण यह है कि RCEP के 15 देशों में से 11 देशों के साथ भारत का व्यापर घाटे में चल रहा है | भारत का व्यापारिक घाटा वर्ष 2018 – 19 में 184 अरब डालर का है तो इन 15 देशों के साथ आयत 34 फीसदी का है तो निर्यात मात्र 21 फीसदी ही है | चीन के साथ भारत का व्यपारिक घाटा 54 अरब डालर तक पहुँच गया है |

समझौते से कृषि पर क्या असर पड़ेगा ?

वर्ष 2006 के बाद भारत ने अलग–अलग द्विपक्षीय समझौते करता आ रह है | इसके तहत दो देशों के बीच मुक्त व्यापर होता है | इसके तहत भारत मलेशिया, सिंगापूर और दक्षिण कोरिया से दिव्पक्षीय व्यापार समझौते किये हैं | इसके बाद इन देशों के साथ भारत का व्यापर घाटा और बढ़ गया है |

इस समय श्रीलंका से एक समझोते के कारण केरल के किसानों को काली मिर्च, इलायची पर बुरा असर हो रहा है | जिसके कारण केरल में किसानों की आत्महत्या तक बढ़ गई है | वियतनाम में रबर आयत के कारण इंडोनेशिया का रबर उद्योग तथा केरल के रबर किसानों की आर्थिक हालत बद्दतर हो रही है | यही हालात नारियल के किसानों के साथ भी है, नारियल तेल भारत में फिलिपिन्स तथा इंडोनेशिया कर रहा है |

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दूसरी तरफ इसे इस तरह समझ सकते हैं –

वर्ष 2017 – 18 में भारत में खाद्यान का उत्पादन 273.4 मिलियन टन हुआ था | जिसमें गेहूं 97.44 मिलियन टन तथा दलहन 22.4 मिलियन टन था | इसके बाबजूद भी भारत सरकार इन सभी खाद्यानों को 25 प्रतिशत के आयत शुल्क को घटाकर 0 प्रतिशत कर दिया गया था | जिसके कारण भारत में दलहन का आयात 6.6 मिलियन टन, गेहूं का 5.75 मिलियन टन किया था | इसमें मसूर 19100 मिलियन टन चना 50841 मिलियन टन के साथ – साथ सरसों 37,649 मिलयन टन किया था | इसके कारण देश के किसानों से सरकारी खरीदी घट गई | देश में गेहूं कि सरकारी खरीदी लगभग 30 मिलियन टन हुई है | अगर बात इन मूल्य में किया जाता है तो गेहूं का आयात 8,509 करोड़ रूपये, दलहन 28524 करोड़ रूपये का किया था | जबकि तेलहन का आयत भरत सरकार के द्वारा दिए जा रहे उर्वरक के मूल्य के बराबर का आयात करता है |

वर्ष 2018 – 19 के (नवम्बर – अक्तूबर) के शुरुआती 11 माह में कुल 135.81 लाख टन खाने के तेल का आयात हुआ है | जिसमें 86.30 लाख टन पाम आयल है और 49.51 लाख टन सोयाबीन, सरसों और सूरजमुखी का तेल है | पाम तेल का आयत भारत मलेशिया से करता है जो आसियान देश का सदस्य है | इस बात का ध्यान रखना होगा कि मलेशिया से पाम तेल का आयत 35 प्रतिशत के आयात शुल्क पर होता है अगर तेल का आयात 0 % के आयात शुल्क पर होता है तो देश के किसानों के उत्पादित तेलहन का भाव गिर जाएगा | एक तो पहले से ही किसानों को लागत मूल्य नहीं मिल रहा है ऐसे में अगर बाहर से तेल का आयत भारत के बाजार से कम मूल्य पर किया जाता है तो यहाँ के किसानों का तेलहन कि खरीदी करने वाला कोई भी नहीं होगा |

डेयरी उद्योग पर समझौते का असर

भारत विश्व के दूध उत्पादन में अग्रणी देश है | यह कृषि सेक्टर का वह भाग है जो हर वक्त फायदे में रहता है | दूध उत्पादन में भारत डेयरी उद्योग के साथ – साथ आम किसान का भी महत्वपूर्ण योगदान है | किसानों का योगदान दूध उत्पादन में आधे से अधिक है | दूध किसानों के लिए प्रतिदिन का आमदनी का जरिया बना हुआ है | दूध उत्पादन में भारत वर्ष 2018–19 में 187.75 मिलियन टन है जो देश के धान उत्पादन 17463 मीट्रिक टन और गेहूं का 102 मीट्रिक टन उत्पादन को जोड़ से भी ज्यादा है | इसका मतलब यह हुआ कि देश में जितने किसानों गेहूं तथा धान से जुड़े हुये हैं उससे ज्यादा किसान दूध उत्पादन से जुड़े हैं तथा उत्पादन भी ज्यादा कर रहे हैं | दूध उत्पादन को मूल्यों में तय किया जाये तो यह 5 लाख करोड़ रूपये से भी ज्यादा है |

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इस समझोते में भारत के अलावा आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैंड दूध उत्पादन में भारत से कम तो है लेकिन उनके पास उपभोगता भी बहुत कम है | जिसकें कारण उनका दूध ज्यादा उपयोग नहीं हो पा रहा है | यह दोनों देश विश्व के नक्शे में दूर रहने के कारण इनका दूध विश्व के बाजार में नहीं आ पाता है इसलिए दूध पाउडर तथा पनीर और घी के रूप में विश्व बाजार में आना चाहते हैं | इसके कारण भारत के बाजार पर बुरा असर पड़ेगा | यहाँ पर दूध उत्पादन एक उद्योग नहीं बन पाया है जबकी न्यूजीलैंड में दूध उत्पादन एक उद्योग का रूप में विकसित है |

भारत के अलग–अलग प्रदेश में अलग–अलग फसलों की खेती करने वाले किसान है लेकिन सभी किसान पशुपालन जरुर करते हैं | इसके अलावा भारत के किसान परिवार का 23 प्रतिशत का सीधे तौर पर पशुपालन से ही आता हैं | 19वी पशुधन जनगणना के अनुसार भारत में कुल 88 मिलियन दूध देने वाली पशु है | इनका औसतन दूध उत्पादन 4.85 किलो प्रतिदिन है | भारतीय गाय तथा भैंस विश्व के गाय या भैंस से औसतन दूध उत्पादन बहुत कम करती है जिससे प्रति लीटर लागत बढ़ जाती है | इसका मतलब यह हुआ कि डेयरी उद्योग घाटे में जाता है तो देश के सभी वर्ग तथा सभी क्षेत्र के किसान की पशुपालन घाटे में जाना शुरू हो जायेगा |

RCEP समझौते से किसानों को यह नुकसान हो सकते है

  1. अनाज के बाजार में विदेशी अनाज बिना किसी आयत शुल्क के आजाने से भारतीय आनाज का मूल्य वर्तमान के मूल्य से भी नीचे चला जाएग जिससे किसानों को कम दामों पर फसल बेचना पढ़ सकता है |
  2. डेयरी प्रोडक्ट आने से भारतीय डेयरी का प्रोडक्ट का मूल्य में गिरावट आ जाएगी तथा इससे सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से डेयरी सेक्टर से लाखो नौकरी के अलावा किसानों को पशुपालन में घाटा होना शुरू हो जाएगा |
  3. मंडी में आनेवाले छोटे व्यापारी की दुकाने भी बन्द होना शुरू हो जाएँगी जिससे मंडी में किसानों को कोई खरीदार भी नहीं मिलेगा |

समझौते का असर सीधे भारत के बाजार पर पड़ना शुरू हो जायेगा | खास करके चीन, मलेशिया , इंडोनेशिया, न्यूजीलैंड और आस्ट्रलिया के देशों से भारत के बाजार पर असर पड़ेगा  इसलिए भारत में कृषि से जुड़े सभी क्षेत्र तथा कृषि संगठन विरोध कर रहे हैं | देश के विपक्षी दलों एवं किसान संगठनों के मानना है की यह समझौता अगर होता है तो भारत के करोड़ों किसान इससे बर्बाद हो जाएंगे | उनकी आय दोगनी होना तो दूर उनकी आय आधी हो जाएगी |

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