अधिक उत्पादन के लिए मई एवं जून महीने में इस तरह करें फलदार पेड़-पौधों की देखभाल

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फलदार पेड़-पौधों की देखभाल

गर्मी का मौसम हो और बागों में फलों का पेड़ में लटकना दोनों एक दुसरे के पूरक है | देश में कई फलदार पेड़ों के ऊपर फल गर्मी के मौसम में ही लगते हैं | जिसमें आम, लीची बेल इत्यादी प्रमुख फसल है | इसके अलवा सेब, बेर, अमरुद इत्यादी फसल सर्दी के मौसम में आते हैं परन्तु उनको भी वर्ष भर देख-रेख की आवश्यकता होती है | इन सभी फलदार वृक्षों के लिए मई तथा जून का माह काफी महत्वपूर्ण होता है | इन पेड़ों की कटाई, छंटाई, खाद, उर्वरक तथा नये पौधों का लगाना शुरू कर दिया जाता है | पेड़ों की सही देखभाल करने से एक तो ज्यादा फल लगते हैं दूसरी ओर पेड़ों की उम्र में काफी वृद्धि हो जाती है |

आम की देखभाल

मानसून के आगमन से पूर्व, नए बाग़ लगाने के लिए मई में उचित दुरी पर बाग़ का रेखांकन (निशान) करने के बाद गड्ढे खोद लेने का कार्य पूरा कर लेना चाहिए | नर्सरी में बीजू पौधों की आवश्यकतानुसार सिंचाई करनी चाहिए एवं खरपतवार निकाल देने चाहिए | पकते हुए फलों का चिड़ियाँ आदि पक्षियों से बचाव करना जरुरी है | फलों की आंतरिक सड़क रोकने के लिए बोरेक्स (4 किलोग्राम/100 लीटर) का छिडकाव करना चाहिए | जून में नीचे गिरे फलों को इकट्ठा कर लेना चाहिए तथा इन्हें स्थानीय बाजारों में भेजने की व्यवस्था करनी चाहिए | वृक्षों के नीचे की जमीन साफ़–सुथरी रखनी चाहिए और यदि अगेती किस्म के फल पक गई हो तो उन्हें तोड़कर बाजार में बेचने की उचित व्यवस्था करना चाहिए|

अमरूद

गर्मियों में आमतौर पर वातावरण निरंतर शुष्क होता जाता है, जिससे मृदा में पानी की कमी होने लगती है | उचित समय पर सिंचाई नहीं होने पर फलों की वृद्धि पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है, जिसके परिणामत: व छोटे रह सकते हैं | इसलिए 8–10 दिनों के अंतराल पर सिंचाई कर दी जानी चाहिए | मई में यदि बगीचों में फल मक्खी अथवा अन्य कीटों का प्रकोप हो तो किव्नाल्फास 25 ई.सी. का 2 मि.ली. प्रति लीटर या मेलाथियान 50 ई.सी. का 1 मि.ली. प्रति लीटर या मोनोक्रोटोफास 36 डब्ल्यूएससी 2 मि.मी. प्रति लीटर की दर से या 3 प्रतिशत नीम तेल का छिडकाव करें | छिडकाव प्रातः काल या देर शाम में 21 दिनों के अंतराल पर कम से कम चार बार किया जाना चाहिए |

जून में नए अमरुद के बागों की स्थापना के लिए खेत को भलीभांति तैयार करें | पौधे लगाने के लिए गड्ढों को 3 × 3 मीटर दुरी पर खोदा जाना चाहिए | प्रत्येक गड्ढे को 10 किलोग्राम गोबर की सदी खाद, 1 किलोग्राम नीम की खली, 50 ग्राम क्लोरपाइरीफाँस की धुल एवं उपरी मृदा के साथ मिलाकर भरा जाना चाहिए | पौधों में जिंक की कमी हो जाने पर पत्तियां छोटी एवं पीली लगती हैं | इसके नियंत्रण के लिए आधा किलोग्राम जिंक सल्फेट और आधा किलोग्राम बुझे हुए चुने का घोल 100 लीटर पानी में बनाकर इसका छिडकाव 15 दिनों के अंतराल पर 2 – 3 बार करना चाहिए |

बेर

देश के उत्तरी और पश्चिमी भागों में कटाई–छंटाई के लिए मई–जून (वैशाखी – ज्येष्ठ) का महिना उपयुक्त होता है, जब पौधों की अधिकांश पत्तियां झड चुकी होती हैं तथा पेड़ सुषुप्तावस्था में हो, सबसे उपयुक्त मन जाता है | छोटे पौधों में 60–90 से.मी. तक की ऊँचाई तक तने पर निकलने वाली शाखाओं को काट देना चाहिए और किसी लकड़ी अथवा बांस के सहारे सीधा करना चाहिए | बड़े वृक्षों की चटकी, टूटी और जमीन को छूती शाखाओं को छांट देना चाहिए | एक–दुसरे से मिली हुई शाखाओं को भी काट देना चाहिए | छटाई का कार्य जहाँ तक संभव हो सके, मई में पूरा कर लेना चाहिए | कटाई – छटाई करते समय, सामान्यत: पिछले वर्ष की शाखाओं का 50 प्रतिशत भाग काट देते हैं | तृतीय शाखाओं को पूर्ण रूप से एवं दिव्तीय शाखाओं की 15–20 कलियाँ काट देने पर मजबूत एवं ओजस्वी शाखाएं निकलती हैं | रोगों के प्रकोप से बचाव के लिए शाखाओं के कटे हुए स्थानों पर फफूंदनाशी (नीला थोथा या ब्लाइटाक्स – 50) का लेप कर देना चाहिए | कांट– छंट के लिए तेज धार वाले औजार का प्रयोग करना चाहिए, ताकि शाखा क्षतिग्रस्त न हो | जून अत्यधिक गर्म रहता है | वृक्षों में जब तक फुटाव न हो, तब तक सिंचाई नहीं करनी चाहिए | जिन वृक्षों में छंटाई का कार्य रह गया हो, उनमें जून के प्रथम सप्ताह तक यह कार्य पूरा कर लें चाहिए |

छंटाई के पश्चात् कटी हुई लकड़ियों और शाखाओं को हटाकर साफ़ करना चाहिए | गर्मी में एक–दो बार वृक्षों के नीचे जुताई कर देने पर हानिकारक कीट–मकड़ों के अंडे तथा प्यूपा नष्ट हो जाते हैं | पौधों के मुख्य तनों के चारों ओर 60 से.मी. तक की दुरी का घेरा छोड़कर पेड़ का बाहरी घेरा बनाया जा सकता है तथा इसको पानी में नाली से जोड़ देना चाहिए | बेर में एक साल के पौधे के लिए 5 किलोग्राम गोबर/ कम्पोस्ट खाद, 50 ग्राम नाइट्रोजन, 50  ग्राम फास्फेट व 25 ग्राम पोटाश तथा यही मात्रा क्रमश: बढ़कर 8 या उससे अधिक आयु के पौधे के लिए 40 किलोग्राम गोबर की खाद, 400 ग्राम नाइट्रोजन, 400 ग्राम फास्फेट व 200 ग्राम पोटाश प्रति वृक्ष की दर से प्रयोग करें |

चीकू

मई में जब कड़ी धुप हो तो बगीचे की गहरी जुताई करें | लगभग 15 दिनों तक खाली जगह में धुप आने दें | ऐसा करने से कीटों के अंडे नष्ट हो जायेंगे तथा बाग़ में ज्यादा कीटनाशियों के छिडकाव से बचा जा सकता सकेगा | इस समय बाग़ में सिंचाई बिलकुल न करें | नए बाग़ लगाते समय मानकीकृत किस्में लगाएं | बाग़ में मैग्नीशियम, सल्फर, बोरान, आयरन, जिंक की पूर्ति के लिए क्रमश: 1 प्रतिशत मैग्नीशियम नाईट्रोजन, 1 प्रतिशत कैल्शियम सल्फेट, बोराक्स (5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर), आयरन सल्फेट (0.5 प्रतिशत), जिंक सल्फेट (0.5 प्रतिशत) डालें | बाग़ में नाईट्रोजन, पोटेशियम और फास्फोरस के साथ – साथ सूक्ष्म पोषक तत्वों की मृदा में कमी के प्रति सजग रहें | किसी भी खाद को डालने से अवश्य करवाएं और जरूरत के अनुसार ही उर्वरक प्रयोग करें |

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अनार

उत्तर–पश्चिम भारत के शुष्क क्षेत्रों में जहाँ सिंचाई के सीमित संसाधन उपलब्ध हैं, उन क्षेत्रों में अनार मृग भार किस्म पसंद की जाती है | जबकि महाराष्ट्र के सिंचित क्षेत्रों में आंबे भार को पसंद किया जाता है | मृग भार वाले क्षेत्रों में अप्रैल–मई से ही खेतों में सिंचाई रोक दी जाती है | सिंचाई रोकने के 45 दिनों के बाद पौधों की हल्की छटाई करनी चाहिए | छटाई के तुरंत पश्चात, उर्वरक की खुराक और सिंचाई शुरू कर देनी चाहिए | सामान्यत: अनार के पौधों में 10–15 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद, 250 ग्राम नाईट्रोजन, 125 ग्राम फास्फोरस एवं 125 ग्राम पोटेशियम प्रति वर्ष प्रति वृक्ष देना चाहिए | खाद एवं उर्वरकों का उपयोग पौधों के छत्रक के नीचे चरों ओर 8–10 से.मी. गहरी खाई बनाकर देना चाहिए | यह पुष्पण और फलन की अभिवृद्धि करता है | वैकल्पिक रूप से सिंचाई रोकन के 45 दिनों बाद, पत्तियों को गिराने के लिए, एथ्रेल 1000 पीपीएम, प्रोफेनोफास 2 मि.ली. प्रति लीटर, मेटासिड 2 मि.ली. प्रति लीटर, थयोयुरिया 3 ग्राम प्रति लीटर या यूरिया फास्फेट 5 ग्राम प्रति लीटर का छिडकाव करें | तेलिया रोग से संक्रमित क्षेत्रों में मृग बाहर नहीं ली जानी चाहिए | मई के तीसरे सप्ताह से जून के आखरी सप्ताह एवं इसके बाद भी रासायनिक जैवनाशियों का प्रति सप्ताह प्रयोग करें |

मानसून के दौरान अनार के नए बाग़ लगाने हेतु, रेखांकन एवं गड्ढे खोदने का कार्य भी मई – जून में ही पूर्ण कर लेना चाहिए | सामान्यत: 4 – 5 मीटर की दुरी पर अनार का रोपण किया जाता है | पौध रोपण के एक माह पूर्व 60 × 60 × 60 से.मी. आकर के गड्ढे की उपरी मृदा में 10 – 15 किलोग्राम गोबर की सदी खाद, 1 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 50 ग्राम क्लोरोपायरिफास चूर्ण मिलाकर गड्ढों को स्थ से 15 से.मी. ऊँचाई तक भर दें | गड्ढे भरने के बाद सिंचाई करें ताकि मृदा भली–भांति बैठ जाए |

आलूबुखारा

ग्रीष्म ऋतू आते ही आलूबुखारे में खरपतवारों का प्रकोप बढ़ जाता है अत: समय–समय पर इन्हें निकाल देना चाहिए | वृक्षों के समुचित विकास के लिए मई–जून में एक सप्ताह के अंतराल पर नियमित रूप से सिंचाई करनी चाहिए | जिन जगहों पर सिंचाई की उचित व्यवस्था न हो वहां वृक्षों के नीचे पलवार (मल्च) बिछा देनी चाहिए | इसके अन्य लाभ भी हैं, जैसे इसके प्रयोग से खरपतवार का उगना कम हो जाता है | यह मृदा के तापमान को भी ठीक रखता है | इसके साथ ही अच्छी गुणवत्ता के फल भी प्राप्त होते हैं |

गर्मी के दिनों में वृक्षों को तेज धुप के हानिकारक प्रभाव से बचाने के लिए मुख्य तने पर नीले थोथे के घोल का लेप कर देना चाहिए | अलुचे की किस्मों ब्यूटी, सांता रोजा और मैथिली में अधिक फल लगते हैं एवं वृक्षों की शखाएं फलों का भार न सह सकने के करण टूट भी जाती हैं | इसके लिए बांस या मजबूत लकड़ी का सहारा देना चाहिए |

जापानी आकुबुखारा की लगभग सारी किस्मों में बहुत फल लगते हैं | यदि सभी फलों को वृक्षों पर छोड़ दिया जाए तो फल छोटे आकर के होते है | फलों की छंटाई कर देनी चाहिए | फलों की छंटाई हाथ से अथवा नेपथलीन एसिटिक एसिड अम्ल 50 पी.पी.एम. (50 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी में) का छिडकाव करने से पौधों की वृद्धि के लिए नाईट्रोजन की सबसे अधिक आवश्यकता होती है | अत: 0.5 प्रतिशत यूरिया के घोल का पर्णीय छिडकाव फूलों की पंखुड़ियों के झड़ने से लेकर फलों के पकने के 2 सप्ताह पहले तक किया जा सकता है | जिंक और लौह तत्व की कमी की पूर्ति के लिए 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट और फेरस सल्फेट के घोल का पर्णीय छिडकाव किया जा सकता है | चिड़ियों से फलों की रक्षा करनी चाहिए तथा यदि पत्ती खाने वाले कीट का प्रकोप हो तो सेविन (कार्बारिल) के 0.05 प्रतिशत घोल का छिडकाव करें |

सेब

तनों की छाल को गर्मी से बचाने के लिए घास से बाँध देना चाहिए | इस मौसम में अपस्थानिक शाखाएं भी बहुत निकलती हैं | ये पौधों से अधिकाधिक पोषक तत्व लेती हैं | इनको जल्द से जल्द हटा देना चाहिए | इस मौसम में फलों का गिरना भी प्रमुख समस्या है | इसे छिडकाव फलों के लगने के चार से पांच सप्ताह बाद करना चाहिए |

चूर्णिल फफूंद का प्रकोप होने पर केराथेन 0.03 प्रतिशत (300 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी में) या चुना और गंधक का 1:40 के अनुपात में मिलाकर छिडकाव करें | गंधक–चुने के उपयोग से रोगों और कीटों दोनों को नियंत्रित कर सकते हैं | यदि पौधों में जिंक की कमी हो तो 0.1 प्रतिशत (1 किलोग्राम प्रति 100 लीटर पानी में) जिंक सल्फेट के घोल का छिडकाव करना चाहिए | बोरान की कमी होने पर 0.5 प्रतिशत सुहाग (5 किलोग्राम प्रति 100 लीटर पानी में) के घूल का छिडकाव करें |

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पपीता

मई में बाग़ का रेखांकन करने के बाद गड्ढे भरने का कार्य समाप्त कर लेना चाहिए | पछेती किस्मों के तैयार फलों को बाजार भेजने की उचित व्यवस्था करनी चाहिए | नर्सरी में लगे छोटे – छोटे पौधों को गर्मी से सुरक्षा की समुचित व्यवस्था करनी चाहिए | नर्सरी पर छप्पर डाल दिया जाए तो अच्छा रहता है | नर्सरी के पौधों की साप्ताहिक अंतर पर सिंचाई की नियमित व्यवस्था आवश्यक है | बाग़ में लगे पौधे को तीन तरफ से घास या पुआल से ढक दिया जाए तो अच्छा रहता है | जून में नर्सरी पौधों को निकालकर बाग़ में रोप देना चाहिए एवं उसके बाद सिंचाई करनी अति आवश्यक है | पुराने बागों की बजाय नये बागों में पानी की अधिक आवश्यकता होती है |

केला

मई में भी एक सप्ताह के अंतराल पर सिंचाई अवश्य करनी चाहिए | आवांछित पत्तियों को निकाल देना चाहिए | फलों के गुच्छों को धुप से बचाने के लिए पत्तियों से ढक देना चाहिए | नए बाग़ लगाने के लिए रेखांकन के पश्चात् गड्ढे खोद लेने चाहिए | जून के अंतिम सप्ताह में खोदे गए गड्ढों को गोबर की खाद, उर्वरक व मिट्टी बराबर मात्रा में मिलाकर ऊपर तक भरें | गड्ढों में मिट्टी भरने के तुरंत बाद पानी अवश्य देना चाहिए, ताकि मिट्टी बैठ जाए | पुराने बागों में जिन पत्तियों पर धब्बे वाला रोग दिखे उन्हें काटकर मिट्टी में गहरा दबा दें या जला दें तथा कवकनाशी ब्लीटाक्स-50 का 0.3 प्रतिशत (300 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी में) घोलकर करें | उकठा रोग की रोकथाम के लिए कंदों एग्नाल से उपचारित करें |

यह समय केले की रोपाई के लिए उपयुक्त होता है | रोपण हेतु तीन पुरानी, तलवारनुमा, स्वस्थ व रोगमुक्त पत्ती वाले कंदों का ही प्रयोग करें | पत्तियों को उपरी तने के कंद से 25–30 से.मी. पर काट दें | रोपाई से पूर्व सभी पत्तियों को (एक ग्राम बाविस्टीन प्रति लीटर पानी के घोल में) उपचारित कर लें | रोपाई के समय केवल कंद भाग को ही मिट्टी में दबाएं तथा रोपाई के बाद सिंचाई कर दें |

अंगूर

बेलों में सिंचाई 10–15 दिनों के अंतराल पर करते रहना चाहिए | मई के अंत तक परलेट और ब्यूटी सीडलैस किस्मों के तैयार गुच्छों बाजार भेजने की व्यवस्था करनी चहिए | किस्में पकनी आरंभ हो गई हों तो उनमें सिंचाई बंद कर देना चाहिए | अन्यथा फलों में ठोस घुलनशील पदार्थों की अत्यधिक कमी आती है एवं फल फटने लगते हैं | ऐसे फलों को बाजार में बेचना कठिन होता है | यदि एथ्राक्नोज (श्याम व्रण) का प्रकोप हो तो बाविस्टिन (0.2 प्रतिशत) के घोल का छिडकाव एक सप्ताह के अन्तराल पर दो बार करना चाहिए | चूर्णिल फफूंद की रोकथाम के लिए केराथेन (0.1 प्रतिशत) के घोल का छिडकाव अथवा सल्फर की धुल का प्रयोग करना चाहिए | इन महीनों में थ्रिप्स का भी प्रकोप कहीं–कहीं रहता है | इसकी रोकथाम के लिए मैलाथियान के 500 मि.ली. प्रति 500 लीटर पानी में घोल का छिडकाव करना चाहिए |

लीची

मई में पौधों की 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए ताकि फलों में नियमित वृद्धि होती रहे | अन्य फलों की भाँती लीची बाग़ का रेखांकन भी मई में ही कर लेना चाहिए | रेखांकन उपरांत 3 × 3 फीट आकर के गड्ढे खोद लें व उन्हें एक महीने बाद गोबर की खाद, रासायनिक खाद व मिट्टी की बराबर मात्रा से भर लेना चाहिए | कुछ कस्मों के फल मई में पकना शुरू हो जाते हैं, उन्हें बर्रों से बचाना चाहिए |

तैयार फलों को सुबह या शाम को तोड़कर भेजने की समुचित व्यवस्था आवश्यक है | फलों के पकने के समय उनके फटने की समस्या लीची में अत्यधिक है | पौधे में नियमित सिंचाई करते रहना चाहिए अन्यथा मई व जून में अचानक वर्षा होने या सिंचाई करने से फलों के फटने की अत्यधिक समस्या आएगी | यदि फिर भी फल फटें तो पौधों पर समयानुसार जिब्रेलिक अम्ल (4 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी में) घोल का छिडकाव काफी लाभदायक रहता है | जिंक सल्फेट के 1.5 प्रतिशत घोल का छिड़का 15 दिनों के अंतराल पर फल की निंबोली अवस्था से फलों की तुडाई तक करने पर भी फलों के फटने (चटकने) की समस्या काफी कम हो जाती है | माइट के प्रकोप को कम करने हेतु डाइमिथोएट (100 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी में) का छिड़काव लाभकारी रहता है लीची में गति बांधने का कार्य जून के दुसरे पखवाड़े में करें | इसमें मिलीबग की रोकथाम के लिए थालों में 2 प्रतिशत कीटनाशी धूलि डालकर गुडाई कर दें |

नीम्बू वर्गीय पौधे

नए बाग़ लगाने हेतु मई में बाग़ का रेखांकन करके गड्ढे खोद लेने चाहिए | पौधशाला के पौधों की नियमित सिंचाई, निंदाई – गुडाई करते रहना चाहिए | बाग़ में 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए | मौसम में अधिक तापमान व बढती गर्मी के कारण फलों की बढवार रुक सकती है एवं फलों का गिरना एक प्रमुख समस्या है | अत: 2,4 डी (10 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी में) का छिडकाव करना काफी लाभदायक रहता है |

जून के अंत में खोदे गए गड्ढों को गोबर की खाद, उर्वरक और मिटटी की बराबर मात्रा मिलाकर भर देना चाहिए तथा भरने के बाद सिंचाई अवश्य करनी चाहिए, ताकि मिट्टी बैठ जाए | जल निकास नालियों को साफ़ कर देना चाहिए | फलदार पौधों में नाईट्रोजन एवं पोटाश की दूसरी मात्रा को इसी माह देना लाभदायक रहता है |

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