विडियो: सावधान ! चंद दिनों में आपकी खड़ी फसल को बर्बाद कर सकता है यह कीट

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फॉल आर्मीवर्म कीट की पहचान, जैविक एवं रासायनिक नियंत्रण

किसान रहे सावधान यह कीट देश में बहुत तेजी से फ़ैल रहा है यह लगातार फसलों को बर्बाद करते हुए आगे बढ़ रहा है | किसान समाधान इसलिए आप सभी किसानों के लिए इस कीट की पूरी जानकारी लेकर आया है सभी किसान भाई इस कीट को अच्छे से पहचानें और तुरंत उसके नियंत्रण के लिए उपाय करें | नीचे विडियो में एवं लेख में इस कीट से सम्बंधित सभी जानकारी दी गई है |

फॉल आर्मीवर्म कीट की पहचान, जैविक एवं रासायनिक नियंत्रण

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 परिचय :-

फाल आर्मी वर्म कीट का वैज्ञानिक नाम स्पोडोप्टेरा फ्यूजीपरडा है तथा यह लेपीदोप्टेरा गण एवं नाक्तुइडी परिवार से संबंधित है | यह एक बहुभक्षी कीट है , जो 80 से अधिक प्रकार की फसलों पर नुकसान करता है | मक्का सबसे पसंदीदा फसल है | इस कीट के पतंगे हवा के साथ एक रात में करीब 10 किलोमीटर तक प्रवास कर सकते है | मादा अपने जीवनकाल में करीब 1 हजार तक अंडे दे सकती है | यह कीट झुंड में आक्रमण कर पूरी फसल को कुछ ही समय में नष्ट करने की क्षमता रखते हैं |

फाल आर्मी वर्म (Fall Armyworm Insect) पहचानने के लक्षण

अंडा

अंडे गोलाकार होते है तथा इनका आकार (0.85 मि.मी. व्यास) के होते है तथा ताजा दिए हुये अण्डों का रंग हर होता है तथा अंडे फूटने से पूर्व हल्के भूरे रंग के हो जाते हैं | वे अंडे की परिपक्वता अवधि 2 – 3 दिन (20 – 30 डिग्री सेल्सियस) रहती है | अंडे आमतौर पर लगभग 150 – 200 अंडों के समुह में पत्ती की स्थ पर दो से चार परतों में दिए जाते हैं | अंडे समुह आमतौर पर मादा के पेट के धुसर – गुलाबी रंग के बालों के द्वारा ढककर सुरक्षित क्र देती है ताकि उसको प्राकृतिक एवं अप्राकृतिक कारकों  से बचाया जा सके | एक मादा अपने जीवनकाल में 1000 अंडे तक दे सकती है |

फॉल आर्मीवर्म इल्ली (लाबी)

इल्ली हल्के हरे से गहरे भूरे रंग की होती है तथा उसके पीठ पर लम्बाई में धारियाँ पायी जाती है | इल्ली की छटी अवस्था 3 – 4 से.मी. लम्बाई की होती है | इल्ली के उदर पर आठ जोड़ी पैर पाये जाते है तथा उदर के अंतिम खण्ड पर भी एक जोड़ी उदरीय पैर पाये जाते है | नवजात इल्ली के हरे शरीर पर काली रेखायें एवं धब्बे होते है | इल्ली का रंग वृद्धि के साथ भूरे रंग की हो जाती है तथा शरीर पर काली पृष्ठीय और गोलाकार रेखायें बनने लगती है | अंतिम अवस्था अपने आर्मीवर्म चरण में लगभग काली हो जाती है | बड़े लार्वा के सर पर पीले रंग का एक उलटे आकृति का चिन्ह होता है | आमतौर पर छह लार्वा अवस्था होती हैं , कभी – कभी पांच होता है |

फॉल आर्मीवर्म शंख अवस्था (प्यूपा)

न्र प्यूपा की लम्बाई 1.3 – 1.5 सेन्टीमीटर जबकि मादा प्यूपा की लम्बाई 1.6 – 1.7 से.मी. होती है तथा ए चमकदार भूरे रंग के होते हैं |

फॉल आर्मीवर्म व्यस्क नर

व्यस्क नर के शरीर की लम्बाई 1.6 से.मी. और पंखों की चौडाई 3.7 से.मी. होती है | अगर पंख पर हल्के भूरे रंग के (हल्के भूरे, भूरे, भूसे) स्केल पाये जाते है तथा उपरी किनारें पर सफेद रंग का धब्बा स्पष्ट दिखाई देता है | जिसमें तिन चौथाई भाग पर भूरा रंग और यर्क चौथाई भाग पर गहरा भूरा रंग होता है |

फॉल आर्मीवर्म व्यस्क मादा

व्यस्क मादा के शरीर की लम्बाई 1.7 से.मी. और पंखों की चौडाई 3.8 से.मी. होती है | अग्र पंख गहरे भूरे रंग के होते है तथा पश्च पंख के किनारे गहरे भूरे रंग के है |

फॉल आर्मीवर्म क्षति के लक्षण

छोटी इल्लियों के द्वारा सबसे पहले पत्तियों की निचली स्थ को खुरच कर खाया जाता है तथा बड़ी होने पर पत्तियों को किनारे से अन्दर की और कुतरकर खाती है | इल्ली की दूसरी और तीसरी अवस्था मक्का के पौधों के पोंगली में छेद कर अन्दर चली जाती है जिससे पौधों की बढवार रुक जाती है | इसके अलावा जब भुट्टे बनने लगते है तब उसमें भी छेद कर अन्दर चली जाती है इन इल्लियों की विष्ठा भी पत्तियों पर साफ दिखाई देती है तथा भुट्टे को नुकसान पहुंचाती है | पौधों की पत्तियां खुलने पर उनके ऊपर क्रम से छेद दिखाई देते हैं | यदि 0.2 – 0.8 इल्ली प्रति पौधा पायी जाती है तो वह फसल की लगभग 5 – 20 प्रतिशत उत्पादन का कर सकती है |

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फॉल आर्मीवर्म जीवन चक्र (Fall Armyworm Life Cycle) :-

व्यस्क मादा द्वारा मक्के की निचली पत्तियों की निचली स्थ पर 100 – 300 अंडे समूह में दिए जाते हैं, अंडाकाल आमतौर पर 3 – 5 दिन का होता है | पुर्न विकसित इल्ली के द्वारा मक्के पौधे की पेंगली के वृद्धि भाग को नुकसान पहुंचाया जाता है , जिसके कारण पौधे की वृद्धि मर जाती है | जब इल्लियों की संख्या ज्यादा हो तब वह एक दुसरे को खा जाती है और सामान्यतौर पर एक पौधे पर 1 से 2 इल्लियाँ ही बचती है |

सामान्यतौर पर इल्ली की अवधि 14 – 29 दिन की होती है | बड़ी इल्लियाँ रात्रि होती है | इल्लियाँ छ: अवस्थाओं से गुजर कर प्यूपा बनाती है | प्यूपा अवस्था अधिकतर जमीन में पायी जाती है तथा कभी – कभी भुट्टों के अन्दर भी पाया जा सकता है | प्यूपा आवडी 8 से 13 दिनों की होती है | व्यस्क राट में निकालते है तथा लगभग 12 – 14 दिनों तक जीवित रहते है |

फॉल आर्मीवर्म समन्वित प्रबंधन :-

निगरानी :-
  • मक्का में इस कीट की निगरानी के लिए फेरोमोन ट्रैप 5 प्रति एकड़ इ दर से फसल की ऊँचाई से ऊपर लकड़ी की सहयता से लगावें | फेरोमोन ट्रैप वहाँ पर भी लगाये जहाँ पर आक्रमण संभावित हो |
  • स्काउटिंग :- इस कीट के स्काउटिंग मक्का बीज के अंकुरण के साथ ही प्रारम्भ करें |
  • अंकुरण से प्रारंभिक पोंगली अवस्था पर (अंकुरण के 3 – 4 सप्ताह बाद) 5 प्रतिशत पौधे में नुकसान हो तो नियंत्रण उपाय करें |
  • मध्य पोंगली अवस्था से देर पोंगली अवस्था तक (अंकुरण के 5 – 7 सप्ताह बाद), यदि मध्य पोंगली अवस्था में 10 प्रतिशत तक ताजा नुकसान दिखे या 20 प्रतिशत नुकसान देर पोंगली अवस्था में दिखे तो नियंत्रण की कार्यवाही करना चाहिए |
  • भुट्टे में रेशमी बाल तथा पश्च बाल अवस्था (सिल्किंग स्टेज) पर – किसी भी कीटनाशक का छिड़काव न करें | 10 प्रतिशत से ज्यादा बालियों में नुकसान हो तो छिड़काव किया जा सकता है |

फॉल आर्मीवर्म शस्य उपाय

  • फसल की बुआई से पूर्व गहरी जुताई करें ताकि कीट की जमीन में दबी शंखी अवस्था (प्यूपा) ऊपर आ जाए जिससे उसके प्राकृतिक शत्रु द्वारा खा लिया जाए या धूप से मर जाए |
  • खेत में बुआई से पूर्व 250 किलोमीटर नीम की खली प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करें |
  • समय पर बुवाई करें |
  • मक्का फसल के साथ अंर्तवर्तीय फसलों के रूप में मका + अरहर / चना / मुंग स्थानीय दशाओं को ध्यान में रखते हुये करें |
  • फसल के अंकुरण के 30 दिनों के भीतर पक्षियों के बैठने के लिए अंग्रेजी के ‘टी’ आकृति के बर्ड पर्च 10 प्रति एकड़ की दर से जमीन में खड़े करे |
  • मक्का की मुख्य फसल के चरों तरफ नेपियर की फसल “ट्रैप क्राप“ के रूप में लगावें | जैसे ही इस नेपियर फसल पर इस कीट का आक्रमण प्रारम्भ हो तब एन.एस.के.ई. (नीम की निम्बोली के बीजों का सत) 50 मि.ली. या एजा डिरेकटीन 1500 पी.पी.एम. की 3 मि.ली. मात्रा प्रति लीटर की दर से छिड़काव करें |खेतों को साफ – सुथरा रखें तथा उर्वरकों का संतुलित मात्रा में उपयोग करें |
  • मक्का की उन संकर किस्मों का उपयोग करें जिनके भुट्टे का कवच तंग हो जिसके कारण कीट के द्वारा कम हानि हो |
  • फसल बुवाई के 30 दिनों बाद प्रत्येक पौधों की पेंगली (पोता) में रेत एवं चुने को 6:1 के नुपात में मिश्रण कर डाले |
  • कीट के अंडगुच्छों को हाथ से एकत्रित कर नष्ट करें तथा छोटी – छोटी इल्लियों को एकत्रित कर दबाकर या मिटटी के तेल मिश्रित पानी में डुबो कर नष्ट करें |
  • जैसे ही ज्ञात हो कि फसल में इस कीट का आक्रमण प्रारम्भ हो गया है | तब मक्के के पौधे की पोंगली (पोटा) में सुखी रेट थोड़ी – थोड़ी मात्रा में डाले |
  • इस कीट के लिए फ्यूजीपरडा फेरोमों ट्रैप 15 प्रति एकड़ की दर से खेत में स्थापित कर न्र शलभ (फुंदीयों) को बड़े पैमाने पर फंसा कर नष्ट करें |
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फॉल आर्मीवर्म Fall Armyworm Organic Control जैव नियंत्रण :-

  1. प्राकृतिक शत्रुओं के निवास स्थान को नष्ट न करें बल्कि वहां पर अंर्तवर्तीय शस्य फसलों के माध्यम से फसल की विविधताओं को दलहनी एवं फूलों वाली फसलें लगाकर प्राकृतिक शत्रुओं को भोजन उपलब्ध कराकर उनकी जनसंख्या वृद्धि में मदद करें |
  2. तिन सप्ताह के अंतराल पर या शलभ (मोथ) फेरोमोन ट्रैप आने पर ट्राईकोग्रामा प्रीटीओसम या टेलिनोमस रेमुस के 50,000 अंडे प्रति एकड़ की दर से खेतों में छोड़ें |
  3. मक्का की फसल के 5 प्रतिशत हानि अंकुरण से प्रारंभिक पोंगली अवस्था पर होना पर जैव कीटनाशकों कवक और बैक्टीरिया का उपयोग करें |
  4. फसल बुवाई के 15 – 20 दिनों के बाद , इस कीट में बीमारी पैदा करने वाली फफूंद मेटाराईजियम एनिसोप्लाएई की 5 ग्राम मात्रा या मेथेरिजियम रिलेय की 3 ग्राम मात्र प्रति लीटर की दर से घोल बनाकर पौधे के पोंगली में डाले |आवस्य्ह्कता होने पर 10 दिनों के अंतराल पर एक से दो छिड़काव दोहरा सकते हैं |
  5. इस कीट के नियंत्रण हेतु बेसिलस थुरिंएजनसीस (बी.टी.) की 2 ग्राम मात्रा प्रति लीटर या 400 ग्राम मात्रा / एकड़ की दर से भी उपयोग किया जा सकता है |

फॉल आर्मीवर्म Fall Armyworm Chemical Control रासायनिक नियंत्रण

बीजोपचार :- अभी कोई भी रासायनिक कीटनाशक अनुशंसित नहीं किया गया है |

फसल की प्रथम अवस्था (अंकुरण से प्रारंभिक पोंगली अवस्था तक) पर :- फसल की इस अवस्था पर एन.एस.के.ई. की 5 प्रतिशत या एजाडिरेकटीन 1500 पी.पी.एम. की 5 मि.ली. मात्रा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर के छिड़काव 5 प्रतिशत  हानि होने पर करने से इल्ली एवं अंड अवस्था को काफी कम किया जा सकता है |

फसल की दिवतीय अवस्था (मध्य पोंगली अवस्था से देर पोंगली अवस्था तक) पर :- यदि फसल को 10 से 20 प्रतिशत की हानि हो तो इल्ली की दूसरी और तीसरी अवस्था को नियंत्रण करने के लिए स्पाईनिटोरम 11.7 प्रतिशत एस.सी. की 0.5 ,मि.मी. ईमाँमेकटिन बेंजोएट 0.4 ग्राम या स्पाईनोसैड 0.3 मि.ली. मात्रा या थाईमिथोक्जाम 12.6 + लेम्दा – साईहेलोथ्रीन 6.5 की 0.5 मि.ली. या क्लोरएंट्रानिलिप्रोल 18.5 एस.सी. 0.4 मि.ली. / लीटर पानी में घोल बनाकर के छिड़काव करें |

विष चुगा :- इस कीट की बड़ी इल्ली को नियन्त्रण करने के लिए 10 किलो चावल की भूसी + 2 किलो गुड के मिश्रण को 2 – 3 लीटर पानी के साथ 24 घंटे के लिए किण्वन में रखे तथा खेत में उपयोग करने के आधे घंटे पूर्व 100 ग्राम थायोडिकार्ब अच्छी तरह मिलावें तथा इस तरह तैयार विष चुगे की थोड़ी – थोड़ी मात्रा मक्के के पौधे के पेंगली में डालने की अनुशंसा की जाती है |

फसल की तृतीय अवस्था (अंकुरण के 8 सप्ताह से लेकर पश्च माजर अवस्था तक) पर :- फसल की इस अवस्था पर कीट को रासायनिक नियंत्रण करना आर्थिक लाभदायक नहीं होता है | अत: इल्लियों को हाथ से पकड़कर नष्ट करने की सलाह दी जाती है |

नोट:- उपरोक्त सभी छिड़काव सुबह जल्दी या शाम के समय में ही करना चाहिए |

लेखक

डॉ.जी.एस.चुण्डावत

वैज्ञानिक, पौध सरंक्षण मंदसौर

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