कम लागत में मेंहदी की खेती से लाखों कमायें

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मेंहदी की खेती

मेंहदी भारत से निर्यात की जाने वाली एक महत्वपूर्ण रजक फसल हैं | इसकी खेती मुख्यत: पत्तियों के लिए की जाती है, जिसमें ‘लासोंन’ नामक रंजक यौगिक होता है जो बालों एवं शरीर को रंगने के लिए उपयोग किया जाता है | इसके फूलों से निचोड़े गये तेल का उपयोग इत्र उधोग में मेंहदी के ओटो के स्त्रोत के रूप में किया जाता है |

राजस्थान में मेंहदी की खेती 41,450 हे. (2010 – 11) क्षेत्र में की जाती है, जिसमें से अकेले पाली जिले में लगभग 95 प्रतिशत (39,400 हे.) क्षेत्र आता है | पाली जिले की सोजत, मारवाड़ जंक्शन एवं रायपुर तहसीलों में मेंहदी का 90 प्रतिशत क्षेत्रफल स्थित है और यहाँ पर

 सर्वोतम गुणवत्ता की विश्व प्रसिद्ध ‘सोजत की मेंहदी’ का उत्पादन होता है |

पशिचमी राजस्थान की गरम एवं शुष्क जलवायु में वर्ष आधारित खरीफ फसलें जैसे – बाजरा, ज्वार, तिल, मूंग एवं ग्वार इत्यादि प्राय: मानसून की अनिशिचत्ता से असफल हो जाती है | इन परिस्थितियों में मेंहदी की खेती (इसकी सूखा सहने की क्षमता एवं गहरे जड़ तंत्र के कारण) किसानों को कुछ निश्चित आय देती है | एक बार स्थापित हो जाने पर इसकी झाड़ी 20 – 25 वर्षों तक टीके रहती है |

किसानों द्वारा इसकी खेती ज्यादातर बिना उर्वरक / खाद प्रयोग एवं न्यूनतम प्रबंधन के साथ वर्षा आधारित फसल के रूप में की जाती है | मेंहदी एक बहुराष्ट्रीय झाड़ी होने के कारण लघु चक्रीय वानिकी रोपण के रूप में एक अच्छा विकल्प देती है | इसके साथ ही यह अपने पर्ण समूह / अवशेषों से न केवल मृदा आवरण को निरंतर बनाएं रखती है बल्कि सीमान्त शुष्क क्षेत्रों में स्वच्छ पर्यावरण निर्माण में भी सहयोग करती है | मेंहदी आधारित कृषि वानिकी पद्धति एक अच्छा सुखा रोधी कौशल हो सकता है जो की किसानों को जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का प्रतिरोध करने में भी मदद कर सकती है |

जलवायु

वैसे तो मेंहदी विभिन्न तरह की जलवायु में उगाई जा सकती है लेकिन इसका पौधा शुष्क से उष्णकटिबंधीय और सामान्य गर्म जलवायु में अच्छी वृद्धि करता है | इसे संयत वर्षा लगभग 400 मी.मी. एवं वर्षा ऋतू में सक्रिय वृद्धि अवधि के दौरान लगभग 30 – 40 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान की, तथा अच्छी गुणवत्ता की पत्तियों की पैदावार के लिए गर्म, शुष्क एवं खुले मौसम की आवश्यकता होती है |

गुणवत्तापूर्ण पत्तियों की पैदावार में जलवायु का प्रबल योगदान होता है | वर्षा को वितरण बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि फसल की ठीक से पकाई एवं पत्तियों में उच्च रंजन अभिव्यकित के लिये मध्यवर्ती सूखे प्रकाशीय दिनों के साथ शीत रात्रियों की आवश्यकता होती है | फसल की कटाई (सितम्बर – अक्तूबर) अवस्था या कटाई के तुरंत बाद वर्षा उत्पाद को खराब कर देती है और बाजार में भाव कम मिलते है |

किस्मों का चयन

अच्छी किस्म चुने | चौड़ी पत्ती वाली देशी किस्म लगाये जिनकी टहनियां पतली व सीधी ऊपर की ओर खड़ी होती है | मुरालिया छोटी पत्ती वाली व झाड़ीनुमा फैलने वाले पौधे नहीं लगायें | इनकी कटाई कांटे व मोटी टहनियों के कारण ज्यादा कठिन होती है तथा पत्ती : तना अनुपात कम होने से पैदावार कम होती है | काजरी में अधिक पैदावार देने वाली एस 8, एस 22 खेडब्रहा व धन्धुका किस्मों का चयन किया गया है |

बीज उत्पादन

स्वस्थ, चौड़ी पत्ती वाले व अधिक पैदावार देने वाले एक समान पौधों से बीज एकत्रित करें | बीज पकने पर डोडे तोड़े | फसल कटाई से पूर्व चयनित पौधे से परिपक्व डोडे (फल) तोड़ कर धूप में सुखायें और बाद में कूटकर बीज निकाल लें | छलनी से मोटे बीज अलग करके प्लास्टिक की थैलियों में भंडारण करें | जल्दी फूल व अधिक बीज पैदा करने वाले पौधे नहीं चुने | एसे पौधों में पोषक तत्वों का उपयोग पत्ती उत्पादन में कम होता है |

पौध तैयार करना

पौधशाला मार्च माह के प्रारम्भ में लगाएं जब अधिकतम तापमान 25 – 30 डिग्री सेल्सियस के बीच होता है | 10 मीटर लम्बी व 1.5 मीटर चौड़ी 8 – 10 क्यारियां तैयार करके गोबर का खाद मिला दें | बोने से पहले जुट के बोरे में बीज को एक से दो दिन तक भिगोकर रखें व पानी बदलते रहें | केवल भिगोये नहीं, बहते पानी में बीज को धोयें भी | बहते पानी में में विषैले (अंकुरण कम करने  वाले) तत्व बह कर नष्ट हो जाते हैं | बीज को बिना भिगोयें नहीं बोये , केवल एक बार भिगोकर नहीं रखें | इसमें अंकुरण कम होता है |

एक बार भिगोने से कवक के संक्रमण से बीज की अंकुरण क्षमता प्रभावित होती है अत: पानी बदलते रहें | नमक के 3 प्रतिशत घोल में 24 घण्टे तक भिगोने से अंकुरण 5 दिन में हो जाता है | नामक के सांद्रता 3 प्रतिशत से अधिक न हो | नमक की सांद्रता अधिक होने से बीज का अंकुरण दुष्प्रभावित होता है | एक हैक्टेयर खेत के लिए 5 – 6 किलोग्राम बीज महीन बालू रेट से मिलाकरइन क्यारियों में बोयें | बीज असमान न बोयें | इससे बढ़कर एक समान नहीं होती और उखाड़ते समय जड़ों को नुकसान होगा | खरपतवार निकालतें रहें व सप्ताह में 2 से 3 बार आवश्यकतानुसार सिंचाई करें | पानी की कमी न होने दें | पानी की कमी से पौधे मर सकते हैं |

मृदा 

बलुई दोमट व गहरी मिटटी वाले खेत उपयुक्त रहते हैं | इसमें नमी धारण की क्षमता रहती है | जड़ें गहराई तक जाती हैं | जन्हा तक संभव हो बलुई मिटटी में खेती नहीं करें जन्हा पानी संग्रहण नहीं हो पाता है, पौधों के मरने की संभावना रहती है | सामान्यतया 7.5 से 8.5 क्षारण (पी.एच.) की मिटटी उपयुक्त रहती है | यदि पी.एच. मन 8.5 या अधिक है तो मिटटी में 2.5 टन प्रति हेक्टेयर की दर जिप्सम डालें | जिप्सम को हल की कूंडों में मिटटी में मिला दें | यह काम वर्षा से पहले करें ताकि यह मिटटी में अधिक मात्रा में मौजूद सोडियम तत्व को प्रतिस्थपित कर उसके दुष्प्रभाव को कम कर दें |

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खेत की तैयारी

जिप्सम पौधों की रोपाई के समय नहीं डालें |  वर्ष से पहले ही डालें ताकि पहली वर्षा में मिटटी में मिल जाए |जिप्सम नहीं देने से सोडियम तत्व की अधिकता से नए पौधे मर सकते है अत: जिप्सम आशय दें जिप्सम फसल लगाते समय देने से लाभकारी नहीं रहता | वर्षा ऋतू से पहले खेत की मिटटी पलटने वाले हल से 15 – 20 सेन्टीमीटर गहरी जुताई करें  एक गहरी जुताई व दो हैरोइंग कर लें | इससे वर्ष जल का संचय खेत में होता है |

हल्की जुताई न करें व खेत में खरपतवार व अन्य फसलों के ठूंठे नहीं रहने दें | इससे दीमक का प्रकोप बढ़ता है एवं हानिकारक कीट नहीं मरते हैं | पहली वर्षा के साथ खेत में 45 या 60 सेन्टीमीटर की दुरी पर 30 सेन्टीमीटर चौड़ी व 15 – 20 सेन्टीमीटर गहरी कूंड बना लें | जब कूंड बनायें तो खेत में 25 किलोग्राम क्लोरोपाइरिफास चूर्ण मिला दें | क्लोरोपाइरिफास की निर्धारित मात्रा से अधिक नहीं डालें व हवा में बुरकाव न करें | ऊर कर मिटटी में मिला दें |

बुरकाव करने से कीटनाशी हवा में उड़ जाएगा व मिटटी में नहीं मिल पायेगा | खेत के चरों तरफ मेड बनायें व कूड़ों में वर्षा जल का पानी संग्रहित होने दें | कूंडों में नमी लम्बे समय तक बनी रहती है |मेड 2 से 3 फुट ऊँची हो व कूंड ढलान की विपरीत दिशा में हो | कूंड ढलान की दिशा के समांतर नहीं बनाएं | इससे वर्षा का जल बहकर खेत से बाहर बेकार चला जाता है | इ पोषक तत्व भी बहकर नष्ट हो जाते हैं |

पौधा रोपण

मेंहदी का पौधा रोपण जुलाई – अगस्त में मानसून की अच्छी बरसात में करें | पौधशाला से पौधे जड़ों सहित उखाड़ें | पौधों को जड़ों की तरफ से 7 – 8 सेन्टीमीटर जड़ छोड़कर कांट लें व ऊपर ताने व पत्तियों वाले हिस्से को 10 – 15 सेन्टीमीटर छोड़कर काट लें | बिना जड़ व तना काटे पौध नहीं लगाएं | बिना जड़ – तना कटा पौधा पनपने में समय अधिक लेता है | कुंडों में पंक्ति से पंक्ति की दुरी 45 सेन्टीमीटर व पौधे की दुरी 30 सेन्टीमीटर रखें या पंक्ति से पंक्ति की दुरी 60 सेन्टीमीटर व पौधे से पौधे की दुरी 25 सेन्टीमीटर रखें, दोनों में ही पौध संख्या बराबर रहेगी | जहां तक संभव हो पंक्ति से पंक्ति की दुरी 30 सेन्टीमीटर नहीं रखें | अन्त:कर्षण में मजदूरी का खर्चा अधिक पड़ता है |

पौधरोपण हल द्वारा बनाई कुंडों में करें | हल की हलवानी से 7 – 8 सेन्टीमीटर गहरा छेद बनाएं | एक छेद में एक पौधा रोपित करें, यदि पौधा कमजोर हों तो एक छेद में दो रोपें | रोपाई से पहले पौधों को क्लोरोपाइरिफास से उपचारित करें | क्लोरोपाइरिफास के घोल में डुबोये बिना पौधरोपण नहीं करें | क्लोरोपाइरिफास नहीं देने से दीमक का प्रकोप हो सकता है | पौध रोपाई के बाद छेद लकड़ी / पैर से चारों ओर से दबाकर अच्छी तरह बंद करें \ छेद अच्छी तरह से बंद नहीं करने पर पौधे की जड़ मिटटी नहीं पकड़ पायेगी व पौधा मर सकता है |

खाद एवं उर्वरक

रोपाई से पहले अन्तिम जुताई के समय 5 टन गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर दें | गोबर का खाद एक समान फैलाकर हैरो से मिटटी में मिला दें | कच्चा या कम सदा खाद नहीं डालें | कच्चा या कम सड़ा खाद डालने से दीमक का प्रकोप बढ़ता है | गोबर का खाद देने से 13 प्रतिशत अधिक उपज होती है | प्रथम वर्ष में 40 किलोग्राम फास्फोरस डाई – अमोनिया – फास्फेट के रूप में दें | इसे आखिरी जुताई के समय कुडों में देवे | छिटक कर न देवें | इससे फास्फोरस मिटटी में नहीं मिल पायेगा |नत्रजन प्रथम वार्ह्स में 40 किलोग्राम की दर से देवें |

जब वर्षा हो रही हो या खेत में पर्याप्त नमी हो तो पौधों से दूर नहीं डालें | पत्तियां जल सकती है व दूर डालने से पौधों को न मिल कर पास में मौजूद अन्य पौधों को मिलेगा | छिटक कर न देंवे | पौधो को एक समान खाद नहीं मिलता है | मेंहदी के पुराने खेतों में नत्रजन व फास्फोरस की मात्रा 60 एवं 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से दें | फास्फोरस पहली वर्षा के साथ हल की कूंड के पीछे डालें | 45 से 60 सेन्टीमीटर पंक्ति की दुरी में बैलों से हल चलाया जा सकता है |

डी. ए.पी.को भूमि की ऊपरी साथ पर नहीं डालें इसकी बजाय हल के साथ कूंडों में ही डालें | मिटटी में न मिलने पर पौधा फास्फोरस का समुचित प्रयोग नहीं कर पाता | इसके देने से 20 प्रतिशत अधिक उपज मिलती है | आधी नत्रजन पहली वर्षा के समय व शेष दो बार एक – एक महीने के अन्तराल से दें | नत्रजन सुखी भूमि या कम नमी में न डालें | इससे नत्रजन वाष्पीकरण प्रक्रिया से नष्ट हो जाता है |

खरपतवार नियंत्रण व अन्य : कर्षण

मेंहदी रोपाई के बाद जब पौध स्तापित हो जाए तो कुदाल या खुरपी से निराई करें व खरपतवार निकाल दें | नए पौधों को नहीं हिलाएं | पौधा हिलने से जड़ मिटटी में पकड़ नहीं कर पाती | अट्राजीन 1 किलोग्राम (सक्रिय तत्व) 600 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने से खरपतवारों की निजत मिल जाता है |

खरपतवार का छिड़काव सुखी मिटटी में न करें व खरपतवार बड़े होने का इन्तजार न करें | खरपतवारनाशी सूखी मिटटी में प्रभावी नहीं होता | खरपतवार बड़े हो जाने पर पूरी तरह नहीं मरते | स्थापित मेंहदी में पहली वर्षा के तत्काल पश्चात् अट्राजीन 1 किलोग्राम (सक्रिय तत्व) प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें | फिर ट्रैक्टर चालित हल से पंक्तियों (पंक्ति से पंक्ति 60 से.मी.) के बीच गहरी जुताई करें |

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ट्रैक्टर चालित कूंड बनाने वाली फाल से 45 दिन की फसल होने तक दो जुताई करें ताकि मृदा में जल संग्रह हो | पंक्ति से पंक्ति 60 सेन्टीमीटर व जुताई द्वारा 30 सेन्टीमीटर दुरी पर बोई फसल से 27 प्रतिशत अधिक उपज होती है | 30 सेन्टीमीटर की दुरी में बैल द्वारा या ट्रैक्टर द्वारा अन्त:कर्षण नहीं करें | पौधा उखड़ने व टहनियों के टूटने की संभावना रहती है | जबकि 60 सेन्टीमीटर दूर पंक्तियों के बीच यंत्र चालित निराई – गुडाई आसानी से होती है |

पंक्तिबद्ध अन्त: खेती

खेत में मेंहद की पंक्तियों के बीच उचित दुरी रखकर छोटे व सीमान्त कृषक अन्त:खेती, स्ट्रिप (पट्टी) या एली फसल पद्धति से एक ही खेत में कई फसल ले सकते है | मेंहदी की कतार से कतार की दुरी 1.2 मीटर और इसके बीच में एक या दो पंक्ति में मुंग व ग्वार की फसल लेवें | ज्वार, तिल या बाजरा नहीं लगाएं | ए फसल लेने से दुसरे वर्ष नत्रजन की मात्रा कम देनी पड़ेगी |

पट्टी पद्धति में एक पट्टी 60 से.मी. की दूरी पर मेंहदी की चार पंक्तियाँ लगाएं व दूसरी स्ट्रिप में ग्वार या मूंग 45 – 60 से.मी. की दुरी पर कतार में लगाएं | पट्टी पद्धति में हल द्वारा निराई सम्भव है | अन्त:खेती  पद्धति में दुसरे वर्ष नत्रजन की पूरी मात्रा नहीं देवें | | मृदा परिक्षण के आधार पर नत्रजन देवें अन्यथा दलहन फसल द्वारा संग्रहित नत्रजन का सदुपयोग नहीं होगा |

कीट एवं व्याधि नियंत्रण

बारानी खेती में दीमक से बचाव के लिए क्लोरोपाइरीफास का अवश्य प्रयोग करें | क्लोरोपाइरीफास की निर्धारित मात्रा को पानी में घोल कर पौधों के आस – पास मिटटी में अच्छी तरह छिड़काव करें | छिड़काव सुखी मिटटी में नहीं करें | इससे दावा का प्रभाव कम होता है | खरपतवार खड़ा नहीं रहने देवें व घास इत्यादी के ठूँठ न रहने दें | इनमें दीमक व अन्य कीट पनपते हैं | अरण्डी की अर्धकुंडलक (सेमीलूपर) लत नामक कीट के नियंत्रण के लिये 2 मिली लीटर क्यूनालफास को एक लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें | आस – पास कपास, अरण्डी के खेत न हों क्योंकि इनमें यह कीट पनपता हैं | छिड़काव में विलम्ब न करें |

विलम्ब से कीट अधिक बढ़ेगें तुरंत छिड़काव करें व दूसरा छिड़काव 10 – 15 दिन बाद करें | मेंहदी की जैविक खेती करने वाले अरण्डी के सेमीलूपर के नियंत्रण के लिए प्रकाशपाश का उपयोग कर सकते हैं, नीम की नीम्बोली के 4 प्रतिशत अर्क का लट की शुरूआती अवस्था में छिड़काव करें, पक्षियों के बैठने के लिये प्रति हेक्टयर 25 डंडे खेत में लगायें , शुरूआती अवस्था में लट को हाथ से पकड़कर भी नष्ट किया जा सकता है |

कटाई, सुखाई, मढ़ाई  

फसल कटाई सितम्बर के आखरी सप्ताह या अक्तूबर के पहले सप्ताह में करें | पत्तियों जब पुर्न परिपक्व हों और नीचे वाले पत्तियां झड़ने लगे इससे पहले ही फसल काटना शुरू कर दें | पतियों के पूर्णतया सूखने की प्रतीक्षा नहीं करें | इससे सुखी पत्तियां झड कर नष्ट हो जाएंगी | कच्ची पतियों वाली मेंहदी न काटे | इनका बाजार में मूल्य कम मिलेगा | कटी फसल को शीघ्रतिशीघ्र मढ़ाई क्षेत्र में एकत्रित करें |

फसल की कटाई पहले वर्ष भूमि की साथ से 4 – 5 सेन्टीमीटर व बाद के वर्षों में 8 – 10 सेन्टीमीटर ऊपर से करें | कटी फसल को खेत में नहीं छोड़ें | यदि वर्षा हो गयी तो मेंहदी खराब हो जायेगी | सम्भव हो तो बड़े तिरपाल से मेंहदी की कटी फसल को ढंक दें | जन्हा तक हो सके कटी फसल को छाया व हल्की धूप में सुखाएं | हर दुसरे दिन कम से कम दो बार पौधों को पलटते रहें | एक स्थान पर नहीं रहने दें, पलटें अवश्य | नहीं पलटने से पौधों को पलटते रहें | एक स्थान पर नहीं रहने दें, पलटें अवश्य | नहीं पलटने से पौधों द्वारा छोड़ी नमी से पत्ती की गुणवत्ता में कमी आती है | मढ़ाई डंडों से पिट कर करें | मढ़ाई का स्थान साफ – सुथरा व हो सके तो पक्का होना चाहिये |

भंडारण

जब पत्तियां अच्छी तरह से सुख जायें तो डंडों से पीटकर पत्तियां अलग कर लें | टहनियां व बीज / डोडे पत्तियों के साथ न रहने दें | इससे मेंहदी पत्ती की गुणवत्ता कम हो जायेगी पत्तियों के साथ मिटटी नहीं आणि चाहिए | बाजार मूल्य कम मिलेगा | कटाई, मढ़ाई के बाद मेंहदी पत्तियों को जूट के बोरों में भंडारण करें | उन्हें भण्डारण गृह में एक – दुसरे के ऊपर इस तरह रखें की हवा का आवागमन उचित रहें | बाहर धूप या खुले में न रखें | वर्षा होने या ज्यादा धूप होने से मेंहदी की गुणवत्ता कम हो जायेगी |

उपज एवं आर्थिक लाभ

सामान्यतया किसान के यंहा एक हैक्टेयर में मेंहदी की 600 से 1000 किलोग्राम सुखी पत्ती पैदा होती है | उन्नत कृषि विधियाँ अपनाकर 1500 से 2000 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उपज ली जा सकती है | प्रचलित विधि में मजदूरी का खर्च अधिक होता है | बैल या ट्रैक्टर चालित हल से (45 से.मी. या 60 से.मी.) पंक्तियों में अन्त:कर्षण द्वारा मजदूरी व्यय में कमी की जा सकती है | वर्तमान शुद्ध लाभ रूपये 8000 – 10000 प्रति हेक्टेयर से बढाकर रूपये 14000 – 18000 तक किया जा सकता है बशर्ते उन्नत कृषि विधियाँ अपनाएं |

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