अश्वगंधा की खेती

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अश्वगंधा की खेती 

उपयोग 

टॉनिक के रूप में, अनिद्रा, रक्त चाप, मूर्छा चक्कर,सिरदर्द, तंत्रिका विकास,हृदय रोग, रक्त कोलेस्ट्रॉल कम करने में, गठिया को नष्ट करने में बच्चों के सूखा रोग में, क्षय नाशक, रोग प्रतिरोधक क्षमताबढ़ाने में, चर्म रोग, फेफड़ों के रोग में, अल्सर तथा मंदाग्नि के उपचार में, जोड़ों की सूजन तथा अस्थि क्षय के उपचार में, कमर दर्द, कूल्हे का दर्द दूर करने में, रूकी हुई पेशाब को ठीक से उतारने में।

लगाने कि दूरी  

कतार व पौधे में अंतर : 50-60 सें.मी.

उन्नत किस्में

पेषिता, जे.ए. 20 , जे.ए. 134

मिट्टी एवं जलवायु     

उष्ण से समशीतोष्ण, औसत तापमान 20-24 डिग्री सें. तथा वर्षा 100 से.मी. वार्षिक। बलुई मिट्टी। भूमि का जल निकास अच्छा हो एवं पी.एच. मान 6-7 तक

उपयोगी भाग एवं उपज  

जड़, हरी पत्तियाँ। 6-8 क्विं. सूखी जड़े एवं बीज 1-2 क्विं./हे.।

बीजदर 

8- कि.ग्रा. बीज (सीधी बुआई) 5-7 कि.ग्रा. बीज (बिचड़ा तैयार करने में)

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लगाने का समय

नर्सरी में बुआई : जून खेत में रोपाई : अगस्त –सितम्बर

सिंचाई 

शीत ऋतु में 3-5 बार सिंचाई करें ।

खाद एवं उर्वरक 

खाद व उर्वरक-सड़ी गोबर की खाद 15-20 टन/ प्रति हे.। बोनी के समय नेत्रजन 25 कि.ग्रा., स्फूर 30 कि.ग्रा. एवं पोटाश 30 कि.गा. प्रति हे.। १२.२५ कि.ग्रा. नेत्रजन पहली सिंचाई एवं 12.5 कि.ग्रा. दूसरी सिंचाइ के समय

तुड़ाई / खुदाई

पौधें की पत्तियां पीली और फल लाल होने पर पौधें को जड़ से उखाड़कर एवं जड़ों को काट कर सूखने के लिए दें

लागत 

23,000/- रुपये अनुमानित प्रति हेक्टेयर

शुद्ध लाभ प्रति हे. (रू) 

1,22,000/- रुपये अनुमानित प्रति हेक्टेयर

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