किसान इस तरह करें धान की फसल में लगने वाले रोग की पहचान एवं उनका नियंत्रण

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dhaan ki fasal me rog

धान की फसल में रोग की पहचान एवं नियंत्रण

अभी देश में खरीफ सीजन की मुख्य फसल धान खेत में लगी हुई है | ऐसे में अभी किसानों द्वारा धान की फसल में निराई-गुड़ाई के बाद दूसरी बार खाद दी जा रही होगी | कई राज्यों में धान की फसल में अब फूल आने लगे हैं | धान की इस अवस्था में कई प्रकार के रोग लगने की सम्भावना रहती है | कुछ रोग तो ज्यादा यूरिया के प्रयोग के कारण एवं जिंक जैसे पोषक तत्वों की कमी के कारण भी लग सकते हैं | इस समय किसानों को धान की फसल की लगातार निगरानी करते रहना चाहिए ताकि धान की फसल को समय पर कीट एवं रोगों से बचाया जा सकें |

धान की खड़ी फसल में मुख्यतः पत्ती झुलसा रोग, ब्लास्ट या झोंका रोग, जीवाणु पर्ण अंगमारी रोग, गुटन झुलसा रोग, खैरा रोग या बकानी जैसे रोग लग सकते हैं | किसान धान के रोगों की पहचान एवं उनका नियंत्रण कैसे करें इसकी जानकारी नीचे दी गई है |

पत्ती का झुलसा रोग :-

पौधे की छोटी अवस्था से लेकर परिपक्व अवस्था तक यह रोग कभी भी हो सकता है | पत्तियों में किनारे उपरी भाग से शुरू होकर मध्य भाग तक सूखने लगते हैं | सूखे पत्ते के साथ–साथ राख के रंग के चकत्ते भी दिखाई देते हैं | इस रोग से बालियां दानारहित रह जाती है |

पत्ती का झुलसा रोग का नियंत्रण

किसान इस रोग के नियंत्रण के लिए 74 ग्राम एग्रीमाइसीन–100 और 500 ग्राम काँपर आँक्सीक्लोराइड (फाइटोलान /ब्लाइटाक्स–50 /क्यूप्राविट का 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर की दर से 3–4 बार 10 दिनों के अंतराल से छिड़काव करें |

  • ट्रेप्टोमाइसीन / एग्रीमाइसीन से बीज को उपचारित करके बोएं |
  • इस रोग के लगने पर नाइट्रोजन की मात्रा कम कर देनी चाहिए |

ब्लास्ट या झोंका रोग :-

यह रोग फफूंद से फैलता है | पौधे के सभी भाग इस रोग से प्रभावित होते हैं | इस रोग में पतियों पर भूरे धब्बे, कत्थई रंग एवं बीच वाला भाग राख के रंग का हो जाता है | फलस्वरूप बाली आधार से मुड़कर लटक जाती है एवं दाने का भराव भी पूरा नहीं हो पता है |

झोंका रोग या ब्लास्ट तोग का नियंत्रण

ब्लास्ट या झोंका रोग जुलाई के प्रथम पखवाड़े में रोपाई पूरी कर लें | देर से रोपाई करने पर झोंका रोग लगने की आशंका बढ़ जाती है | बीज का कार्बेन्डाजिम एवं थीरम (1:1) 3 ग्राम प्रति किलोग्राम या फंगोरिन 6 ग्राम प्रति किलोग्राम की दर से बीजोपचार करना चाहिए |

रोग के नियंत्रण के लिए कार्बेन्डाजिम (50 प्रतिशत डब्ल्यू.पी.) 500 ग्राम या ट्राइसायक्लेजोल या एडीफेनफाँस (50 प्रतिशत ई.सी.) 500 मि.ली. या हेक्साकोनाजोल (50 प्रतिशत ई.सी.) 1.0 लीटर या मैंकोजेब (75 प्रतिशत डब्ल्यू.पी.) 2.0 किलोग्राम या जिनेब (75 प्रतिशत डब्ल्यू.पी.) 2.0 किलोग्राम या कार्बेन्डाजिम (12 प्रतिशत) +मैंकोजेब (63 प्रतिशत डब्ल्यू.पी.) 750 ग्राम या आइसोप्रोथपलीन (40 प्रतिशत ई.सी.) 750 मि.ली. या कासूगामाइसिन (3 प्रतिशत एम.एल.) 1.15 लीटर दवा 500–750 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करें |

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कार्बेन्डाजिम का 0.1 प्रतिशत की दर से दुसरा छिडकाव कल्ले फूटते समय, तीसरा छिड़काव बालियां निकलते समय और ग्रीवा संक्रमण रोकने के लिए करना चाहिए |

झुलसा या जीवाणु पर्ण अंगमारी रोग :-

यह रोग जीवाणु द्वारा होता है | पौधों की छोटी अवस्था से लेकर परिपक्व अवस्था तक यह रोग कभी भी हो सकता है | इस रोग में पत्तियों के किनारे उपरी भाग से शुरू होकर मध्य भाग तक सूखने लगते हैं | सूखे पीले पत्तों के साथ–साथ राख के रंग के चकते भी दिखाई देते हैं | पत्तों पर जीवाणु के रिसाव से छोटी–छोटी बूंदे नजर आती है तथा पौधों में शिथिलता आ जाती है | अंतत: बालियां दानों से रहित रह जाती है |

झुलसा या जीवाणु पर्ण अंगमारी रोग का नियंत्रण

झुलसना रोगने की अवस्था में नाईट्रोजन का प्रयोग कम कर देना चाहिए | इसके अलावा जिस खेत में झुलसा रोग लगा है उस खेत का पानी दुसरे खेत में नहीं जाना चाहिए | खेत में रोग को फैलने से रोकने के लिए खेत से समुचित जल निकास की व्यवस्था की जाए तो रोग को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है | रोग के नियंत्रण के लिए 74 ग्राम एग्रीमाइसीन–100 और 500 ग्राम काँपर आँक्सीक्लोराइड (फाइटोलान/ब्लाइटाक्स–50/क्युप्राविट) का 500 लीटर पानी में घोलकर बनाकर प्रति हैक्टेयर की दर से तीन–चार बार छिडकाव करें | पहला छिड़काव रोग प्रकट होने पर तथा आवश्यकतानुसार 10 दिनों के अंतराल पर करें |

नियंत्रण के लिए 15 ग्राम स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट (90 प्रतिशत) या 15 ग्राम स्ट्रेप्टोमाइक्लिन या टेट्रासाक्लिन हाईड्रोक्लोराइड 10 प्रतिशत को 500 ग्राम काँपर आँक्सीक्लोराइड (50 प्रतिशत डब्ल्यू.पी.) के साथ मिलाकर प्रति हैक्टेयर 500 से 700 लीटर पानी में घोल बनाकर 10–12 दिनों के अंतराल पर 2–3 छिड़काव करना चाहिए |

गुतान झुलसा (शीथ ब्लाइट) :-

यह रोग फफूंद द्वारा होता है | पत्ती की शीथ पर 2–3 से.मी. लंबे हरे से भूरे रंग के धब्बे पड़ते हैं जोकि बाद में चलकर भूरे रंग के हो जाते हैं | धब्बों के चारों तरफ बैंगनी रंग की पतली धारी बन जाती है |

इस तरह करें नियंत्रण

गुतान झुलसा रोग की रोकथाम के लिए ट्राईकोडर्मा विरिडी 1 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. 5 से 10 ग्राम प्रति लीटर पानी (2.5 किलोग्राम), 500 लीटर पानी में घोलकर पर्णीय छिडकाव करें |

रोग के नियंत्रण के लिए कार्बेन्डाजिम (50 प्रतिशत डब्ल्यू.पी.) 500 ग्राम या थायोफिनेट मिथाइल (70 प्रतिशत डब्ल्यू.पी.) 1.0 किलोग्राम कार्बेन्डाजिम (50 प्रतिशत डब्ल्यू.पी.) 500 ग्राम या कार्बेन्डाजिम (12 प्रतिशत)+मैंकोजेब (63 प्रतिशत डब्यू.पी.) 750 ग्राम या प्रोपिकोनाजोल (25 प्रतिशत ई.सी.) 500 मि.ली. या हेक्साकोनाजोल (5.0 प्रतिशत ई.सी.) 1.0 लीटर दवा 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर की दर से पर्णीय छिड़काव करें |

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बकानी रोग :-

बकानी रोग के लक्षणों में प्राथमिक पत्तियों का दुर्बल तथा असामान्य रूप से लंबा होना है | फसल की परिपक्वता के समीप होने के समय संक्रमित पौधे, फसल के सामान्य स्तर से काफी ऊपर निकले हुए, हल्के हरे रंग के ध्वज–पत्रयुक्त लंबे टिलर्स दर्शाते हैं | संक्रमित पौधे में टिलर्स की संख्या प्राय: कम होती है और कुछ सप्ताह के भीतर ही नीचे से ऊपर की ओर एक के बाद दूसरी, सभी पत्तियां सुख जाती हैं | संक्रमित पौधे की जड़ें सड़कर काली हो जाती है और उनमें दुर्गंध आने लगती है |

रोग का नियंत्रण इस तरह करें

धान की फसल में बकानी रोग को रोकने के लिए कवकनाशियों के साथ बीजोपचार की संस्तुति की जाती है | कार्बेन्डाजिम के 0.1 प्रतिशत (1 ग्राम/लीटर पानी) घोल में बीजों को 24 घंटे भिगोयें तथा अंकुरित करके नर्सरी में बीजाई करें | रोपाई से पहले पौध का 0.1 प्रतिशत कार्बेन्डाजिम के घोल में 12 घंटे तक उपचार भी प्रभावी पाया गया है |

खैरा रोग :-

यह रोग मृदा में जिंक की कमी के कारण होता है, जिसे आसानी से पहचाना जा सकता है | खैरा रोग के कारण नर्सरी या मुख्य खेत में पौधों में छोटे–छोटे पैच में दिखाई देते है | इसके कारण पत्तियों पर हल्के पीले रंगे के धब्बे बनते हैं, जो बाद में कत्थई रंग के हो जाते हैं | पत्तियां मुरझा जाती है और इनके मध्य भाग क्लोरोटिक हो जाते हैं | पौधा बौना रह जाता है और पैदावार कम होती है |

प्रभावित पौधों की जड़ें भी कत्थई रंग की हो जाती हैं | पहले खेत के एक कोने में दिखने वाले धब्बे देखते ही देखते पूरी फसल में फैल जाते हैं | तेज धुप में दिनों में लक्षण अधिक गंभीर हो जाते हैं | रोगग्रस्त पौधों पर कोई स्पाइक नहीं बनता है या अगर स्पाइक बनता भी है , तो दाना नहीं बनता |

रोग का नियंत्रण

खैर रोग से धान को बचाने के लिए 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हैक्टेयर की दर से रोपाई से पहले खेत की तैयारी के समय डालना चाहिए | रोकथाम के लिए 5 किलोग्राम जिंक सल्फेट तथा 2.5 किलोग्राम चुना 6,000 से 7,000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर का छिडकाव करें |

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