सूरजमुखी वैज्ञानिक खेती इस तरह से करें

सूरजमुखी SunFlower की आधुनिक खेती

सूरजमुखी एक तिलहनी फसल है , इसकी खेती भारत में प्रमुखता से की जाती है | इसकी खेती वर्ष में तीन बार की जा सकती है परन्तु उत्तर भारत में इसकी खेती सर्दी के मौसम में की जाता है | खरीफ मौसम की सूरजमुखी में कीट का प्रकोप ज्यादा होता है तथा फूल भी छोटा लगता है | जायद फसल के रूप में इसकी खेती सबसे उपयुक्त है तथा उत्पादन भी ज्यादा होता है | किसान समाधान इसकी जानकारी किसानों को  विस्तार से लेकर आया है |

सूरजमुखी हेतु भूमि की तैयारी

 फसल किसी भी प्रकार की भूमि में खेती की जा सकती है | इसकी खेती उस भूमि में भी किया जा सकता है जिस भूमि में धान की खेती नहीं किया जा सकता है | उतार – चढ़ाव वाली, कम जल धारण क्षमता वाली उथल  वाली आदि कमजोर किस्म में  फसलें अधिकतर उगाई जा रही है | हल्की भूमि में जिसमें पानी का निकास अच्छा हो इनकी खेती के लिए उपयुक्त होती है |बहुत अच्छी जल निकासी होने पर लघु धन्य फसलें प्राय: सभी प्रकार की भूमि में उगाई जा सकती है | भूमि की तैयारी के लिए गर्मी की जुताई करें एवं वर्षा होने पर पुनः खेत की जुताई करें या बखर चलायें जिसमें मिट्टी अच्छी तरह से भुरभुरी हो जायें |

सूरजमुखी की उन्नत किस्में 

  1. मार्डन :- इस प्रजाति की उत्पादन क्षमता 6 से 8 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है | इसकी उपज समय अवधि 80 से 90 दिन है | इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 90 से 100 सेमी. तक होती है | इस प्रजाति की खेती बहुफसलीय क्षेत्र के लिए उपयुक्त है |  इस प्रजाति में तेल की मात्र 38 से 40 प्रतिशत होती है |
  2. बी.एस.एच. – 1 :- इस प्रजाति की उत्पादन 10 से 15 किवंटल प्रति हैक्टेयर है तथा इसकी उत्पादन समय 90 से 95 दिन है | इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 100 से 150 सेमी. तक होती है | इस प्रजाति में तेल की मात्र 41 प्रतिशत होती है |
  3. एम.एस.एच. :- इस प्रजाति की उत्पादन 15 से 18 किवंटल प्रति हैक्टेयर  है  तथा इसकी उत्पादन समय 90 से 95 दिन है | इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 170 से 200  सेमी. तक होती है | इस प्रजाति में तेल की मात्र 42 से 44 प्रतिशत होती है |
  4. सूर्या :– इस प्रजाति की उत्पादन 8 से 10 किवंटल प्रति हैक्टेयर है तथा इसकी उत्पादन समय 90 से 100 दिन है | इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 130 से 135 सेमी. तक होती है | इसप्रजाति की की खेती पिछेती बुवाई के लिए उपयुक्त है |  इस प्रजाति में तेल की मात्र38 से 40  प्रतिशत होती है |
  5. ई.सी. 68415 :- इस प्रजाति की उत्पादन 8 से 10 किवंटल प्रति हैक्टेयर है तथा इसकी उत्पादन समय 110 से 115 दिन है | इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 180 से 200  सेमी. तक होती है | इसप्रजाति की की खेती पिछेती बुवाई के लिए उपयुक्त है |  इस प्रजाति में तेल की मात्र38 से 40  प्रतिशत होती है |

सूरजमुखी बीज की बुवाई कब और कैसे करें ?

सिंचित क्षत्रों में खरीफ फसल की कटाई के बाद अक्तूबर से मध्य नवम्बर के बीच करना चाहिए | अक्टूबर माह में की गई बुवाई से अंकुरण अच्छा रहता है | इसके अलावा असिंचित क्षेत्रों में (वर्षा निर्भरता खेती) में सूरजमुखी की बोनी वर्ष समाप्त होते ही सितम्बर माह के मध्य सप्ताह से आखरी सप्ताह तक कर देना चाहिए | ग्रीष्म फसल की बोनी का समय जनवरी माह के तीसरे सप्ताह से फरवरी माह के अन्त तक उपयुक्त होता है | इसी समय के बीच में बोनी करना चाहिए | बुवाई के समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए की वर्ष प्रारम्भ होने से पहले कटाई होकर गहाई किया जा सके |

बीज की मात्रा

उन्नत किस्मों के बीज की मात्रा – 10 किलोग्राम / हेक्टयर संकर किस्मों के बीज की मात्रा – 6 से 7 किलोग्राम / हैक्टेयर होना चाहिए |

बुवाई कैसे करें

पिछेती खरीफ एवं जायद की फसल के लिए कतार से कतार की देरी 45 सेमी एवं रबी फसल के लिए 60 सेमी होनी चाहिए | पौधे से पौधे की दुरी 25 से 30 सेमी रखना चाहिए |

सूरजमुखी में बीजोपचार :-

लाभ :- बीजों की अंकुरण क्षमता बढ़ जाती है एवं फंफूंदनाशक बीमारियों से सुरक्षा होती है |

फंफूंदनाशक दवा का नाम एवं मात्रा :-

बीज जनित रोगों की रोकथाम के लिए 2 ग्राम थायरम एवं 1 ग्राम कार्बनडाजिम 50 के मिश्रण को प्रति किलो ग्राम बीज की दर से अथवा 3 ग्राम थायरम / किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए | डाउन मिल्ड्यू बीमारी के नियंत्रण के लिए रेडोमिल 6 ग्राम / किलोग्राम बीज की दर से बीज उपचारित करें |

दवा उपयोग करने का तरीका :- बीजों को पहले चिपचिपे पदार्थ से भिगोकर दावा मिला दें फिर छाया में सखाएं और 2 घंटे बाद बोनी करें |

सूरजमुखी फसल में पोषक तत्व प्रबंधन 

जैव उर्वरक का उपयोग :-

जैव उर्वरक के उपयोग से लाभ –  पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध कराने का कार्य करते हैं | जैव उर्वरकों के नाम एवं अनुशंसित मात्रा – एजोटोबेक्टर जैव उर्वरक का एक पैकेट एक हैक्टेयर बीज के उपचार हेतु प्रयोग करें | पी.एस.बी. जैव उर्वरक के 15 पैकेट को 50 किलोग्राम गोबर या क्म्पोष्ट खाद में मिलाकर दें |

जैव उर्वरकों के उपयोग की विधि :- जैव उर्वरकों के नाम एवं अनुशंसित मात्रा के अनुसार आखिरी बखरनी के समय प्रति हैक्टेयर खेत में डालें | इस समय खेत में नमी होना चाहिए |

पोषक तत्व प्रबंधन :-

क्म्पोष्ट की मात्रा एवं उपयोग :- सूर्यमुखी के अच्छे उत्पादन के लिए क्म्पोष्ट खाद 5 से 10 टन / हैक्टेयर की दर से बोनी के पूर्व खेत में डालें |

मिट्टी परीक्षण के लाभ :-

पोषक तत्वों का पूर्वानुमान कर संतुलित खाद डी जा सकती है | संतुलित उर्वरकों की मात्रा देने का समय एवं तारीख – बोनी के समय 30 – 40 किलोग्राम नत्रजन, 60 किलोग्राम स्फुर एवं 30 किलोग्राम पोटाश की मात्रा प्रति हैक्टेयर खेत में डालें | खड़ी फसलों में नत्रजन की 20 – 30 किलोग्राम / हैक्टेयर मात्रा बोनी के लगभग एक माह बाद प्रथम सिंचाई के बाद पौधे के कतारों के बाजू में दें |

सूरजमुखी में खरपतवार नियंत्रण 

रासायनिक तरीके से निंदाई करें :-

खरपतवार की निदाई दो तरह से कर सकते हैं पहला यह होगा की खरपतवार को फसल बुवाई से पहले ही नष्ट कर दें | यह ज्यादा अच्छा रहता है दूसरा यह है की बुवाई के बाद पौधा बड़ा हो जाता है तो खरपतवार की निदाई करना जरिरी रहता है \

बुवाई से पूर्व खरपतवार का निदाई :-

एलाक्लोर दावा की 1.5 किलोग्राम हैक्टेयर की दर से बुवाई के बाद पर अंकुरण से पूर्व प्रयोग कर खरपतवार को नष्ट कर सकते हैं | एलाक्लोर दावा की 1.5 किलोग्राम मात्रा को 700 से 800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें |

खड़ी फसल में :-

कड़ी फसल में खरपतवार की निदाई के लिए मुख्यत: दो दावा का उपयोग कर सकते हैं | इसके लिए क्यूजैलोफाप की 50 ग्राम को 750 से 800 लीटर प्रति हैक्टेयर की दर से उस समय उपयोग करें जब खरपतवार 2 से 3 पत्ती का हो जाए | तथा एमेजामेथाबेन्ज की 75 से 100 ग्राम मात्रा को 750 से 800 ली पानी में घोल बनाकर स्प्रे करें | इसका प्रयोग 4 से 8 पत्ती का होजाने पर इस दावा का स्प्रे करें |

सूरजमुखी में लगने वाले रोग और उनका उपचार 

फसल में कई तरह का रोग लगता है | कुछ रोग जलवायु परिवर्तन से होता है तो कुछ रोग फसल के अनुसार होता है | इन सभी को नियंत्रित करना जरुरी रहता है | जिससे उत्पादन पर किसी भी तरह का प्रभाव नहीं पड सके | इसलिए सभी रोगों की सारी जानकारी लेकर आया है |

काले धब्बे का रोग (अल्टनेकरया ब्लाईट) :-

यह रोग 15 से 20 प्रतिशत तक खरीफ के मौसम में हानि पहुँचा सकती है | इसकी पहचान यह है की आरम्भ में पौधों के निचले पत्तों पर हल्के काले गोल अंडाकार धब्बे बनते हैं जिनका आकार 0.2 से 5 मि.मी. तक होता है | बाद में ए धब्बे बढ़ जाते तथा पत्ते झुलस कर गीर जाते हैं | एसे पौधे कमजोर पद जाते हैं तथा फूल का आकार भी छोटा हो जाता है |

रोकथाम :- इस रोग की रोकथाम के लिए एम – 45 दावा का प्रयोग करें | 1250 से 1500 ग्राम मात्रा को प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें | इसका प्रयोग 10 दिन के अंतराल पर 2 से 3 छिड़काव बीमारी शुरू में ही करें |

फूल गलन (हेत राट) :-

यह रोग इस फसल की प्रमुख बीमारी है | इसकी पहचान यह है की आरम्भ में फूल के पिछले भाग पर डंडी के पास हल्के भूरे रंग का धब्बा बनता है | यह धब्बा आकार में बढ़ जाता है तथा फूल को गला देता है | कभी – कभी फूल की डंडी भी गल जाती है तथा फूल टूट कर लटक जाता है | इस रोग के कारण फूलों में दाने नहीं बनते |

रोकथाम :- इस रोग की रोकथाम के लिए एम – 45 या कापर आक्सिक्लोराइड दावा का प्रयोग करें | 1250 से 1500 ग्राम दावा को प्रति हैक्टेयर की दर से फूल आने पर 15 – 15 दिन के नत्रल पर 2 छिड़काव करें |

जड़ तथा तना गलन :-

यह बीमारी फसल में किसी भी अवस्था पर आ सकती है, परन्तु फूलों में दाने बनते समय अधिक आती है | रोग ग्रस्त पौधों की जड़ें गली तथा नर्म हो जाती है तथा तना 4 इंच से 6 इंच तक कला पद जाता है | एसे पौधे कभी – कभी जमीन के पास से टूट कर गीर जाते हैं रोग द्र्स्ट पौधे सुख जाते हैं |

रोगथाम :- इस रोग की रोथं के लिए थाइरम या केप्टान (फंफूंदनाशक) दावा का प्रयोग करें | इस दवा का 3 ग्राम/किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें | इस दावा का प्रयोग बीज बीजोपचार करें व इस रोग से बचाव के लिए भूमि में समुचित मात्रा में नमी रखें |

झुलसा रोग :-

यह रोग लगभग सभी फसलों में होता है इस रोग से पौधे झुलस जाते हैं |

रोकथाम :- इस रोग का रोकथाम के लिए मैटालेक्सिन दवा का प्रयोग करें | इस दावा का 4 ग्राम / किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें | इस रोग की रोकथाम के लिए बीजोपचार करे व अचछे जल निकास की व्यवस्था करें | फसल चक्र अपनाएं एवं रोग ग्रस्त पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर दें |

सूरजमुखी में लगने वाले कीट एवं उनका नियंत्रण 

फसल को रोग के अलावा कीट से भी काफी नुकसान होता है | इसकी रोक थाम बहुत जरुरी है | इस फसल में कई तरह के कीट का प्रकोप होता है | कुछ कीट पत्ती में लगती है तो कुछ कीट तने में लगती है | इसलिए सभी कीटों की जानकारी होना जरुरी है |

कटुआ सुंडी :-

इस रोग का लक्षण यह है कि अंकुरण के पश्चात् व बाद तक भी पौधों को जमीन की स्थ के पास से काट कर नष्ट कर देती है |

रोकथाम :- इस रोग की रोकथाम के लिए मिथाइल पैराथियान दावा का प्रयोग करें | इस दावा का 2 प्रतिशत चूर्ण 25 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से भुरकाव करें |

पत्ते कुतरने वाली लट :-

यह कीट दो तिन प्रकार की पत्ते कुतरने वाली लटों (तम्बाकू कतर पिलर, बिहार हेयर कतर पिलर, ग्रीन कतर पिलर) का प्रयोग देखा गया है |

रोकथाम :- इस कीट की रोकथाम के लिए डायमिथोएट 30 ई.सी. का प्रयोग करें | इस दवा की 875 मिली. का प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें |

तना फली छेदक :-

इस कीट की सुंडिया कोमल पत्तों को काटकर व फूलों में छेड़ करके खा जाती है |

रोकथाम :- इस कीट की रोकथाम के लिए मोनोक्रोतोफास 36 डब्लू.एस.सी. का प्रयोग करें | इस दवा को एक लीटर को प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें |

सूरजमुखी कटाई गहाई एवं आय व्यय 

कटाई :- 
  •  फसल में पौध पककर पीले रंग में बदलने लगते है तब कटाई करना चाहिए |
  • सूरजमुखी की फ्लेटें एक साथ नहीं पकती है अत: यह सावधानी रखना चाहिए की परिपक्क फ्लेटें ही कटी जाए |
  • फ्लेटों को खेत में सुखाने के लिए 5 से 6 दिन के लिए छोड़ देना चाहिए | जिससे फ्लेटों की अतरिक्त नमी सुख जाए |
  • यह क्रिया गहाई में सहायक है |
गहाई :-
  • गहाई साफ जमीन पर की जाती है |
  • सूखे फूलों को लाठी से पीटकर या दो फूलों को आपस में रगड कर गहाई की जा सकती है |
  • यदि फसल ज्यादा हो तो थ्रेसर की सहयता ली जा सकती है |
  • बीजों को सुपे से फटककर साफकर धूप में सुखा लें |
  • उपज
  • इस फसल की उपज इसकी प्रजातियों पर भी निर्भर करता है | देरी से पकने वाली 8 से 10 किवंटल/हैक्टेयर एवं मध्यम 15 से 20 किवंटल / हैक्टेयर उत्पादन है |
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