ईसबगोल की खेती,प्रौधोगिकी एवं संरक्षण

ईसबगोल Plantago ovata Forsk. रबी के मौसम में सिंचित अवस्था में उगाई जाने वाली एक औषधीय महत्व की फसल हैं, जो 115 – 120 दिनों में पककर तैयार हो जाती है | यह कम वर्षा की स्थिति में कम लागत में होने वाली एक लाभकारी फसल है |

ईसबगोल एक अत्यन्त महत्वपूर्ण नगद आमदनी एवं निर्यात द्वारा विदेशी मुद्रा अर्जित करने वाली औषधीय एवं वाणिज्यिक फसल है | भारत की औषधीय फसलों में उत्पादन व निर्यात की दृष्टि से ईसबगोल का प्रथम स्थान है | देश के विभिन्न राज्यों जैसे गुजरात, राजस्थन, मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा एवं उत्तरप्रदेश में इसकी खेती लगभग 50 हजार हेक्टयर से अधिक क्षेत्र में हो रही है | मध्यप्रदेश में मंदसौर एवं नीमच जिला इसके उत्पादन में मुख्य स्थान रखता है | ईसबगोल का प्रमुख उपभोक्ता अमेरिका है |

औषधीय महत्व :-

 सामान्य तौर पर माना जाता है , की इन्सान की ज्यादातर बीमारियों का घर उसका पेट होता है और पेट की मुख्य समस्याओं में से एक कब्ज की समस्या होती है और ईसबगोल कब्ज की कारगर औषधी है, तथा प्राकृतिक होने की वजह से लम्बे समय तक लेने पर भी इसकी आदत नहीं पड़ती है | ईसबगोल के बीज पर पाये जाने वाला छिलका ही इसका औषधीय उत्पाद है | जिसे ईसबगोल की भूसी के नाम से जाना जाता है |इसका उपयोग पेट की सफाई , कब्जियत, दस्त, आँव – पेचिस, अल्सर, बवासीर जैसे बिमारियों के उपचार में किया जाता है | इसके अलावा आईसक्रीम, रंग रोगन व प्रिंटिंग उधोग में भी उपयोग होता है |

पौधे का वर्णन :-

इसका पौधा शाखा रहित 30 – 35 से.मी. ऊँचाई वाला एवं पत्ती सकरी जिन पर सफ़ेद रंग के रोए होती है | इसकी बाली  की लम्बाई 4 – 6 से.मी. लम्बी होती है | जिस पर पुष्प एवं बाद में बीज उत्पन्न होते हैं |

भूमि एवं जलवायु :-

इसके उत्पादन के लिए अच्छी जल निकास वाली दोमट या बलुई दोमट मृदा जिसका पी.एच. मान  7 – 8 हो उपयुक्त होती है | भूमि की तैयारी हेतु दोबारा आदि एवं कड़ी जुताई कर पाटा चलाकर मिट्टी को भुरभुरी एवं समतल बनायें, क्योंकि इसके बीज का आकार छोटा होता है | जिससे समतल एवं भुरभुरी मृदा में उचित गहराई पर बीजों की बुआई की जा सकें |

  यह फसल शीतोष्ण जलवायु में अच्छा उत्पादन देती है परन्तु अधिक आर्द्रता एवं नमीयुक्त जलवायु वाले क्षेत्रों में इसकी खेती नहीं करनी चाहिए | इसके बीजों के अंकुरण के समय तापमान 20 – 25 डिग्री सेल्सियस, पौधे की उचित बढवार के लिये 30 – 35 डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है |

जातियों का चुनाव-उन्नत किस्में  :-

जवाहर ईसबगोल 4 – यह प्रजाति 1996 में औषधीय एवं सुगन्धित पौध की अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना के अंतर्गत कैलाश नाथ काटजू उद्यानिकी महाविघालय ,मंदसौर (राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय,ग्वालियर) द्वारा म.प्र. के लिए अनुमोदित एवं जारी की गई है। इसका उत्पादन 13-15 क्विंटल प्रति हेक्टर लिया जा सकता है। गुजरात ईसबगोल 2 – यह प्रजाति 1983 में अखिल भारतीय समन्वित औषधीय एवं सुगन्धित पौध परियोजना, आणंद, गुजरात से विकसित की गई हैं। इसका उत्पादन 9-10 क्विंटल प्रति हेक्टर लिया जा सकता हैं। हरियाणा ईसबगोल 5 – यह प्रजाति अखिल भारतीय समन्वित औषधीय एवं सुगन्धित पौध परियोजना, चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा 1989 में निकाली गई हैं। इसका उत्पादन 10-12 क्विंटल प्रति हेक्टर लिया जा सकता हैं।

अन्य किस्मों में गुजरात ईसबगोल 1, हरियाणा ईसबगोल – 2, निहारिका, ट्राबे सलेक्शन 1 से 10 आदि का चयन कर बुवाई की जा सकती है।

बीज की मात्रा एवं बीजोपचार व बोने की विधि :-

कतार में बोनी हेतु 4 – 5 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टयर पर्याप्त होता है | कतार से कतार की दुरी 30 से.मी. एवं पौधे से पौधे की दुरी 4 – 5 से.मी. रखनी चाहिए | बुआई के पूर्व बीजों को 2 ग्राम डायथेन एम – 45 तथा 1 ग्राम बाविस्टिन या मैतालैकिसल 35 एस.डी. 6 ग्राम प्रति किलोग्राम के दर से बीजोपचार अवश्य करें | चूंकि बीज बहुत छोटे है अत: इसमें बराबर मात्रा में रेत मिला कर कतार में या छिडकाव विधि से बो सकते है | बोते समय यह सावधानी अवश्य रखें कि बीज 2 से.मी. से ज्यादा गहरे जायें |

खाद या उर्वरक :-

अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद 5 टन / हे. आखरी जुताई के समय खेत में मिला दें | इसके साथ ही 25 किलो नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम स्फुर एवं 20 किलोग्राम पोटाश बुआई के समय खेत में मिला देवें तथा बाकि 25 किलोग्राम नत्रजन 25 – 30 दिन बाद सिंचाई के समय देवें |

सिंचाई :-

बोने के तुरंत बाद सिंचाई कर देवें | भरी जमीं में अच्छे अंकुरण के लिए 5 – 6 दिन बाद गलवन देवें | अंकुरण के उपरान्त 30 दिन बाद कल्ले निकलने की अवस्था पर तथा दूसरी सिंचाई बाली निकलने की अवस्था पर 60 दिन बाद देना चाहिए | इसके उपरान्त सिंचाई नहीं देना चाहिए बीमारियों का प्रकोप बढ़ता है तथा उपज कम प्राप्त होती है |

समन्वित निंदा प्रबन्धन :-  

अंकुरण के 20 – 25 दिन पश्चात् एक निंदाई गुडाई अवश्य करनी चाहिए इसी समय छनाई का कार्य भी कर देवे उचित पौध संख्या 6 – 7 लाख / प्रति हेक्टयर रहने पर कीट व बिमारी की समस्या कम आती है | तथा उपज भी सही मिलती है | इस फसल में रासायनिक नींदा नियंत्रण हेतु आईसोंप्रोटूरान दावा 1 किलो प्रति हेक्टयर की दर से बोनी के तुरंत बाद 800 – 1000 ली. पानी में घोल कर छिड़काव करें |

अंतरवर्तीय खेती :-

फसल कम अवधि एवं ऊँचाई की होने के कारण इसे फ्लोधानों में बीच की खाली जगह में अंतरवर्ती फसल के रूप में आसानी से उगा सकते हैं |

रोग एवं कीट व्याधि :-

इस बीमारी में पौधे अंकुरण के बाद झुलस कर मर जाते हैं | रोग के नियंत्रण के लिए बीजोपचार करे तथा प्रकोप दिखाई देने पर फाईटोलान 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर जड़ क्षेत्र में भूमि को स्तर करें |

डाउनी मिल्ड्यू :-

 इस रोग के लक्षण बाली मिकलने की अवस्था में दिखाई देता है | सर्वप्रथम पत्तियों के उपरी साथ पर कत्थई रंग के धब्बे दिखाई देता है | पत्ती के नीचले भाग में सफ़ेद जाल दिखाई देता है और पत्तियों मुड जाती है | इससे उत्पादन व गुणवत्ता दोनों ही प्रभावित होता है | रोग के प्रकोप होने पर 3 ग्राम डायथेन एम – 45 या 3 ग्राम फाईटोलान या 2 ग्राम क्रिलैक्सिल 72 एम. जेड प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें |

मोला (महो) :-

ईसबगोल में अधिकतर मोला (एफिड) का प्रकोप होता है | इसके प्रकोप से फसल चिपचिपी, चमकदार व कलि दिखाई देने लगती है | मोला कीट पत्तों से रस चूसने वाला पीले रंग का सूक्ष्म कीट होता है | इसके रोकथाम के लिये मिथाईल डेमेटान या मेटासिस्टाक्स 25 ई.सी. 1.25 मिली लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें या इमिडासक्लोरप्रीड 5 मि.ली. 15 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें|

कटाई , गहाई व भंडारण :-

फसल 115 – 120 दिन में पक्क कर तैयार हो जाती है | इस अवस्था पर पत्तियां सुख जाती है तथा बालियों को हाथ से मसलने पर डेन आसानी से निकाल आते हैं | इस अवस्था पर फसल की कटाई कर लेनी चाहिये | वरना डेन आसानी से खतरा रहता है | अगर मावठे की संभावना हो तो फसल की एक दो दिन पूर्व में कटाई कर लेनी चाहिए | कटाई उपरान्त ढेरी को एक दो दिन धूप दिखा कर लकड़ी के द्वारा पीट कर दोनों को अलग करें तथा सूखे हुये दानों को प्लास्टिक या कपड़े के बैग भण्डारित करें | धातु की नमी रहित कोठी में भी भण्डारण कर सकते हैं |

उपज :

उन्नत किस्मों तथा उन्नत तकनीकी का उपयोग करके इसकी उपज 16 – 18 किवंटल / हे. प्राप्त की जाती है |

ईसबगोल की खेती का आर्थिक विश्लेषण

क्र.
विवरण
मात्रा एवं दर प्रति इकाई
लागत (रु)

1.

भूमि की तैयारी

 

 

जुताई की संख्या – 03

/ 400रु/घंटा, 2 घंटा /हेक्टर

2400

2.

खाद और उर्वरक

 

4.7

उर्वरक गोबरकी खाद

10 टन/हे./ 400रु/टन

4000

नत्रजन

30 * 12.5

375

फॉस्फोरस

40 * 32.5

1300

पोटाश

20 * 20

400

मजदूरों की संख्या

2 पर 250रु/मजदूर

500

3.

बीज एवं बुआई

 

 

बीज की मात्रा

5 किग्रा / 150 रु/किग्रा

750

बीज उपचार

 

 

मैटालैक्जील

5 ग्राम/किग्रा

50

राइजोबियम

50 ग्राम/किग्रा

10

पी.एस.बी.

50 ग्राम/किग्रा

10

बुआई का खर्च

2 घंटा /हेक्टर / 400रु/ घंटा

800

मजदूरों की संख्या

4 पर 250रु/मजदूर

1000

4.

निंदाई/खरपतवार

 

 

आइसोप्रोटूरोंन

750 ग्राम

975

निंदाई – मजदूरी

25 / 200 रु/  मजदूर

5000

5.

फसल सुरक्षा

 

 

डाइमिथोएट (2 बार)

750 मिली/हेक्टर (1.5 लीटर)

525

मैटालैक्जील $ मैंकोजेब

1 किग्रा

900

6.

सिंचाई

 

 

मजदूरों की संख्या

3 सिंचाई / 750रु/ मजदूर

2250

विद्युत खर्च

100 रु/हेक्टर

300

7.

कटाई

 

 

मजदूरों की संख्या

20 मजदूर / 200रु/ मजदूर

4000

 

मडाई

650रु/घंटा, 4 घंटा /हेक्टर

2600

8.

कुल खर्च

 

28145

9.

उपज

15 क्विंटल / हेक्टर / 8000 रु/ किग्रा

120000

10.

शुद्ध लाभ

 

91855

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