यूकेलिप्टस की उत्पादन तकनीक

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यूकेलिप्टस की खेती

यूकेलिप्ट्स की मुख्यतः दो किस्में भारत में होती हैं I

  1. यूकेलिप्टस कैमल्डुलेन्सिस
  2. यूकेलिप्ट्स टेरेटिसकोर्निस

यूकेलिप्टस कैमल्डुलेन्सिस

कुल: मिरटेसी

सामान्य: रेड गम, रिवर गम

भारत में: ज्यादा नहीं उगाया जाता।

जलवायु और मिट्टी की आवश्यकताएँ

उष्ण और उपोष्ण, शुष्क से अर्धशुष्क -5 डिग्री सें.से 50 डिग्री सें. तक का तापमान, सालाना वर्षा 200-1250 मि.मी., 1200 मी. की ऊँचाई, पाले को सहने की क्षमता। अनुपजाऊ से लेकर जललग्नता वाली मिट्टियों में, कैल्शियम और ऊँचे पी.एच. मान वाली मिट्टी में उग सकता है, बीज के मूल पर लवण सहन करने की क्षमता निर्भर है।

संवर्धन की विधि और बीज-उपचार

नर्सरी में तैयार की गई पौध से उगाया जाता है। बीज-उपचार की आवश्यकता नहीं है। बीज बहुत छोटे होते है, इसलिए इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उन्हें एकसार मिट्टी में डाला जाए, मिट्टी में गहराई पर नहीं चोबना (डिबिल) चाहिए। सतह पर बीजों को छिटका जाये और क्यारी की मिट्टी को धीमे से दबा दिया जाये। क्यारी को घास या सूखी घास से अंकुरण होने तक ढक दिया जाये। कटाई के बाद कल्ले व पत्तियाँ अच्छी उगती है।

बढ़वार और उपज

बड़ा, सदाबहार, 24-40 मी., ऊँचा, मजबूत, सीधा तना, 1 मी. तक व्यास और सीधे बढ़ने की प्रवृति। आठ दस साल की आयु तक सालाना बायोमास उपज 25-30 मी. प्रति हैक्टर बशर्ते कि मिट्टी और नमी उपयुक्त हो।

लकड़ी का विशिष्ट घनत्व 0.65 और कैलोरी मान 4800 किलो. कैलोरी प्रति कि.ग्रा. । ईंधन, सामान्य निर्माण कार्य और लुगदी के लिए उत्तम। फूल शहद के स्रोत। मवेशी इसका चारा नहीं खाते। पेड़ आगरोधी होते है।

कीट-व्याधियां: पतंगों के लावां, यूकेलिप्ट्स स्नाउट बीटल, दीमक और छेदक कीट इस पर हमला करते है।

यूकेलिप्ट्स टेरेटिसकोर्निस

कुल: मिरटेसी

सामान्य नाम: ब्ल्यू गम, मैसूर गम

भारत में: पूरे देश में।

जलवायु और मिट्टी की आवश्यकताएँ

उष्ण से उपोष्ण, अर्ध शुष्क से शुष्क, सालाना वर्षा यदि कम यानी 400 मि.मी. तक भी हो परन्तु सर्वोत्तम स्थिति 800 और 1500 मि.मी. के बीच। 40 डिग्री सें. से 00 सें. तक के बीच विभिन्न तापमानों में उगने योग्य। गहरी, अच्छी जल निकासी वाली, हल्की उदासीन या थोड़ी सी अम्लीय मिट्टी उपयुक्त है, परन्तु खराब मिट्टियों में भी उग सकता है।

संवर्धन की विधि और बीज-उपचार

बीज से उगाया जाता है। अच्छे संवर्धन के लिए कोमल प्ररोह की कलियाँ उगायी जा सकती है। बीज के उपचार की आवश्यकता नहीं है। काटने पर कल्ले बहुत अच्छे फूटते हैं।

बढ़वार और उपज

बड़ा और सदाबहार, 45 मी. तक ऊँचा जाता है, तना सीधा और व्यास 1-2 मी. और सीधे बढ़वार की प्रवृति। सालाना बायोमास उपज 25 मी. प्रति हैक्टर आठ से दस समय का चक्र 8-10 वर्ष। लकड़ी का विशिष्ट घनत्व 0.75 या अधिक, उच्च कैलोरी मान, ईंधन, कोयले, खंभे, फट्टे (फाइबर बोर्ड) पार्टिकल बोर्ड और लुगदी के लिए अच्छी। मवेशी इसका चारा नहीं खाते। पत्तियों से तेल निकाला जा सकता है। फूल शहद के पराग के अच्छे स्रोत हैं। घटिया मिट्टियों जैसे बलुई और कंकरीली मिट्टियों के सुधार के लिए अच्छा है।

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कीट-व्याधियां

छोटी पौधों पर दीमक हमला करते हैं। स्नाउट बीटल और मोल क्रिकेट भी हानि पहुँचाते हैं। फफूंदी के हमले की भी सूचनाएँ मिली हैं।

मैसूर संकर किस्म भी यूकेलिप्ट्स टेरेटीकोर्निस से गहरे रूप से संबंधित है। गुलाबी बीमारी, जा कि मूल किस्म पर लगने वाली बीमारी है, के प्रति यह किस्म रोधी है। जिन शुष्क क्षेत्रों में सालाना वर्षा 800-1000 मि.मी. से कम होती है, वहाँ के लिए इस संकर किस्म का लगान की सिफारिश की गई है क्योंकि फफूंदी नम स्थिति में पेड़ पर हमला करती है। यह पूरे भारत में उगाया जाता है।

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