सब्जियों की फसलों में कीट एवं रोगों का नियंत्रण इस तरह करें

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सब्जियों में कीट एवं रोग प्रबंधन

रबी फसल के बाद अभी किसान का खेत खाली है या सब्जी की खेती कर रहें होंगे | वर्तमान समय में किसानों के लिए सब्जी ही एक मात्र खेती की जाने वाली फसल है | सब्जी की खेती से किसान को अधिक मुनाफा भी होता है लेकिन सब्जी में रोग तथा कीट का भी अधिक प्रकोप रहता है जिससे फसल को काफी नुकसान पहुँचता है | किसान समाधान सब्जी की खेती में होने वाले रोग तथा कीट के नियंत्रण के लिए पूरी जानकारी लेकर आया है |

कीट एवं व्याधि पहचान और नियंत्रण :-

  • मिट्टी में दीमक की उपस्थिति शुष्क क्षेत्रों में बहुत बड़ी समस्या है | इसके निदान के लिए क्युनाल्फोस या क्लोरपाइरीफोस 20 – 25 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से भूमि का उपचार करना चाहिए |
  • सब्जियों में कीट व व्याधि की समस्या अक्सर देखी जाती है , अत: अगर ऐसी समस्या अधिक मात्रा में आए तो सब्जी की किस्म के अनुसार उचित जानकारी लेकर कीटनाशक एवं रोग नियंत्रण का छिड़काव करना चाहिए |
  • जायद फसलों में भिंडी, बैंगन अथवा टमाटर में अधिकतर फल छेदक व सुंडी का प्रकोप देखा जाता है | यह कीट फल के अन्दर घुसकर उसे काटकर हानि पहुंचाते हैं | सब्जियों में इसके नियंत्रण के लिए मैलाथियान 50 ईसी या एंडोसल्फास 35 ईसी 1 – 2 मिली प्रति लीटर पानी की दर से सुबह या शाम के समय छिड़काव करना चाहिए |
  • इस समय फसलों में प्राय: जेसिड्स (हरा तेल) का भी प्रकोप देखा जाता है | ऐसे छोटे – छोटे हल्के हरे रंग के कीट होते हैं तथा पत्तियों का रस चूसकर उन्हें सुखा देते है व पत्तियाँ सूखकर झड जाती है | इसके नियंत्रण के लिए मैलाथियान 50 ईसी की 1 मिली प्रति लीटर या डाइमिथोएट 30 ईसी 2 मिली प्रति लीटर या इमिडाक्लोरपिड 200 एसएल 0.3 मिली प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए |
  • मटमैले – भूरे रंग के महीन कीट जिन्हें चैप या मोयला (एफिडस) के नाम से जाना जाता है अक्सर पत्तेदार सब्जियों में हानि पहुंचाते हैं | यह कीट पत्तियों का रस चूसकर फसल की वृद्धि एवं उत्पादन को प्रभावित करता है | इनके नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोरपिड 200 एसएल 0.3 मिली प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर या छिड़काव करना चाहिए |
  • मूली, बैंगन, मिर्च आदि में सफेद मक्खी का प्रकोप देखा जाता है इसके नियंत्रण के लिए मैलाथियान 50 ईसी 2 मिली प्रति लीटर मात्रा का 400 – 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़कावें |

अन्य रोग एवं कीटों का नियंत्रण 

  • ज्यादा फसल में नीम की खली के प्रयोग से भी कीड़ों व बीमारियों की रोकथाम में मदद मिलती है |
  • आद्र विगलन टमाटर, बैंगन व मिर्च में लगने वाली भुत ही खतरनाक बीमारी है | इस बीमारी के प्रकोप से नर्सरी में पौधों की जड़े साद जाती हैं तथा पौधे मर जाते हैं | इस बीमारी की रोकथाम के लिए ट्राइकोडरमा विरिडी की 4 ग्राम / किलो बीज या थिरम की 3 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर नर्सरी में बुवाई करनी चाहिए |
  • बैक्टीरियल विल्ट बीमारी टमाटर, बैंगन इत्यादि फसलों में भूमि में अधिक नमी तथा तापमान के कारण लगती है | इस बीमारी के कारण पूरा पौधा सुख जाता है | इसके नियंत्रण के लिए उचित फसल चक्र अपनाना चाहिए तथा पौधों को खेत में रोपने से पहले स्ट्रेप्तोसाइक्लीन की एक ग्राम मात्रा को 40 लीटर पानी में मिलाकर घोल में 30 मिंट तक उपचारित कर रोपना चाहिए |
  • सूखे की स्थिति में चूर्णी फफूंद (पाउडरी मिल्ड्यू) का सबसे अधिक प्रकोप होता है | इस बीमारी के कारण पत्तियों एवं तनों पर फफूंद के सफ़ेद चूर्ण की परत आ जाती है | प्रभावित पत्तियाँ छोटी, कड़ी व नुकीली रह जाती है तथा पौधे की बढवार भी प्रभावित होती है | इसके नियंत्रण के लिए केराथेन की 1 मिली प्रति लीटर पानी या घुलनशील सल्फर की 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए | सल्फर पाउडर को भुरकाव करके भी चूर्ण फफूंदी की रोकथाम की जा सकती है |
  • अगेता झुलसा टमाटर, बैगन की सामान्य बीमारी है | इसका प्रयोग प्रारम्भिक अवस्था में पत्तियों पर होता है , जिसके कारण पत्तियों पर धब्बे पद जाते है | पुरानी पत्तियों पर छोटे व काले रंग के धब्बे बाद में पीले पद जाते है तथा अधिक प्रकोप के कारण पत्तियां सुख जाती है | इसके नियंत्रण के लिए प्रभावित पौधे उखाड़ देने चाहिए तथा मैंकोजेब डीफोलेटान या डाइथेन एम 45 की 2.5 मिली मात्रा को प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए | इसके अतिरिक्त फाइटोलौन 2 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में 7 – 8 दिन के अंतर पर छिड़काव कर भी इस रोग के प्रकोप से छुटकारा पाया जा सकता है |

कीटनाशक व फफूंदीनाशी के प्रयोग में बरती जानने वाली सावधानियाँ ;-

  • कीटनाशी या फफूंदीनाशी के तिन व डिब्बों को बच्चों व जानवरों की पहुँच से दूर रखना चाहिए |
  • कीटनाशक या फफूंदीनाशी का छिड़काव करते समय हाथों में दस्ताने पहनना चाहिए तथा मुहँ को मास्क व आँखों को चश्मा पहन कर ढक लेना चाहिए जिससे कीटनाशी या फफूंदनाशी त्वचा व आँखों में न जाए |
  • कीटनाशी या फफूंदीनाशी का छिड़काव शाम के समय जब हवा का वेग अधिक न हो तब करना चाहिए अथवा हवा चलने के विपरीत दिशा में खड़े होकर करना चाहिए |
  • कीटनाशक या फफूंदीनाशी का छिड़काव करने के बाद हाथ पैर व कपड़ों को अच्छी तरह धो लेना चाहिए |
  • कीटनाशी या फफूंदनाशी के खाली तिन व डिब्बों को मिट्टी में दबा देना चाहिए |
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