जैविक खेती से भी अच्छी है खेती की यह तकनीक

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Biodynamic Farming

बायोडायनामिक खेती (Biodynamic Agriculture)

बायोडायनामिक खेती जैविक खेती की ही तरह है परन्तु यह जैविक खेती से उन्नत खेती है, इससे उपज की गुणवत्ता एवं मिट्टी के स्वास्थ में बढ़ोतरी होती है | बायोडायनामिक कृषि का जन्म तब हुआ जब 1924 में डॉ. रुडोल्फ स्टीनर ने जर्मनी में किसानों के एक बड़े समूह को कृषि की एक नई पद्धति के बारे में आठ व्याख्यान दिए। रुडोल्फ स्टीनर एक ऑस्ट्रियाई दार्शनिक और वैज्ञानिक थे, जिनका विचार प्राच्य दर्शन, खासकर बौद्ध धर्म हिंदू धर्म, और वैदिक शास्त्र  से बहुत प्रभावित था। । बायो-डायनामिक दो शब्दों से मिलाकर बना है |

 बायोस + डायनामिक = जीवन+उर्जा

कृषि कार्यों में समय तथा मौसम की जानकारी होना जरुरी है | पुराने समय में किसान कृषि के किसी भी  कार्य करने से पहले समय का बहुत ध्यान रखते थे | किसान यहाँ तक ध्यान रखते थे की जैविक खाद, बीज की बुवाई कटाई के लिए सूर्य, चन्द्रमा , मौसम, अग्नि तथा वायू, का विशेष ध्यान रखते थे | इन सभी का हमारे कृषि पर विशेष योगदान है | किसान समाधान किसानों के लिए खेती से जुडी सभी तरह के काल चक्र के साथ प्राकृतिक की जानकारी लेकर आया है |

उद्देश्य :-

  • उच्च गुणवत्ता युक्त उत्पादन
  • खेती में जैविक क्रियाओं को प्रोत्साहन
  • भूमि की उर्वरता में निरन्तर वृद्धि
  • गावों में सुगमता एवं सस्ते में उपलब्ध संसाधनों का समन्वित उपयोग
  • पर्यावरण प्रदूषण को कम करना
  • कृषि में ब्रह्माणडीय शक्तियों का समाकलन

बायोडायनमिक सिद्धान्त के अनुसार चन्द्रमा माह में लगभग 29.5 दिनों में पृथ्वी का पूरा चक्कर लगता है तथा इस अवस्था में यह बारह राशियों से गुजरता है | प्रत्येक राशि पर 2.50 – 3.25 दिन तक रहते हुये दुसरे राशि पर पहुँच जाता है | इन 12 राशियों को यूनानी भाषा में प्रतीक के रूप में अलग – अलग जीव / वस्तुओं के आकार से चित्रित किया गया है | ये 12 राशियां चार मुख्य तत्व जैसे भूमि, जल, वायु, तथा अग्नि को प्रभावित करती है इनका सम्बन्ध चार पौधे भागों (जड़, पत्ती, फूल और फल/बीज) से होती है |जिसे सारणी में दर्शाया गया है |

सरणी राशियों का विभिन्न मुख्य तत्वों से सम्बन्ध
प्रधान तत्व
प्रभावित पौध भाग
राशियाँ

पृथ्वी

जड़

कन्या, मकर, वृष

जल

पत्ती

कर्क, वृश्चिक, मीन

वायु

फूल

मिथुन, तुला, कुंभ

अग्नि

फल / बीज

मेष, धनु, सिंह

चन्द्र : शनि विपरीत अवस्था :-

प्रत्येक माह चन्द्र : शनि एक अथवा किसी माह में दो दिन विपरीत दिशा में आते हैं एक दिन सभी प्रकार की कृषि क्रियाओं हेतु उपयुक्त होते हैं |

चन्द्रग्रन्थि (NODE) : यह एक काल्पनिक बिंदु है | प्रत्येक माह में दो बार चन्द पृथ्वी के पथ से गुजरते हुये सूर्य के पथ को काटता है | सामन्य भाषा में इसे राहू और केतु के नामों से जाना जाता है | ये दिन किसी भी कृषि कार्य हेतु उपयुक्त नहीं होते हैं |

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बायोडायनमिक उत्प्रेरक (बी.डी. 500 – गाय सींग की खाद) :-

गाय की सींग को ताजे गोबर से अच्छी तरह भर कर भूमि में (छायादार एवं ऊँचे स्थान पर) 25 – 35 से.मी. गहरा गड्ढा जमीन में (चन्द्रमा के दक्षिणणायनकी स्थिति में) खाद कर सीधा रख देते हैं | सींगों से तैयार खाद निकाल कर मिटटी के बर्तन में एकत्रित करके किसी ठंडे स्थान पर रख देते हैं | तैयार खाद दुर्गन्ध मुक्त होती है | 25 ग्राम सींग की खाद को 13.5 ली. स्वच्छ पानी में एक प्लास्टिक की बाल्टी में एक घन्टे तक घड़ी की सुई की दिशा एवं विपरीत दिशा में लकड़ी से घुमाते हुये भंवर बनाकर अच्छी प्रकार मिलाकर बुआई / रोपाई से पहले इस घोल को सायंकाल चन्द की दक्षिणायन में झाड़ू अथवा पत्ती युक्त शाख से खेत में बड़े – बड़े बूंदों के रूप में छिड़काव किया जाना चाहिए |

बायोडायनमिक उत्प्रेरक (बी.डी. – 501) :-

इस उत्प्रेरक सिलिका पाउडर से बनाया जाता है | सिलिका का मुख्य योगदान प्रकाश संश्लेषण को प्रभावी बनाने में होता है | बी.डी.501, मार्च – अप्रैल में चन्द्र की उत्तरायण की स्थिति में गाय की सींग को अच्छी प्रकार साफ कर इन सींगों से सिलिका का लेप भरकर भूमि में बी.डी.500 की तरह गडढे में सीधा रख देते हैं | अक्तूबर – नवम्बर में सींगों को चन्द्र की उत्तरायण की स्थिति में निकाल कर शीशे के बर्तन में घर की खिड़की के पास प्रकाश में भंडारित करते हैं |

एक ग्राम सिलिका उत्प्रेरक को 13.5 ली. पानी में एक घंटा तक घड़ी की तथा इसके विपरीत दिशा में भवंर बनाते हुये प्रात:काल अच्छी प्रकार मिलाया जाता है | छिड़काव प्रात: काल सूर्योदय के समय चन्द्र की उत्तरायण की स्थिति में किया जाता है | प्रयोग से पौधों में कीट तथ व्याधि के प्रति सहिष्षुता बढती है |

बायोडायनमिक खाद उत्प्रेरक (बी.डी. 502 – 508) :-

इनके प्रयोग से खाद में प्रत्युक्त अवशेष का विघटन तीव्रता से होता है तथा प्रयुक्त कीटनाशक में उत्प्रेरकों की सक्रियता में वृद्धि होने कारण अधिक प्रभावशाली होते हैं |

बायोडायनमिक उत्प्रेरक 502 – 507 का प्रयोग बायोडायनमिक क्म्पोष्ट, काउ पैटपिट, तरल खाद बी.डी. कीटनाशक तथा फफूंद नाशी बनाने हेतु किया जाता है | 502 से 506 की एक – एक ग्राम मात्रा तथा बी.डी. 507 की 10 मि.ली. को एक सेट कहा जाता है जिसका उपयोग बायोडायनमिक क्म्पोष्ट इत्यादि बनाने हेतु किया जाता है |

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काऊ पैट पिट (CPP) :-

भूमि की जैव सक्रियता में वृद्धि हेतु यह एक प्रभावी उत्प्रेरक है | 60 कि.ग्रा. गोबर में 250 ग्राम अंडे के छके का महीन चुरा तथा 250 ग्राम बेसाल्ट / बेन्टोनाइट चूर्ण मिलाकर पानी के साथ अच्छी प्रकार एक घंटे तक गुथाई कर गडढे (100 × 60 × 45 से.मी.) में भर दिया जाता है | भरे गये गोबर में दो बी.डी. सेट (बी.डी. 502 – 506) को अलग – अलग स्थान में सुराख़ बना कर डाल देते है | बी.डी. 507 तरल उत्प्रेरक को 15 मिंट तक 3 – 4 लीटर पानी में भंवर बनाते हुये मिलाकर गोबर में डालकर गिले टाट / बोरा से ढक देते हैं | 75 – 90 दिन में सी.पी.पी. उपयोग हेतु तैयार हो जाती है | इस अवधि में पानी का छिड़काव करते हुये उचित नमी बनाने रखना अनिवार्य होता है |

बायोडायनामिक कम्पोस्ट  :-

खेतों पर उपलब्ध सुखी तथा हरी घासों इत्यादि का प्रयोग क्म्पोष्ट बनाने हेतु किया जाता है | पांच मी. लम्बी लकड़ी को समतल एवं ऊँचे स्थान पर वायु आवागमन हेतु रख देते हैं | लकड़ी के ऊपर 20 से.मी. सुखी घास 2.5 मी. की चौडाई में बिछा देते हैं | तत्पश्चात प्रचुर मात्रा में पानी का छिड़काव कर गोबर का गाढ़ा घोल छिड़काव दिया जाता है | इसके बाद 20 से.मी. हरी घास की मोती परत बिछाकर प्रचुर मात्र में पानी का छिड़काव कर गोबर का गाढ़ा घोल छिड़क देते हैं | उपरोक्त क्रम (20 से.मी. सुखी घास, पानी का छिड़काव, गोबर के गाढे घोल का छिड़काव और 20 से.मी. मोटी हरी घास की परत) को 1.5 मी.ऊँचाई तक दोहराया जाता है |

कम्पोस्ट में  आवश्यकतानुसार पोषक तत्वों की मात्रा में वृद्धि के लिए बुझा हुआ चूना (कैल्सियम के लिए) लकड़ी की राख, बिनमील एवं राक फास्फेट (फास्फोरस एवं पोटाश के लिए), सुखी एवं हरी घास की विभिन्न परतों के बीच में छिड़का जा सकता है | आकार तैयार होने के बाद ढेर को गोबर एवं मिटटी के मिश्रण से लिप कर 1 बी.डी. सेट डाल देते हैं | 75 – 90 दिनों में कम्पोस्ट तैयार हो जाती है |

बायोडायनामिक तरल खाद एवं कीटनाशक :-

यह दलहनी पौधा एवं नीम की पत्तियों, मछली के कचरे, आरडी, करंज, मदार एवं सदाबहार की पत्तियों द्वारा बनाया जाता है | कर्ज, नीम, मदार, सदाबहार , अरण्डी एवं लैन्ताना की पत्तियों द्वारा बनाये गये तरल खादों में कीट एवं रोग निवारण गुण होते हैं |

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