लोबिया (दलहनी चारा) की खेती किस प्रकार करें किसान भाई 

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लोबिया (दलहनी चारा)  

भारत में लोबिया की खेती हरे चारे, सब्जी तथा दाने इत्यादि के लिए की जाती है इस दलहनी फसल में प्रोटीन का प्रतिशत अधिक होने से हरे चारे तथा सब्जी में इसका विशेष महत्व हैं | लोबिया को ज्वार, बाजरा या मक्का आदि के साथ मिलाकर या अकेले भी बोया जा सकता है |

भूमि तथा खेत की तैयारी :-

लोबिया की खेती आमतौर पर अच्छे जल निकास वाली सभी प्रकार की भूमियों में की जा सकती है | लेकिन दोमट मिटटी पैदावार के हिसाब से सर्वोतम मानी गयी है |उन्नत किस्में :-

इगफ्री –450, रसियन जाइन्ट, टा.2, यू.बी.सी.5286, 5287, ई.सी. 4216, आई.जी.एफ.आर.आई.– 450, 395 प्रजातियाँ है |

उन्नत फसल चक्र :-

बरसीम + सरसों – संकर नेपियर – लोबिया |

बरसीम + सरसों – मक्का + लोबिया – एम.पी. चारी + लोबिया |

बरसीम + सरसों – एम.पी. चरी + लोबिया |

बीज की मात्र एवं बुवाई :-

प्रथम मानसून आने पर जून से लेकर जुलाई तक लोबिया बोना चाहिए | अगर अकेले लोबिया की फसल बोना है तो 40 किलोग्राम बीज प्रति हैक्टेयर पर्याप्त होता है और ज्वार या मक्का आदि के साथ बोना है तो 15 से 20 किलोग्राम बीज प्रति हैक्टेयर पर्याप्त होता है | बीज की बुवाई हल के पीछे कुडों में करना चाहिए | उपचारित बीज ही बोना चाहिए |

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सिंचाई :-

अगर लोबिया वर्षा ऋतू में बोई गयी है तो सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है और वर्षा न होने पर फूल आने पर एक सिंचाई पर्याप्त रहती हैं तथा ग्रीष्म कल में 15 से 20 दिन के अंतराल पर सिंचाई करना चाहिए |

खरपतवार नियंत्रण :-

बुवाई के 30 या 35 दिन के अंदर निराई गुडाई करके खरपतवार साफ कर देना चाहिए | शुद्ध उपचारित बीज ही बोना चाहिए |

चारे की पैदावार :-

जैसे ही फली बनना शुरू हो चारे की कटाई भी शुरू कर देना चाहिए | इस प्रकार 250 से 300 किवंटल प्रति हैक्टेयर के हिसाब से हरा चारा प्राप्त किया जा सकता है |

बीज मिलने का पता :-

राष्ट्रीय बीज निगम, कृषि विश्वविद्यालयों, राज्य बीज निगमों तथा स्थानीय बीज विक्रेताओं से भी खरीद जा सकती हैं |

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