धान की भरपूर उपज के लिए करें यह उपाय और रखें अपनी उपज को स्वस्थ

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प्रतीकात्मक चित्र

 धान की भरपूर उपज के लिए करें यह उपाय और रखें अपनी उपज को स्वस्थ रखने के लिए उसमें कीट रोग एवं खरपतवार का प्रवंधन सही होना चाहिए | धान की फसल में कीट की रोकथाम एवं रोगों पर नियंत्रण किसान भाई किस प्रकार करें आइये जानते हैं |

उर्वरक आवश्यकता तथा प्रयोग

उर्वरक की संस्तुत मात्रा मृदा परीक्षण के आघार पर प्रयोग की जानी चाहिये। अधिक लाभ के लिए संकर धान को सामान्य धान से अधिक समन्वित पोषक तत्वों की आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए १५० किलोग्राम नत्रजन ७५ किलोग्राम फास्फोरस तथा ६० किलोग्राम पोटाश एवं आवश्यकतानुसार २५ किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हे० की आवश्यकता होती है। रोपाई के समय नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा डाली जाय। शेष नत्रजन की मात्रा दो बराबर भागों में कल्ले निकलते है। समय तथा रेणते या गोभ बनते (बूटिंग) समय आप ड्रेसिंग के रूप में प्रयोग करना चाहिये।

खरपतवार नियंत्रण किस प्रकार करें ?

धान की खरपतवार नष्ट करने के लिए खुरपी या पैडीवीडर का प्रयोग करे। यह कार्य खरपतवार विनाशक रसायनों द्वारा भी किया जा सकता है। रोपाई वाले धान में घास जाति एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार के नियंत्रण हेतु  ब्युटाक्लोर ५ प्रतिशत  ग्रेन्यूल३०-४० किग्रा. प्रति हे. अथवा बेन्थियोकार्ब १० प्रतिशत गे्रन्यूल १५ किग्रा० या बेन्थियोकार्ब ५० ई.सी. ३ ली. या पेण्डी मैथालीन (३० ई.सी.) ३.३ ली. या एनीलोफास ३० ई.सी. १.६५ लीटर प्रति हे.  ३.४ दिन के अन्दर अच्छी नमी की स्थिति में ही करना उचित होगा। केवल चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार के नियंत्रण हेतु २-४ डी सोडियम साल्ट कार ६२५ ग्राम प्रति हेक्टर की दर से प्रयोग किया जा सकता है। इसका प्रयोग धान की रोपाई के एक सप्ताह बाद और सीधी बुवाई के २० दिन बाद करना चाहियें।

रसायनों द्वारा खरपतवार की रोकथाम के लिए यह अति आवश्यक है कि दानेदार रसायनों का प्रयोग करते समय खेत मे ४-५ सेमी० पानी भरा होना चाहिये। फ्यूक्लोरोलिन का प्रयोग २.० ली./हे. रोपाई के पूर्व करना चाहियें।

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रोग, पहचान एवं उनका निराकरण

जीवाणु झुलसा:

 पहचान:

इसमें पत्तियों नोक अथवा किनारे से एकदम सूखने लगती है। सूखे हुए किनारे अनियमित एवं टेढे मेढे होते है।

उपचार:

१. बोने से पूर्व बीजोपचार उपयुक्त विधि से करे।

२. रोग के लक्षण दिखाई देते ही यथा सम्भव खेत का पानी निकालकर १५ ग्राम स्ट्राप्टोसाइक्लीन व कॉपर आक्सीक्लोराइड के ५०० ग्राम अथवा १.०० किग्रा. ट्राइकोडार्म विरिडा सम्भव खेत में पानी निकालकर १५ ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लीन के आवश्यक पानी में घोलकर प्रति हे. २ से ३ छिड़काव करें।

३. रोग लक्षण दिखाई देने पर नत्रजन की टापड्रेसिंग आदि बाकी है तो उसे रोक देना चाहियें।

झोंका रोग:
पहचान:

पत्तियों पर आँख  के आकृति के धब्बे बनते है। जो बीज में राख के रंग तथा किनारों पर गहरे कत्थाई रंग के होते है। इनके अतिरिक्त बालियॉ डठलों पुष्पशाखाओं एवं गांठो  पर काले भूरे धब्बे बनते है।

उपचार:

१. बोने से पूर्व बीजो २.३ ग्राम थीरम या १.२ ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित करे।

२. खड़ी फसल पर निम्न मे से किसी एक रसायन का द्दिडकाव करना चाहियें।

३. कार्बेडाजिम १ किग्रा. प्रति हे. की दर से २-३ छिड़काव १०-१२ दिन के अंतराल पर करें।

खैर रोग:
पहचान:

यह रोग जस्ते की कमी के कारण होता है। इसमें पत्तियॉ पीली पड़ जाती है। जिस पर बाद में कत्थई रंग के धब्बे पड़ जाते है।

उपचार:

फसल पर ५ किग्रा. जिंक सल्फेट को २० किग्रा. यूरिया अथवा २.५ किग्रा. बुझे चूने के ८०० लीटर पानी के साथ मिलाकर प्रति हे. छिड़काव  करना चाहिये।

मिथ्या कण्डुआ रोग:

बाली निकलते समय कार्बेन्डाजिम ०.१ प्रतिशतघोल ७ दिन के अन्तराल पर दो  बार छिड़क दिया जाता है। कर मिथ्या कंडुआ तथा बंट और कुरखुलेरिया जैसे रोगजनक से पैदा होने वाली बीमारियों के प्रकोप को कम किया जा सकता है।

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संकर धान में लगने वाले कीट और उनकी रोकथाम
फुदके:

यदि तनों के फुदको की औसत संख्या प्रति पौध ८-१० या इससे अधिक हो तथी कीटनाशी  का प्रयोग कीजिए। यदि फसल कल्ला निकलने की अवस्था मे हो तो ३ प्रतिशत दानेदार कार्बोयूरान २०-२५ किलोग्राम प्रति हे.या   कारटाप ४ जी. १८.५ किग्रा. की दर से प्रयोग कीजिए। यदि बालियॉ निकल आई हो और हापरबर्न  होता हुआ दिखाई दे तो बी.पी.एम.सी. और डी.टी.वी.पी. (एक मिली+एक मिली.) अथवा  इथोफेनप्राक्स २० ई.सी. के एक मिली. को एक ली. पानी के हिसाब से घोल तेयार करके घोल आवश्यक मात्रा का प्रयोग करे। घोल की मात्रा खेत के आकार और मशीन पर निर्भर करता है। दवा को हापरर्वन की जगह पर पहले बाहर की ओर से छिड़काव करे। फिर अंदर बढिये। इसके बाद किसी भी कीटनाशी धूल का प्रयोग किया जा सकता है। प्रभावी कीट नियंत्रण के लिए छिड़काव या बुरकाव पौधो के तनों की ओर करना चाहिये।

गन्धी कीट:

गन्धी कीट के नियंत्रण के लिए खेत और उसके आस पास के खरपतवारों को समय समय से नष्ट करते रहना चाहियें। इस कीट का प्रकोप शुरू होने पर ५ प्रतिशत मैनाथियान चूर्ण २०-२५ किलोग्राम प्रति हे. की दर से बुरकना चाहिये। बुरकाव प्रातः अथवा सांय हवा बन्द होने पर करे।

तना छेदक:

तना द्देदक का प्रकोप कल्ले निकलने की अवस्था में ५ प्रतिशत हो तब ३ प्रतिशत फ्यूराडान २०-२५ किलोग्राम या ४ प्रतिशत कारटाप १७-१८ किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बुरकाव करें। अगर प्रकोप समाप्त न हो तों बालियों के निकलने से पहले उपयोक्त कीटनाशी का एक बुरकाव फिर कीजिये।

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